बुधवार, 23 अगस्त 2017

ट्रिपल तलाक़ फैसला और सरकार की नियत !!


कल सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने विवादास्पद तीन तलाक़ पर फैसला दे दिया है, लोग और मीडिया इसे भले ही इसे मुस्लिम महिलाओं को मिली आज़ादी या मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रहे हैं मगर असलियत कुछ और ही है !

सबसे पहली बात तो ये कि सुप्रीम कोर्ट ने केवल इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़ (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक घोषित करने की मांग तो ठुकरा दी लेकिन सरकार को कानून बनाने पर विचार करने का निर्देश दिया है !

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने क़ुरआने पाक में बताये गए तरीके से नियमानुसार और तय शुदा अवधि में तलाक़ या तीन तलाक़ देने पर किसी प्रकार की कोई समीक्षा या निर्देश नहीं दिए हैं, यानी तलाक़ देने वाले शरीयत के हिसाब  तलाक़ देंगे ही !

इस्लाम सिर्फ एक मज़हब ही नहीं नैतिक व्यवस्था के अंतर्गत एक जीवन पद्धति है, क़ुरआने पाक में इस नैतिक व्यवस्था और जीवन पद्धति के लिए हर तरह की हिदायतें और निर्देश हैं !

इस्लाम मे तलाक़ को बुरा माना गया है, और तलाक देने जरूरी हो जाये तो तलाक़ देने के लिए क़ुरआने पाक में सम्बंधित निर्देश दिए गए हैं !

मामला इसलिए बिगड़ा कि सही वक़्त पर आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने इस इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़ मुद्दे पर उचित और त्वरित क़दम नहीं उठाये ! लोगो को तलाक़ के बुनियादी उसूल नहीं समझाए गए, गली मोहल्ले छाप मौलानाओं ने इस इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़ (तलाक-ए-बिद्दत) की अपनी अपनी तरह से व्याख्याएं कीं और पीड़ित महिलाओं को इन्साफ से वंचित रखा गया !

अब बात करते हैं ट्रिपल तलाक़ पर आये फैसले पर मोदी सरकार की तथाकथित ऐतिहासिक 'उपलब्धि' की, बारीकी से देखे तो इस मुद्दे पर मुस्लिम महिलाओं के सामाजिक स्तर सुधारने या मुस्लिम समुदाय के भले का समीकरण दूर दूर तक नज़र नहीं आ रहा ! 


यह बात अलग है कि इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़ के गिनती के जो मामले होते थे, उनमें कमी आएगी और इस कमी का न सिर्फ AIMPLB बल्कि सभी मुसलमान सहर्ष स्वागत भी करेंगे  ! इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़ के मामले मुस्लिम आबादी के आंकड़ों के अनुपात में भूसे के ढेर में सुई के सामान हैं, और इसके कोई आधिकारिक आंकड़े भी मौजूद नहीं है, केवल अनुमान हैं :-

"The divorce rate among Muslims in the 2011 Census is lower than among Hindus. And while there is no survey on cases of ‘triple talaq’, the incidence could be as low as 1% of the total."
Source :-
https://www.nationalheraldindia.com/minorities/census-put-muslim-divorce-rate-at-056-rate-triple-talaq-lower-than-hindus


आखरी बात इस इंस्टेंट तलाक़ पर आये फैसले और सरकार की नियत की तो इस ट्रिपल तलाक़ मुद्दे को मोदी सरकार ने मीडिया, अपने कुछ संगठनों के ज़रिये एक सुनियोजित रणनीति के तहत उछाल कर मुद्दा बना कर राजनैतिक हित उत्तरप्रदेश चुनाव में साधे थे !

यदि मोदी सरकार को मुस्लिम महिलाओं की इतनी चिंता है तो उन्हें इस बात पर भी गौर करना होगा कि केवल इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश जारी करा देने से 20 करोड़ की आधी आबादी यानि मुस्लिम महिलाओं का उत्थान नहीं होने वाला, ना ही उनका सामाजिक जीवन सुधरने वाला, ये तभी संभव है जब मोदी जी समग्र मुस्लिम समुदाय के लिए ही ऐसी चिंता करें, और उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए कोई ठोस नीति बनाएं !

बात अगर पीड़ित मुस्ल्मि महिलाओं की आती है तो गुमशुदा नजीब की माँ भी पीड़ित महिला है, दादरी के अख़लाक़ की बेवा भी मुस्लिम महिला है, बहरोड़ में मॉब लिंचिंग का शिकार हुए पहलू खान की अंधी माँ और उसकी बेवा बीवी, और हाल ही में ट्रैन में मारे गए जुनैद की माँ भी पीड़ित मुस्लिम महिला है !

इसलिए इस इंस्टेंट तलाक़ को मुस्लिम महिलाओं की जीत, सामाजिक उत्थान, सशक्तिकरण या फिर मोदी सरकार की ऐतिहासिक उपलब्धि जैसे अलंकारों से अलंकृत करने के बजाय मूल में जाकर देखेंगे तो एक राजनैतिक हितसाधन का प्रयास ही नज़र आएगा !


यदि मुस्लिम महिलाओं की पारिवारिक सुरक्षा और उनके सामाजिक उत्थान की चिंता वास्तविक है तो उन्हें समस्त मुस्लिम समुदाय की चिंता करना होगी, सामाजिक सुरक्षा के लिए कोई कारगर नीति बनानी होगी, तभी ये सामाजिक उत्थान, पारिवारिक सुरक्षा और सशक्तिकरण जैसे अलंकरण साकार होंगे ! 

बुधवार, 19 जुलाई 2017

जानिये निजता की धज्जियाँ उड़ाते 'DNA प्रोफाइलिंग बिल' के बारे में !!


