शनिवार, 2 मार्च 2013

I P L बोले तो~~~~~~!!

पहले क्रिकेट को देश के गौरव, आत्म सम्मान और देश प्रेम से जोड़ा गया....फिर इस खेल को वन डे, T - 20 और I.P.L. के रूप में तोडा मरोड़ा गया...फिर इसमें ग्लेमर घुसेड़ा गया..फिर तो  यह एक नशा सा बन गया...भारत के पारंपरिक खेलों को कुचलता यह खेल ...देश के राष्ट्रिय खेल हाकी से भी बड़ा, सम्माननीय  और गौरव शाली का दर्जा पाता गया , तब जब यह क्रिकेटिया नशा भारतियों की नसों में ढंग से इंजेक्ट हो गया ..लोग इस नशे के आदि हो गए .. तो क्रिकेट खेलने की जगह एक प्रोडक्ट की तरह बेचने का दौर जो चला तो सब हदें पार हो गयीं....! देश में क्रिकेट को मल्टी नेशनल कंपनियों, स्पांसरों, और कारपोरेट घरानों ने एक PRODUCT के रूप में परिवर्तित कर दिया...और अब उसकी जमकर मार्केटिंग और मुनाफाखोरी हो रही है...!

मैदान में बीयर पान, घूम्रपान, कन्याओं (चीयर लीडर्स) का अर्ध नग्न नाच, फिक्सिंग, पार्टियाँ, मार पीट, छेड़ छड...काला धन....बिकते खिलाड़ी...बहकते खिलाड़ी...गलियाते टीम मालिक...गुर्राते BCCI अधिकारी.....लाचार खेल मंत्रालय....! खिलाड़ी...खुशहाल , टीम मालिक...मालामाल..., BCCI कहे  कि .सब की ठन ठन गोपाल , ...ठगा गया और घाटे में रहा तो आम क्रिकेट प्रेमी......!

जय हो तुम्हारी ललित मोदी...क्या चस्का लगाया है...अफीम की तरह क्रिकेट को पिला डाला....
IPL की ही बदौल अरबों रूपये डकार कर भी लन्दन में ऐश कर रहे हो......कानून की पकड़ से दूर !..क्रिकेट संघों में जब तक नेताओं, अभिनेताओं, और कारपोरेट घरानों का दखल रहेगा...यह ऐसे ही बिकता रहेगा...इसको रोकने के लिए...क्रिकेट संघों में ज्यादा से ज्यादा पूर्व खिलाड़ियों को शामिल करना होगा.....BCCI पर सरकारी नियंत्रण होना चाहिए...मगर ...यह सब बहुत मुश्किल लग रहा है...क्योंकि BCCI जैसे दैत्य अब बहुत ही विकराल हो चुके हैं.....देश के कानून की पहुँच से भी बाहर..RTI से भी बाहर  ! BCCI को फेमा तथा इनकम टेक्स के 19 के लगभग नोटिस दिए जा चुके हैं...जो कि शायद BCCI की किसी रद्दी की टोकरी की शोभा बढ़ा रहे होंगे, यह वही BCCI है जिसे सरकार की और से 10 सालों में 19 अरब रुपये की छूट  हासिल हो चुकी है...! आज मुझे न जाने क्यों.....यूगांडा के पूर्व सैनिक तानाशाह स्व. ईदी अमीन की अचानक याद हो आयी जिसने यूगांडा की राष्ट्रिय फुटबाल टीम को हार कर आने पर कोड़ों की सजा सुनाई थी...और एक माह खेतों में काम करने गाँव भेज दिया था.....यह बात याद तो आयी मगर...क्यों....क्या पता....??

एक आइकोनिक फोटो के पीछे की मार्मिक कहानी ~~~!!

सूडान में एक कुपोषित बच्ची के मरने के इंतज़ार में उसके पास बैठा एक गिद्ध.....!! इस फोटो को सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर न जाने कितनी बार लाखों ..करोड़ों लोगों द्वारा  शेयर किया गया है, करोड़ों लोगों ने इसको टेग किया है...मगर क्या इसके पीछे की मार्मिक कहानी किसी को पता है....? इस फोटो को खींचने वाले फोटोग्राफर ने तीन माह बाद पश्चाताप  में आत्म हत्या कर ली थी...!