नोटबंदी और GST के बाद मोदी सरकार एक और करतब करने जा रही है, जिसकी तैयारी काफी पहले 2015 में ही पूरी कर ली गयी थी, वो है DNA प्रोफाइलिंग बिल !
यह बिल लगभग पूरा तैयार हो चुका है, आधार के बहाने 'निजता आपका मूल अधिकार है या नहीं' तक मुद्दा इसी लिए उछाला गया है ताकि इस विवादित बिल के लिए रास्ता साफ़ हो सके ! इस निजता के बहाने ही DNA प्रोफाइलिंग बिल की पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है !
भारत के नागरिकों को निजता का अधिकार है या नहीं? क्या यह मौलिक अधिकार है? ये सवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने देश की सर्वोच्च अदालत में पूछ कर एक सिरहन-सी पैदा की है।
चिंता और अधिक इसलिए भी है क्योंकि ये सवाल ऐसे समय पूछा गया जब देश की संसद में डीएनए प्रोफाइलिंग बिल पेश होने को है और सर्वोच्च न्यायालय में आधार कार्ड और आधार परियोजना पर बहस चल रही है। क्या संकेत यह है कि नागरिक की निजता का जबर्दस्त उल्लंघन करने की तैयारी है?
क्या है DNA प्रोफाइलिंग बिल :-
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बिल के तहत डीएनए प्रोफाइलिंग के लिए इनटिमेट बॉडी सैंपल्स (शरीर के प्राइवेट पार्ट्स का नमूना) इकट्ठा करने की योजना बना रही है। विशेषज्ञों के अनुसार बिल को लेकर देश भर में बड़ा विवाद उठ सकता है। बिल के मसौदे में जिंदा लोगों के भी प्राइवेट पार्ट्स के भी सैंपल लिए जाने की अनुशंसा की गई है।
डीएनए प्रोफाइलिंग विधेयक के प्रावधान तो इसी ओर इशारा कर रहे हैं। इस विधेयक के मसौदे में जिंदा लोगों के शरीर से जांच के लिए नमूने लेने का प्रावधान किया गया है। नए कानून में व्यक्ति के शरीर से इनटिमेट बॉडी सैंपल (शरीर के गुप्तांगों के नमूने) लेने की तैयारी चल रही है। इसमें गुप्तांग, कूल्हे, स्त्री के स्तनों के नमूने और फोटोज़ लेने की तैयारी हो रही है।
गुप्तांगों का बाहरी परीक्षण के अलावा Pubic Hairs (गुदा के बालों) से सैंपल्स लेने का भी अधिकार जांच एजेंसियों को दिया जा रहा है। विधेयक में शरीर से न केवल नमूने लिए जाएंगे बल्कि उस हिस्से की फोटो या वीडियो रिकॉर्डिंग करने की भी छूट होगी। यानी एक व्यक्ति के शरीर का सारा ब्यौरा, उसका डीएनए प्रोफाइल राज्य के पास होगा।
अभी तो कहा जा रहा है कि सार्वजनिक नहीं किया जाएगा, लेकिन इस आश्वासन पर खुद ही वैज्ञानिक तैयार नहीं है। वैज्ञानिक दिनेश अब्रॉल का कहना है कि यह सीधे-सीधे नागरिकों की निजता पर हमला है और बड़ी कंपनियों के लिए भारतीय शरीर को प्रयोग के लिए गिनी पिग बनाने की खूली छूट है। इसका इस्तेमाल किसी जाति-किसी वर्ग, किसी समुदाय के खिलाफ किया जा सकता है। ऐसी कोई कानून किसी भी आजाद देश के नागरिक को गवारा नहीं हो सकता।
सरकार के अनुसार क्यों जरूरी है डीएनए बिल :-
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सरकार का तर्क है कि वर्तमान में अपराधी प्लास्टिक सर्जरी तथा अन्य मेडिकल सुविधाओं के चलते अपना रंग-रूप बदल लेते हैं, जिससे उनकी पहचान मुश्किल हो जाती है। डीएनए बिल से ऐसा नहीं हो सकेगा। डीएनए बिल पारित होने से अपराधी की त्वरित पहचान संभव हो सकेगी, खास तौर पर रेप और हत्या जैसे मामलों में अपराधी को पकड़ना सहज हो सकेगा।
इस बिल के मसौदे दस्तावेज में एक और बेहद चिंताजन पहलू भी है और वह यह कि इसका इस्तेमाल सिर्फ आपराधिक मामलों के निपटारे में ही नहीं बल्कि दीवानी मामलों में किया जाएगा। मिसाल के तौर पर सेरोगेसी, मातृत्व या पितृत्व, अंग प्रत्यारोपण, इमिग्रेशन और व्यक्ति की शिनाक्चत आदि में भी डीएनए प्रोफाइलिंग के इस्तेमाल की बात कही गई है।
और तो और डीएनए प्रोफाइल के जरिए जमा की गई जानकारी का प्रयोग जंनसंख्या को नियंत्रित करने के प्रयासों में भी किया जाएगा। इसे लेकर पहले अल्पसंख्यक समुदायों, आदिवासियों और दलितों में गहरी आशंकाएं हैं। इस तरह से जुटाई गई जानकारी को इन तमाम तबकों को निशाने पर लेने, उन्हें सामाजिक रूप से अपमानित करने और नियंत्रित करने में किया जा सकता है।
जहां तक अपराधियों को नियंत्रित करने, उनका ट्रैक रखने और उनसे संबंधित सारी जानकारियों को एक जगह जमा करने ताकि वह प्लासिट सर्जरी आदि कराकर भी बच न पाए-ये सब इस प्रस्तावित विधेयक का मुख्य लक्ष्य बताया जा रहा। इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह फोरेंसिक प्रक्रिया केवल सजायाफ्ता के लिए ही नहीं बल्कि विचाराधीन कैदियों पर भी अपनाई जाएगी।
ये मसौदा बिल गई आपत्त‌ियों को सिरे से नजरंदाज करके संसद की दहलीज तक पहुंचा है। इस विधेयक के लिए जो उच्च स्तरीय समीक्षा कमेटी बनाई गई थी, जिसने लंबी अवधि तक सघन चर्चा हुई, उसके दो सदस्यों ने इन तमाम प्रावधानों की जमकर आपत्त‌ि जताई थी।
लेकिन उन्हें हैरानी है कि उनकी आपत्त‌ियों को मसौदे में कोई जगह नहीं मिली और न ही उनका उल्लेख किया गया। इस समिति के जिन दो सदस्यों ने निजता का हनन करने वाले इन प्रावधानों को हटाने की मांग की थी, वे है अंतर्राष्टीय कानूनविद उषा रमानाथन और सेंटर फॉर इंटरनेट एंड सोसाइटी के निदेशक सुनील अब्राहम।
इस पूरे मसले पर उषा रमानाथन ने बताया कि यह विधेयक बेहद खतरनाक है। यह नागरिकों की निजता का खुलेआम उल्लंघन करते हुए राज्य और जांच एजेंसियों को व्यक्ति के जीवन ही नहीं, बल्कि शरीर पर भी अतिक्रमण करने की अपार छूट देता है।
यह तानाशाही को बढ़ावा देने वाला है और कहीं से भी वैज्ञानिक नहीं है। खासतौर से आज के दौर में जब जानकारियां कहीं भी सुरक्षित नहीं रहती, तब व्यक्तियों की निजी जिंदगी से जुड़ी जानकारियों का क्या इस्तेमाल हो सकता है, इसका किसी को अंदाजा नहीं है। ऐसे में डीएएन डाटा बैंक बनाना कितना खतरनाक हो सकता है, इस बारे में समाज को सोचना चाहिए।
एक तरफ केंद्र इस बिल को संसद में पेश करने की जुगत बैठा रहा है, वहीं ठीक उसी समय आधार कार्ड की वैधानिकता और उसे अनिवार्य किए जाने के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे मामले की सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष में कहा कि नागरिकों को निजता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। अदालत में सरकार ने निजता के अधिकार पर सवाल उठाकर दो तरफा मार की।
एक तो उसने आधार की वैधानिकता पर चल रही सुनवाई को बिल्कुल दूसरी तरफ मोड़ने की कोशिश की, वहीं यह आभास देने की भी कोशिश की कि यह अधिकार कभी भी छीना जा सकता है।
इस बारे में वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर का कहना है कि एक तरफ जहां आधार पर सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि किसी को भी आधार कार्ड न होने की वजह से किसी भी लाभ या हक से वंचित नहीं किया जा सकता है, ऐसे में केंद्र सरकार तमाम योजनाओं को खुलेआम जोडक़र अदालत के आदेश की अवमानना कह रही है।
उषा रमानथन कहती है कि दरअसल, सरकार की कोशिश है कि आधार के आधार को इतना फैला दिया जाए कि कल वे अदालत में कहें कि अब इतने अधिक लोग इससे जुड़ गए हैं, कि इसे खारिज नहीं किया जा सकता।
आधार को किस तरह से तमाम बुनियादी योजनाओं, सुविधाओं के लिए बाध्यकारी बना दिया गया है और किस तरह से इसके जरिए भी नागरिकों की सारी जानकारी को जमा किया जा रहा है, अगर इसकी पड़ताल हो तो दूसरी ही तस्वीर सामने आएगा।
देश की राजधानी दिल्ली में भी मतदाता पहचान पत्र बनवाने के लिए आधार कार्ड की मांग हो रही है और इसके बिना मना किया जा रहा है। अधिकारी न तो पासपोर्ट कार्ड और न ही ड्राइविंग लाइसेंस को पहचान पत्र मानने को तैयार हैं। यानी सीधे-सीधे लोगों को आधार की ओर ढकेला जा रहा है। और, जब आधार की वैधानिकता पर चर्चा होती है तो सरकारी वकील (एटॉर्नी जनरल) इस अंदाज में दलील देते हैं कि नागरिकों की निजता सरकार के लिए कोई मायने नहीं रखती।
ये सारा परिदृश्य निजता के हनन के राज के आगमन की तुरही बजाता दिखा रहा है। वह भी ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों की यात्राओं पर हो रहे खर्चे बेहद गोपनीय विषय बने हुए हैं।
डीएनए प्रोफाइलिंग विधेयक के खतरे
- व्यक्ति के शरीर से इनटिमेट बॉडी सैंपल (शरीर के गुप्तांगों के नमूने) लेने का प्रावधान।
-शरीर से न केवल नमूने लिए जाएंगे बल्कि उस हिस्से की फोटो या वीडियो रिकॉर्डिंग करने की भी छूट होगी
-इसका इस्तेमाल सिर्फ आपराधिक मामलों के निपटारे में ही नहीं बल्कि दीवानी मामलों में होगा।
-इसका प्रयोग जंनसंख्या को नियंत्रित करने के प्रयासों में भी किया जाएगा
Sources :-