यह फोटो मार्च 1993 में मशहूर फोटोग्राफर केविन कार्टर ने भुखमरी और कुपोषण से झूझते देश सूडान के एक गांव आयोद में खींचा था...यह एक सूडानी कुपोषित बच्ची का फोटो है...जो कि अपने माता पिता की झोंपड़ी की और रेंग कर जाने का प्रयत्न कर रही है....माता पिता..खाना ढूँढने जंगल गए हुए हैं....भूख ने उस बच्ची को बेदम कर रखा है...उसकी ताक में एक गिद्ध बैठा है...जो कि उसके मरने का इंतज़ार कर रहा है...केविन कार्टर ने इस दृश्य को देखा ...और अपने कैमरे में क़ैद कर लिया....और उस गिद्ध को वहां से उड़ा दिया ! वैसे इस फोटो के अलावा इथोपिया के इस संकट के उन्होंने और भी कई फोटो खींचे थे...मगर यह फोटो उनको विशेष लगा.....!

वापस आकर केविन कार्टर ने इस फोटो को New York Times को बेच दिया...यह फोटो पहली बार  March 26, 1993 को New York Times में प्रकाशित हुआ था....फोटो का केप्शन था..." metaphor for Africa’s despair "....केविन कार्टर को इस फोटो के लिए प्रतिष्टित पुलित्जर पुरस्कार मिला.... फोटो के प्रकाशित होते ही हज़ारों लाखों लोगों ने केविन कार्टर से इस अफ़्रीकी बच्ची के बारे में हज़ारों सवाल किये...कईयों ने उस पर यह आरोप भी लगाए कि उसने उस समय फोटो खींचना ज्यादा उचित समझा...बामुकाबले...उस हुए बच्चे बच्ची को बचाने के...., वह लोग यह नहीं जानते थे कि उस समय सूडान और इथोपिया में संक्रमित बीमारियाँ फैली थी...और पत्रकारों और फोटोग्राफरों को घायल और दम तोड़ते सूडानी और इथोपियाई लोगों से दूर रहने का आदेश U.N . द्वारा दिया गया था...यही कारण था कि केविन कार्टर उस बच्ची को उठा न पाए....!

केविन कार्टर उस प्रतिष्टित पुलित्जर पुरस्कार का आनंद बिलकुल नहीं ले पाए...उनको हमेशा उस अफ़्रीकी बच्ची की याद आती रही...लोगों के सवाल और उलाहने उनको परेशान करते रहे....उनको यह ग्लानी और अपराध बोध सताता रहा कि उन्होंने उस बच्ची को बचाने की पूरी कोशिश नहीं की....और न ही यह देख पाए कि वो ज़िंदा रही या मर गयी ..इसी अपराध बोध और ग्लानी में वो एकाकी हो गए....और इस फोटो के New York Times में प्रकाशित होने के तीन महीने बाद  उस महान फोटोग्राफर ने जवानी में ही आत्म हत्या कर अपना जीवन समाप्त कर लिया.....! आज भी जब यह फोटो कहीं मेरी नज़र से गुज़रता है...तो मुझे इस आइकोनिक फोटो के पीछे की मार्मिक कहानी...और उस  काबिल फोटोग्राफर के दुखद अंत  की याद हो आती है...!!

फेस्बुकिया फीचर्स और हमारी ज़िन्दगी~~!!

कभी कभी तो लगता है कि ज़िन्दगी और फेसबुक दोनों में कोई फर्क ही नहीं है....कई फेस्बुकिया फीचर्स  हमारे जीवन में भी नज़र आते हैं...अपनी ज़िन्दगी में जब कोई समस्या या दुःख का स्टेटस उपडेट हो जाता है...तो काफी मित्र...और सगे सम्बन्धी...या तो चुपचाप से सरसरी नज़र मारकर बच कर निकल जाते हैं...और दोबारा आपके दुखी प्रोफाइल पर विजिट ही नहीं करते.... कुछ दोस्त और सम्बन्धी होते हैं...जो आपकी स्थिति को  " Like " कर के निकल जाते हैं...कुछ मित्र और नजदीकी जो कि मुरव्वत वाले होते हैं.....वो कुछ देर रुक कर आपकी स्थिति पर दुःख जताते हुए  फार्मल कमेन्ट भी करते हैं...और फिर निकल लेते हैं...मगर ...उस दुःख या समस्या के निराकरण के लिए कोई समाधान बताने देर तक आपके प्रोफाइल पर नहीं रुकता.....कारण साफ़ है...आज के इस दौर में सब यही सोचते नज़र आते हैं कि यदि लोग इन हुए हैं....तो फिर दूसरे के प्रोफाइल में क्यों समय खराब करें.....लोग इन का भरपूर उपयोग अपनी ज़िन्दगी के  प्रोफाइल...और अपने (सामजिक स्तर) स्टेटस के लिए क्यों नहीं करें...? उन सबको अपने अपने प्रोफाइल की चिंता लगी रहती है....उनको अपने अपने स्टेटस अपडेट जो करना होते हैं...! यहाँ हम समयाभाव का कह सकते हैं...जो कि जायज़ भी है...ज़िन्दगी में भी...और फेसबुक पर भी...दोनों जगह...यही मुख्य समस्या नज़र आती है...कई मित्र दोनों ही जगह यही शिकायत करते मिल जाते हैं...!