गुरुवार, 30 मार्च 2017

शरीक-ए-हयात को मिला राजस्थान उर्दू अकादमी का प्रतिष्टित अवार्ड !!


मेरे लिए और बेटियों के लिए कल 29 मार्च 2017 का वो यादगार और फख्र का दिन था जब जयपुर में राजस्थान उर्दू अकादमी द्वारा मेरी शरीक-ए-हयात, राजकीय महाविद्यालय में उर्दू की व्याख्याता और विभागाध्यक्ष डा. हुस्न आरा को उर्दू अदब की खिदमात के लिए दर्स-ओ-तदरीस प्रतिष्टित अवार्ड दिया गया !

डा. हुस्न आरा राजकीय महाविद्यालय में उर्दू की व्याख्याता और विभागाध्यक्ष हैं साथ ही PhD गाइड भी हैं, और उनकी निगरानी में कई स्टूडेंट्स अपनी PhD मुकम्मल कर चुके हैं और कई कर रहे हैं !


डा. हुस्न आरा के कई रिसर्च पेपर्स इंटरनेशनल और नेशनल जर्नल्स में प्रकाशित हो चुके हैं, साथ ही उनकी कई किताबें भी प्रकशित हो चुकी हैं !


डा. हुस्न आरा को इस अवार्ड के तहत एक मोमेंटो राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश एम.एन. भंडारी साहब के कर कमलों द्वारा प्रदान दिया गया, जबकि प्रमाणपत्र समारोह के मुख्य अतिथि माननीय खान एवं भूगर्भ विभाग मंत्री राजस्थान सरकार श्री सुरेन्द्रपाल टी.टी. जी द्वारा प्रदान किया गया !

साथ ही राजस्थान उर्दू अकादमी द्वारा सम्मान हेतु दिया गया शाल दूरदर्शन केंद्र के डायरेक्टर श्री रमेश शर्मा जी के कर कमलों द्वारा दिए गया, एवम etv और Zee टी.वी. राजस्थान की टॉक शो होस्ट डा. अनिता हाड़ा द्वारा फूलों का गुलदस्ता भेंट किया गया !


ज्ञातव्य रहे कि राजस्थान उर्दू अकादमी द्वारा 6 वर्ष के अंतराल के बाद ये प्रतिष्टित पुरस्कार समारोह आयोजित किया है !

.राजस्थान में उर्दू अदब के फ़रोग़ के लिए राजस्थान उर्दू अकादमी द्वारा अदीबों, शायरों मीडिया पर्सनालिटीज, और शिक्षा से जुड़े विद्वानों को और भी कई पुरस्कार दिए गए, ख़ुशी की बात यह रही कि इस समारोह में टोंक और कोटा का दबदबा देखने को मिला, जहाँ डा. हुस्न आरा खुद टोंक से ताल्लुक़ रखती हैं, वही टोंक से ही डा. सादिक़ अली को मौलाना एह्तेरामुद्दीन शाग़िल अवार्ड से नवाज़ा गया, टोंक के ही अज़ीज़ुल्लाह शीरानी साहब, इमदाद अली और मुख़्तार टोंकी को भी पुरस्कारों से नवाज़ा गया !

वहीँ उर्दू अकादमी का सबसे बड़ा प्रतिष्टित पुरस्कार 'महमूद शीरानी अवार्ड' उर्दू अदब की जानी मानी शख्सियत डा. फ़ारूक़ बख्शी साहब को प्रदान किया गया, डा. फ़ारूक़ बक्शी साहब कोटा से ही हैं, और आजकल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी में उर्दू के प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष हैं उनके तीन काव्य संग्रह 'पलकों के साये', उदास लम्हों के मौसम', और चाँद चेहरा सी एक लड़की प्रकाशित हो चुके हैं, साथ ही उर्दू तनक़ीद पर उनकी पांच किताबें भी प्रकाशित हो चुकी हैं !

इसके साथ ही कोटा शहर के ही डा. पुरषोत्तम यक़ीन को 'चाँद बिहारी लाल सबा' अवार्ड से नवाज़ा गया !

सबसे ख़ास और ख़ुशी की बात यह है कि राजस्थान उर्दू अकादमी के सचिव जनाब मोअज़्ज़म अली साहब की बेइंतेहा कोशिशों से ही ये समारोह मुमकिन हो सका, 6 साल बाद राजस्थान उर्दू अकादमी ने ये पुरस्कार समारोह आयोजित किया है, और इस बार उन्होंने राजस्थान के कोने कोने से उर्दू अदब के लिए बेलौस खिदमत करने वालों के साथ साथ उर्दू अदब के फ़रोग़ के लिए कोशिशों में लगे अदीबों, विद्वानों, शिक्षकों को एक मंच पर लाकर न सिर्फ इकठ्ठा कर ये सम्मान दिलाया बल्कि उर्दू अदब के लिए उनकी खिदमात को इस समारोह के ज़रिये आम लोगों तक पहुंचाया है !

उर्दू अदब की इस शानादार महफ़िल को कामयाब बनाने के लिए राजस्थान उर्दू अकादमी के सचिव जनाब मोअज़्ज़म अली साहब की अथक मेहनत और उर्दू अदब से उनके लगाव के जज़्बे को तहे दिल से सलाम और मुबारकबाद ! 

राजस्थान उर्दू अकादमी के सचिव जनाब मोअज़्ज़म अली साहब की इस मुहीम में उनके साथ रह कर उर्दू अदब के फ़रोग़ के लिए उन्हें हर मुमकिन मदद और हौंसला दिया राजस्थान उर्दू अकादमी के चेयरमैन जनाब अशरफ अली खिलजी साहब ने, इन दोनों हज़रात की कोशिशों की बदौलत जयपुर में राजस्थान उर्दू अकादमी के बैनर तले अदीबों की इस महफ़िल में उर्दू मुस्कुराती नज़र आयी !!

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

मिलिए पाक में तेज़ाब से जलाई औरतों की मसीहा मुसर्रत मिस्बाह से !!

लाहौर (पाकिस्तान) में एक ब्यूटी पार्लर ऐसा है जहाँ तेज़ाब से जलाई गयी औरतें, वहां आने वाली औरतों की सुंदरता में चार चाँद लगाती हैं !

मुसर्रत मिस्बाह ने जो कि खुद एक ब्यूटी एक्सपर्ट, मीडिया पर्सनालिटी और सोशल एक्टिविस्ट हैं, इनके पुनर्वास का बीड़ा उठाया हुआ है ! उन्होंने इनके लिए 'Depilex Smile Again Foundation' नाम का फाउंडेशन बनाया है !

इसकी शुरआत की नींव तब पड़ी जब 2003 में उनके पास एक चेहरा ढके औरत आकर मदद के लिए गिड़गिड़ाने लगी, जब उन्होंने उसको चेहरा दिखाने को कहा तो वो सन्न रह गयीं, उसके चेहरा पर तेज़ाब फेंक गया था, नाक नहीं रही थी, आँखों की पलकें पिघल गयीं थीं, और चेहरे की पूरी त्वचा माँ की तरह झिल्ली के रूप में लटक रही थी !

उसकी हालत देखकर वो फूट फूट कर रोने लगीं,उन्होंने फ़ौरन ही उसे मेडिकल मदद उपलब्ध कराई, उसके बाद उन्होंने तय कर लिया कि वो तेज़ाब हमलों से पीड़ित औरतों के लिए आवाज़ उठाएंगी और जागरूकता फैलाएंगी !

उन्होंने अपने पारिवारिक मित्रों के साथ मिलकर पाक मीडिया के ज़रिये महिलाओं पर तेज़ाब के हमलों के खिलाफ मोर्चा खोला, और साथ साथ ही तेज़ाब के हमलों से पीड़ित महिलाओं के पुनर्वास का काम शुरू किया !

जल्दी ही उनके पास तेज़ाब के हमलों से पीड़ित औरतों की संख्या बढ़ने लगी, उन्होंने इसके लिए एक NGO खोला जिसे  'Depilex Smile Again Foundation' का नाम दिया गया !

इस फाउंडेशन के तहत वो तेज़ाब के हमलों से पीड़ित औरतों को स्वावलंबन से जीना सिखाती हैं, वो इन सभी पीड़ित औरतों को प्रशिक्षित कर अपने पार्लर में काम देती हैं, ताकि वो आर्थिक तौर मज़बूत हो सकें, किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े !

मुसर्रत मिस्बाह के 'Depilex Smile Again Foundation' की पाकिस्तान में 35 सब ब्रांचेज हैं, जहाँ तेज़ाब पीड़ित औरतों की देखभाल की जाती है, उन्हें रोज़गार से लेकर चिकित्सा सुविधाओं सहित आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक तौर पर सुदृढ़ करने की कोशिश की जाती है !

जैसा कि 2005 तक के आंकड़े बताते हैं कि मुसर्रत मिस्बाह ने 2005 तक 600 तेज़ाब पीड़ित महिलाओं का पुनर्वास किया था, इसमें उनके चेहरों के आपरेशन से लेकर उन्हें आर्थिक संबल प्रदान करने तक की कोशिशें शामिल थीं !

उनके फाउंडेशन की प्रसिद्धि और इंसानियत के लिए किया जाने वाले काम की प्रशंसा दुनिया भर में है, विश्व के लगभग सभी बड़े अखबारों ने उनके इस फाउंडेशन और उनके सराहनीय कामों के लिए समय समय पर लेख लिखे हैं, वीडिओज़ बनाये हैं, इंटरव्यूज लिए हैं ! और यह क्रम जारी है !

Source :- 





बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

मिलिए नन्ही फिलस्तीनी शेरनी बेटी अहद अल-तमीमी से !!

14 साल की एक फिलिस्तीनी बच्ची अहद अल-तमीमी का नाम विश्व के लिए अब अनजान नहीं रहा, यह बच्ची अब फिलस्तीन की पोस्टर गर्ल के नाम से मशहूर हो गयी है, अहद अल-तमीमी द्वारा एक इस्राईली सैनिक की पिटाई से एक बार फिर उसका नाम सुर्ख़ियों में है !

अपने बड़े भाई की पिटाई और गिरफ्तारी करने वाले इस्राईली सैनिकों के ज़ुल्म के सामने डट कर खड़े होने वाली इस बच्ची को 2012 में तुर्की का वीरता पुरस्कार 'Hanzala Courage Award' दिया गया था !


यह नन्ही बच्ची आये दिन इज़्राईली सैनिकों की बर्बरता के खिलाफ उनके सामने सिर्फ तन कर खड़ी होती नज़र आती है, बल्कि कई बार इज़्राईली सैनिकों को पीटते हुए इसके कई वीडिओज़ भी इंटरनेट पर मौजूद हैं !

अहद अल-तमीमी के पिता और माता कई बार इज़राइली ज़ुल्म के खिलाफ शांति पूर्ण प्रदर्शनों के लिए गिरफ्तार किये जा चुके हैं, वहीँ अहद अल-तमीमी के चाचा 17 नवम्बर 2012 को इज़्राईली सैनिकों की गोली से मारे गए थे !

अहद अल-तमीमी अब फिलस्तीनियों के संघर्ष का प्रतीक और उनका हौंसला बन कर खड़ी हुई है !

इस नन्ही शेरनी को हम सब का सलाम, दुआ करते हैं कि यह नन्ही बच्ची अपने हक़ की लड़ाई में कामयाब हो !

अहद अल-तमीमी के बारे में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :-

शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

भारतीय नागरिक कानून और मुस्लिम पर्सनल लॉ !!