और कुछ फेस्बुकिया फीचर्स हमारे दैनिक जीवन में दिखाई दे जाते हैं...."POKE" को हे ले लीजिये.....बाज़ार में माल में..गार्डन में...कहीं भी कई बार कोई लड़की किसी लड़के को....और कई लड़के किसी लड़की को
"POKE" करते हुए मिल जायेंगे....और तो और कभी हम भी बन ठन कर अच्छा सा स्टेटस अपडेट show कर देते हैं...तो आज भी हम को सुंदरियों के एक दो "POKE" तो मिल ही जाते हैं, ..इसके अलावा....हम दैनिक जीवन में कई अवांछित लोगों को "BLOCK" भी करते हैं....और जिस से खुन्नस है...उसको "UN FRIEND" भी कर डालते हैं...! और अंत में सबसे विचित्र  फेस्बुकिया फीचर जो कि हमारे जीवन में आदि काल से चला आ रहा है...वो है..."SUBSCRIBER" ...जी हाँ...यह वो लोग होते हैं...जो ना तो आपके सम्बन्धी होते हैं...और न ही आपकी मित्र मंडली में होते हैं...मगर यह आपकी हर गतिविधि को बड़ी चतुराई से देखते...पढ़ते हैं...और आप इन से बेखबर होते हैं...यह आपके हर अपडेट को पूरे मोहल्ले में शेयर भी कर डालते हैं...TAG कर डालते हैं... यह आपके ...हमारे मोहल्ले और  पड़ोस में रहने वाली चुगलखोर आंटी की तरह ही तो होते हैं...! देखिये...आगे और क्या क्या नए फेस्बुकिया फीचर्स आते हैं...जो कि हमारे दैनिक जीवन में...कहीं न कहीं...एक जैसे प्रभाव रखते हों...!!

लोकतंत्र को जनलोकपाल का स्टेरायड इंजेक्शन~~~!!

कहते हैं कि लोकतंत्र जितना पुराना होता है..उतना ही परिपक्व और मज़बूत होता जाता है.....हमारा लोकतंत्र भी परिपक्व  है...विश्व में जाना माना है....मज़बूत है.....परन्तु इस लोकतंत्र को राजनैतिक दलों ने ....नेताओं ने, दलालों ने, पूँजी पतियों ने, गद्दारों ने, पाखंडियों ने, मुनाफा खोरों ने  इन बीते वर्षों में कई व्याधियां दी हैं...वैसे तो समय समय पर लोकतंत्र की इन व्याधियों को हरने और कम करने के कई समाज सेवियों ने भरपूर प्रयास किये...कई आन्दोलन चले...मगर जैसा कि कहा जाता है कि आंदोलनों से और जन सहभागिता से लोकतंत्र का शुद्धिकरण होता है...इस बार अन्ना हजारे और उनकी टीम और बाबा रामदेव  ...मिश्र के तहरीर चौक को भारत में जिंदा करने की जिद के रूप में...अपने जनलोकपाल आन्दोलन रुपी स्टेरायड के इंजेक्शन और काले धन रुपी टानिक को लेकर मैदान में कूदे हैं...और दावा करते हैं कि उनके इस स्टेरायड इंजेक्शन की बदौलत लोकतंत्र फिर से तगड़ा और हष्ट पुष्ट हो जाएगा...मगर उनके इस इंजेक्शन के स्टेरायड के कंटेंट में कुछ ऐसे तत्व हैं...जिन पर लोकतंत्र के रखवालों को ऐतराज़ है...जैसे कि लोकपाल के दायरे में प्रधान मंत्री को लाना, सी.बी.आई.को स्वतंत्र एजेंसी बना देना....आदि आदि, अन्ना अपने इंजेक्शन के कंटेंट पर अड़े हैं...और राजनैतिक पार्टियां अपनी जिद पर...!

दूसरी बात अन्ना को यह कोई समझाने वाला नहीं है कि आप जो इंजेक्शन लगा रहे हो...वो कोई जादुई नहीं है...इससे लोकतंत्र की सारी व्याधियां दूर नहीं होने वाली...भ्रष्टाचार के अलावा भी देश में कई गंभीर मुद्दे हैं...गरीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी, कुपोषण से मरते नवजातों की बढती संख्या...निरक्षरता...नक्सल समस्या...आतंकवाद, साम्प्रदायिकता...आदि इत्यादि....आपके इस एक जादुई इंजेक्शन से यह दूर होने वाली नहीं है.....और दूसरी बात यह कि जहाँ दोनों बड़े राजनैतिक दल आपके जन लोकपाल बिल रुपी स्टेरायड इंजेक्शन के कन्टेन्ट को सिरे से खारिज कर चुके हैं...तो फिर आप का यह इंजेक्शन लोकतंत्र को लग ही नहीं सकता...तो फिर आप इस को बार बार क्यों निकाल कर जनता को भ्रमित कर रहे हो...वैसे भी  दूसरी और आपकी टीम आपसे ज्यादा जनता को भ्रमित कर चुकी है... मेरे विचार से तो आप इस इंजेक्शन के कुछ कन्टेन्ट आपसी सहमती से कम कर करा कर इस को इंजेक्ट कर दें तो ठीक है...अन्यथा इसको अपने गाँव में कोई Museum   हो तो वहां रख दीजिये ! क्योंकि जब देश के दोनों बड़े राजनैतिक दल आपके इस जनलोकपाली इंजेक्शन के कन्टेन्ट पर राज़ी नहीं है...तो फिर इसका औचित्य ही क्या रहा...??

दूसरी और बाबा रामदेव भी इस लोकतंत्र को काला धन रुपी टानिक पिलाने पर उतारू हैं...वो पूरे देश में घूम घूम कर इस टानिक का प्रचार कर रहे हैं...उनका कहना है कि इस टानिक पीकर लोकतंत्र का हिमोग्लोबिन काफी बढ़ जाएगा...वो कहते हैं कि मैं काला धन वापस लाऊंगा...हर भारतीय को करोडपति बनाऊंगा....अब क्या जनता इतनी मूर्ख है कि बाबा की बातों पर विश्वास कर लेगी...? या फिर काला धन वाले इतने मूर्ख हैं कि इतना हल्ला होने पर भी अपना काला धन...विदेशी बेंको में केवल इसलिए रख छोड़ेंगे कि कब बाबा जी आयें.....और इसको भारत ले जाएँ....काला धन का टानिक केवल जनता को भ्रमित करने वाला है...! आज Globalization के दौर में....Swiss Banks के अलावा भी कई देश गुप चुप यह कार्य कर रहे हैं...कई tax heaven पैदा हो गए हैं...जहाँ काला धन खपाया जा सकता है....! यदि कभी ..काला धन जो कि लाख करोड़ में हैं...वापस भी आया तो सिर्फ करोड़ों में ही आएगा...जो की कुल जमा का 0 .1 % भी नहीं होगा....!!

कभी तो लगता है...कि इस लोकपाल के  इंजेक्शन.....और यह काले धन का टानिक से लोकतंत्र को फायदा हो न हो.....देश में इन इंजेक्शन और टानिक वालों का डिज़ाईनर प्रचार प्रसार और मार्केटिंग जम कर हो रही  है...और शायद यह चाहते भी यही हैं, ऐसा लगने लगा है कि .इस प्रचार और मार्केटिंग से उपजे उबाल को मथ कर कही यह अपना राजनैतिक निवेश तो नहीं कर रहे.....? कहीं यह इंजेक्शन और टानिक किसी राजनैतिक कंपनी के तो नहीं हैं.....? खैर...हम तो यही चाहते हैं...कि हमारे लोकतंत्र को अन्ना का यह जनलोकपाली इंजेक्शन आपसी सहमति से जल्दी लगे और बाबा जी का काले धन का टानिक भी बाबा जल्दी पिला कर हमारे लोकतंत्र का कुछ तो भला करें.....!!