तीन तलाक’ को चुनौती दिए जाने के बाद भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस्लामी कानूनी मानदंडों के मुताबाकि महिलाओं की सुरक्षा संबंधित मुद्दा पिछली बार साल 1985 में उठा था। उस वक्त का शाह बानो केस काफी चर्चित है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ शरीयत पर आधारित है। मोटे तौर पर, शरीयत को कुरान के प्रावधानों के साथ ही पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)  (محمد صلی اللہ علیہ و آلہ و سلم) की शिक्षाओं और प्रथाओं के रूप में समझा जा सकता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद-14 भारत के सभी नागरिकों को ‘कानून का समान संरक्षण’ देता है, लेकिन जब बात व्यक्तिगत मुद्दों ( शादी, तलाक, विरासत, बच्चों की हिरासत) की आती है तो मुसलमानों के ये मुद्दे मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आ जाते हैं।

भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ एप्लिकेशन एक्ट साल 1937 में पास हुआ था। इसके पीछे मकसद भारतीय मुस्लिमों के लिए एक इस्लामिक कानून कोड तैयार करना था। उस वक्त भारत पर शासन कर रहे ब्रिटिशों की कोशिश थी कि वे भारतीयों पर उनके सांस्कृतिक नियमों के मुताबिक ही शासन करें। तब(1937) से मुस्लिमों के शादी, तलाक, विरासत और पारिवारिक विवादों के फैसले इस एक्ट के तहत ही होते हैं। एक्ट के मुताबिक व्यक्तिगत विवादों में सरकार दखल नहीं कर सकती।

भारत में अन्य धार्मिक समूहों के लिए भी ऐसे कानून बनाए गए हैं। देश में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग सिविल कोड है। उदाहरण के तौर पर 1956 का हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, इसके तहत हिंदू, बुद्ध, जैन और सिखों में विरासत में मिली संपत्ति का बंटवारा होता है। इसके अलावा 1936 का पारसी विवाह-तलाक एक्ट और 1955 का हिंदू विवाह अधिनियम इसके उदाहरण हैं।

भारत में शरीयत एप्लिकेशन एक्ट में बदलाव संभव है ? :-

शरीयत एक्ट की प्रासंगिकता पर पहले भी कई बार बहस हो चुकी है। पहले ऐसे कई मामले आए हैं, जब महिलाओं के सुरक्षा से जुड़े अधिकारों का धार्मिक अधिकारों से टकराव होता रहा है। इसमें शाह बानो केस प्रमुख है। 1985 में 62 वर्षीय शाह बानो ने एक याचिका दाखिल करके अपने पूर्व पति से गुजारे भत्ते की मांग की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गुजारे भत्ते की मांग को सही बताया था, लेकिन इस फैसले का इस्लामिक समुदाय ने विरोध किया था। मुस्लिम समुदाय ने फैसले को कुरान के खिलाफ बताया था। इस मामले को लेकर काफी विवाद हुआ था। उस वक्त वक्त सत्ता में कांग्रेस सरकार थी।

सरकार ने उस वक्त Muslim Women (Protection of Rights on Divorce Act) पास किया था। इस कानून के तहत यह जरूरी किया गया था कि हर एक पति अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता देगा। लेकिन इसमें प्रावधान था कि यह भत्ता केवल इद्दत की अवधि के दौरान ही देना होगा, इद्दत तलाक के 90 दिनों बाद तक ही होती है।

पर्सनल लॉ के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों की लंबी सूची है। साल 1930 से लेकर अब तक महिलाओं के आंदोलन का अहम एजेंडा सभी धर्मों के पर्सनल लॉ में महिलाओं के साथ भेदभाव ही रहा है। इसी साल मार्च में केरल हाईकोर्ट के जज जस्टिस बी केमल पाशा ने विरोध जाहिर किया था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मुस्लिम महिलाओं को समानता का अधिकार नहीं दिया जाता।

हालांकि, पर्सनल लॉ में बदलाव के खिलाफ प्रदर्शन इसमें संशोधन को मुश्किल बना देते हैं। एक्ट के मुताबिक व्यक्तिगत मामलों में सरकार को दखल नहीं देना चाहिए। इनका निपटारा कुरान और हदीस की व्याख्या के मुताबिक ही होगा।

(जैसा कि स्त्रोतों से ज्ञात हुआ, यह अंतिम तथ्य नहीं हो सकते)
Source : विकिपीडिया,जनसत्ता गूगल आदि !!


बुधवार, 24 अगस्त 2016

ओलम्पिक में हुई हमारी दुर्गति के कारण और निवारण !!

ओलंपिक में देश की उपलब्धियां और खेल मंत्रालय का र'वैया सभी ने देखा है, दो बेटियां पी.वी. सिंधु और साक्षी मालिक जहाँ अपने ही दम पर सिल्वर और कांस्य मैडल लेकर आईं हैं, वहीँ दूसरी ओर मैराथन दौड़ में भारत की एक बेटी जेयशा मरते मरते बची, ओपी जेयशा को दौड़ के दौरान कोई भी व्यक्ति पानी देने के लिए मौजूद नहीं था !!



वहीँ दूसरी ओर खेल मंत्री विजय गोयल को रियो में ओलिंपिक कमेटी की वॉर्निंग मिलती है, जो कि बहुत ही शर्म की बात है !

यहाँ ओलम्पिक में घटिया प्रदर्शन के कारणों को देखने से पहले खेल मंत्रालय के साथ साथ खेल संगठनों में व्याप्त भ्रष्टाचार और कुर्सियों पर जमे बड़े मगरमच्छों पर भी नज़र डालना ज़रूरी है !


अनुराग ठाकुर, अरुण जेटली, अमित शाह, फारुक अब्दुल्ला, लालू प्रसाद यादव, शरद पवार, यशवंत सिन्हा, राजीव शुक्ला, ये कुछ ऐसे नाम हैं, जो राजनीति के खेल में माहिर हैं !

आइये नज़र डालते हैं ऐसे ही कुछ बड़े सूरमाओं पर जिनका खेल से लेना देना नहीं है, मगर खेल संगठनों के उच्च पदों को हथियाये बैठे हैं :-

भाजपा के विजय कुमार मल्होत्रा करीबन 40 साल तक आर्चरी ऐसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रहे।

कांग्रेस की नेता विद्या स्टोक्स ने चार बार भारतीय महिला हॉकी ऐसोसिएशन की अध्यक्षता की और हॉकी इंडिया ने 2015 में उन्हें लाइफ टाइम प्रेसिडेन्ट के पद पर नियुक्त किया !

कांग्रेस के जगदीश टाइटलर जूडो फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष पद पर रहे।

कांग्रेस के दिग्विजय सिंह शूटींग फेडरेशन के अध्यक्ष रह चुके हैं !

भाजपा के अनुराग ठाकुर बीसीसीआई का सेक्रेटरी पद संभालने के साथ साथ हॉकी इंडिया में ऐसासिएट वॉइस प्रेसिडेन्ट की भूमिका भी निभा रहे हैं !

भाजपा के यशवंत सिन्हां ने सन 2000 से 12 सल तक ऑल इंडिया टेनिस ऐसोसिएशन का अध्यक्ष पद संभाला !

राजनेता लालू प्रसाद यादव सन् 2001 में बिहार क्रिकेट ऐसोसिऐशन के अध्यक्ष बनें।

सुरेश कलमाडी ने जेल जाने से पहले 16 सालों तक इंडियन ओलम्पिक ऐसोसिएशन का अध्यक्ष पद संभाला।

उनके कांग्रेसी साथी विद्या चरण शुक्ल भी कभी अध्यक्ष रह चुकें हैं !

इंडियन नेशनल लोकदल के ओमप्रकाश चौटाला ने करीबन 5 साल तक इंडियन  ओलम्पिक ऐसोसिएशन की अध्यक्षता की !

जबकि कॉमनवेल्थ गेम्स में धांधली को लेकर जेल तक का सफर तय करने वाले उनके बेटे अभय चौटाला इंडियन  ऐमेच्योर बॉक्सिंग फेडरेशन में अध्यक्ष रह चुके हैं।

यही नहीं अभय के भाई अजय चौटाला टेबल टेनिस फेडरेशन ऑफ इंडियन के अध्यक्ष रह चुके हैं।

कांग्रेस के प्रियरंजन दास मुन्शी ने करीबन 20 साल ऑल इंडियन फुटबॉल फेडरेशन का अध्यक्ष पद संभाला।

2008 में मुन्शी जी को खराब स्वास्थ्य की वजह से अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा, पर उनकी जगह भी एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल के रूप में किसी नेताजी की ही नियुक्ति हुई।

अलग-अलग स्टेट क्रिकेट ऐसोसिएशन और बीसीसीआई में अरुण जेटली, शरद पवार और राजीव शुक्ला की दखलअंदाजी किसी से छुपी हुई नहीं है।

नरेन्द्र मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया, लेकिन उनकी जगह अध्यक्ष पद पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह आ गए।

कुल मिलाकर तकरीबन हर एक संगठन में नेताजी परदे के पीछे का खेल खेल रहे असली खिलाड़ी हैं और कुछ तो ऐसे भी हैं जो एक से ज्यादा खेल संगठनो में पद धारक हैं या रह चुके हैं।

इतना ही नहीं जब इन्हें संगठन के संविधान या कोर्ट के फैसलों की वजह से अपना पद छोड़ना पड़ता है, तब भी नई नियुक्ति के तौर पर कोई नेताजी ही आते हैं, ना की कोई खिलाड़ी।

खेल संगठनों के संविधान के हिसाब से संगठन के अध्यक्ष, सेक्रेटरी या अन्य सदस्यों को खेल सुविधाओ के रखरखाव और निर्माण कार्य पर ध्यान देना होता है, पर इन संगठनों में नेताओ का रुतबा इस हद तक है कि संगठन के संचालन के लिए अन्य पदों पर नियुक्ति से लेकर खिलाड़ियों के चयन तक में उनकी दखलअंदाजी रहती हैं, कोचिंग स्टाफ और स्पोर्ट स्टाफ की नियुक्तियां भी इनकी देखरेख में ही कि जाती है।

कई बार नेताजी के चाहने वाले लोग बिना कोई योग्यता के कोई खेल टीम के साथ विदेशी दौरा तक कर आतें हैं और जब विदेशी टीमे यहां खेलने आती हैं, तब उन खास लोगों को मैच के कॉम्प्लीमेन्ट्री पास के साथ-साथ विदेशी खिलाड़ियों के साथ लंच-डिनर तक की सुविधा दी जाती है।

कीर्ती आजाद, बिशन सिंह बेदी, मोहिन्दर अमरनाथ, अभिनव बिंद्रा, ज्वाला गट्टा जैसे कुछ खिलाड़ियों और खेल संगठनो से जुड़े आइएस बिंद्रा और आदित्य वर्मा जैसे लोगों ने कई बार खेल संगठनो में चल रहे घोटालो पर उंगली उठाई हैं, पर इन्हें आश्वासन के अलावा कुछ हाथ नहीं लगा है।

खेल संगठनो में नेताओं की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणीः  “ज्यादातर खेल संगठनों की अगवाई ऐसे लोग कर रहें है, जिनका खेल से कोई नाता नहीं रहा है।  व्यक्तिगत हितों को साधने के लिए कुछ नेता और उद्योगपति खेल संगठनों में मठाधीश बने हुए हैं।

शायद इसी वजह से भारत कई बार गोल्ड मेडल जीत चुका है, उस हॉकी जैसे राष्ट्रीय खेल के प्रदर्शन में गिरावट आई है, और आज भारतीय हॉकी टीम को ओलम्पिक के लिए क्वालिफाय करने में भी मुश्किलें आ रही हैं।

सरकार इन खेल संगठनों पर कभी अंकुश नहीं लगा पाई है और हर एक संगठन किसी न किसी विवाद में फंसा हुआ है और खेल के मैदान पर ध्यान देने के बदले कोर्ट की लड़ाइयों में उलझा हुआ है।

नेताओं को खेल संगठनों से दूर रहना चाहिए और इन संगठनों में खिलाड़ियों को शामिल करने पर जोर दिया जाना चाहिए।”

आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग और हॉकी इन्डिया के केस की सुनवाई के दौरान खेल संगठनों में नेताओ की भूमिका पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ऐसी ही कड़ी भाषा में निंदा की थी, पर तब से लेकर अब तक इन किसी भी नेता ने आगे आकर सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हुए खेल संगठनों में अपना पद नहीं छोड़ा !

ऐसे भी थे नेता जो खेल भी जानते थे और संगठन चलाना भी :-
1954 में कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और केबिनेट मंत्री राजकुमारी अमृत कौर ऑल इंडिया लॉन्ग टेनिस ऐसोसिएशन की अध्यक्ष चुनी गई। युवावस्था में एक अच्छी टेनिस खिलाड़ी रह चुकी अमृत कौर ने टेनिस ऐसोसिएशन में चल रहे घपलों को बड़ी ही गंभीरता से लिया और उन्होनें पूरे प्रयास किए की इन गड़बड़ियों के बदले अच्छे खेल की वजह से ऐसोसिएशन पहचाना जाना जाए।

वो पांच कदम जो भारत को पदक दिला सकते हैं :-
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भारत को ऐसे पांच कौन से क़दम उठाने चाहिए कि उसकी चीन से बराबरी न सही कम से कम पदक तालिका बेहतर हो पाए :-

पैसा :
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कुछ समय पहले 2008 के स्वर्ण पदक विजेता अभिनव बिंद्रा ने ट्वीट करके कहा कि टीम जीबी के हर पदक के पीछे 50 लाख पौंड स्टर्लिंग का निवेश होता है !
उन्होंने भारत को पदक जीतने से पहले खेलों में ढेर सारे पैसे निवेश करने की सलाह दी !
अभिनव बिंद्रा टीम जीबी के बारे में सोलह आने सही हैं.
ब्रिटिश सरकार नेशनल लाटरी के ज़रिये बहुत पैसे कमाती है, इस कमाई का एक बड़ा हिस्सा खेलों को बढ़ावा देने पर खर्च किया जाता है !

सरकार 18 साल की एक योजना के तहत लाटरी की कमाई खेलों में झोंक रही है.नतीजा सब के सामने है.
भारत सरकार भी स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया को पैसे देती है ताकि खेलों को बढ़ावा मिले. लेकिन ये पैसे न केवल कम हैं बल्कि सिस्टम में भ्रष्टाचार के कारण पूरे पैसे खेलों में खर्च भी नहीं हो पाते हैं !

केवल ढेर सारे पैसों का निवेश काफी नहीं होगा. पदक का लक्ष्य तय करना होगा और इसकी ज़वाबदेही भी तय करनी पड़ेगी !

एक करियर के रूप में खेल :-
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जैसे डॉक्टर और इंजीनियर बनने के लिए युवा और उनके परिवार वाले पूरी ताक़त लगा देते हैं वैसे ही खेलों को भी अगर वो करियर की तरह देखें तो देश में खेल संस्कृति पैदा होगी !

खेलों को बड़ी कंपनियों की अधिक स्पॉन्सरशिप मिल सकेगी. अगर टारगेट 2020 या 2024 में कुछ खेलों में स्वर्ण पदक हासिल करना है तो काम अभी से शुरू करना होगा !

ध्यान क्रिकेट से आगे :-
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अगर क्रिकेट ओलंपिक खेलों में शामिल होता तो भारत को स्वर्ण पदक मिल सकता था. लेकिन क्रिकेट एक टीम स्पोर्ट है !
ये आपको केवल एक ही पदक दिला सकता है. इसके बावजूद पूरा देश क्रिकेट का दीवाना है !

अगर ओलंपिक में पदक हासिल करना है तो ये दीवानगी थोड़ी कम करनी पड़ेगी !

जीतने वाली मानसिकता :-
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खेलों के कई विशेषज्ञ कहते हैं कि भारतीय खिलाड़ियों में कुछ कर दिखाने की प्रवृति नहीं दिखाई देती ~

जीत की मानसिकता और किलर स्टिंक्ट के कारण चौथे स्थान पाने वाले खिलाड़ी तीसरे नंबर पर आ सकते हैं और पदक तालिका बढ़ाई जा सकती है !

यह मानसिकता पैदा करने के लिए यूरोप और अमरीका में अलग से प्रोग्राम चलाये जाते हैं !

सुविधाएं :-
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अगरतला में दीपा कर्मकार को हासिल सुविधाएं अफ़सोसनाक हैं, अगर ये सुविधाएँ अन्तरराष्ट्रीय स्तर की होती तो शायद दीपा आज एक पदक लेकर देश वापस लौटती !

ये सभी जानते हैं कि भारत में खेलों की सुविधाएं बहुत कम हैं, लेकिन ओलंपिक खेलों के बाद इस पर चर्चा तक नहीं होती !

क्या आपको मालूम है कि 2024 ओलंपिक खेलों को आयोजित करने की भारत में सलाहियत क्यों नहीं है ?

क्योंकि यहाँ ओलंपिक स्तर की सुविधाएं नहीं हैं.
भारत को अगर ओलंपिक की महिमा चाहिए तो सुविधाओं में इज़ाफ़ा करना होगा !

इसके इलावा अच्छे कोच, अच्छी ख़ुराक और अच्छी वर्ज़िश पर भी ध्यान देना होगा !!

Data Source :-
http://khabar.ibnlive.com/blogs/parun/sports-organizations-political-leader-436911.html

http://www.bbc.com/hindi/india/2016/08/160824_olympics_india_za?ocid=socialflow_twitter