बाबाओं का भी प्लेसिबो ( Placebo ) इफेक्ट ~~~~!!


प्लेसिबो ( Placebo ) एक लेटिन  शब्द है...जिसका अर्थ होता है..."I will please"  इसका सबसे पहले औषधीय प्रयोग 18 वीं शताब्दी में हुआ था....आधुनिक चिकित्सा पद्धति मे इसे Faith Healing  अर्थात यकीन आधारित उपचार का एक अंग माना गया है। मानसिक रोगो के उपचार मे भी इसका काफी उपयोग होता है। इसकी विस्तृत साइंटिफिक  व्याख्या बहुत लम्बी है...इस प्लेसिबो ट्रीटमेंट (यानि दवा रहित गोलियो या इसी तरह का उपचार) का प्रयोग आधुनिक शोधो मे भी होता है। आधुनिक चिकित्सा पद्ध्तियो मे ऐसी गोलियाँ सफलतापूर्वक उपयोग की जा रही है। यह बहुत ही हैरत की बात है कि कैसे बिना दवा के रोगी ठीक हो जाता है या उसे लाभ पहुँचता है। इसका मतलब यह हुआ कि उसका अपना ‘विश्वास’ बहुत बडा काम करता है। एक रिपोर्ट के  अनुसार 60% लोगों को प्राइवेट प्रेक्टिशनरों ने Prescriptions ही गलत लिखे थे लेकिन मरीज़ फिर भी अच्छे हो गए .जब डॉ कहता है "चिंता न करो ,तीन चार दिन में बिलकुल ठीक हो जावोगे "तो यह आश्वस्ति ही प्लेसिबो बन जाती है ..आपने इसी ‘विश्वास’ के असर की झलक मुन्ना भाई एमबीबीएस मे भी देखी होगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि दवाओं का असर तब और ज्यादा होता है जब मरीज को उन दवाओं पर भरोसा हो।

यूरोप में  एक हज़ार लोगों पर प्रयोग किया गया  वो सर्दी-जुकाम से पीडित थे। उनमें से कुछ लोगों को कोई दवा नहीं दी गई और कुछ लोगों को यूं ही कुछ खाली केप्सूलों में ग्लूकोज़ दिया गया । शोधकर्ताओं ने पीडितों को बताया कि उन्हें सदी-जुकाम से निजात दिलाने के लिए नया एंटी बायोटिक्स  दिया जा रहा है। कुछ दिन बाद देखा गया कि जिन मरीजों को खाली केप्सूलों में ग्लूकोज़ दिया गया था वो जल्दी ठीक होने लगे...और जिनको कोई दवा नहीं दी गयी वो बीमार ही रहे !  बिना दवा खाए या कोई बेअसर दवा खाने से आराम पाने को मेडिकल की दुनिया में "प्लेसिबो इफेक्ट" कहा जाता है। इसमें बीमार ये सोचता है कि दवाएं खाने से वो ठीक हो रहा है लेकिन वास्तव में दूसरे कारणों से स्वास्थ्य में सुधार हो जाता है, जिसमें उसकी मानसिक संतुष्टि भी बहुत काम करती है...। बीमारियों के इलाज के लिए दवाओं पर भरोसा जरूरी है।

तब क्या आज कल के बाबाओं द्वारा लोगो को बताये जा रहे उलटे सीधे टोटकों का और  गंडे -तावीजों , आसन,  दवाइयां,  और  मौलाना साहिब के पढ़े हुए पानी आदि में भी प्लेसिबो असर होता है ...? जी..बिलकुल होता है...बल्कि यह लोग खा चाट ही इस प्लेसिबो इफेक्ट की बदौलत रहे हैं...आज निर्मल बाबा का नाम हर जगह छाया है....इनका प्लेसिबो इफेक्ट बहुत ही ज़बरदस्त है...देखा गया है कि कोई बाबा कहता है...की अपने पलंग के नीचे पीपल का पत्ता रख दो...रात को नींद अच्छी आएगी ..उस व्यक्ति को मानसिक तौर पर विश्वास हो जाएगा... ....तो यह निश्चित है. कि.. वो अपने आप ही समय पर सो जाएगा...जब कि उस पीपल के पत्ते का इसमें कोई रोल नहीं है...आज इसी प्लेसिबो इफेक्ट के दम पर बाबा लोग रोकड़ा बटोर रहे हैं......कोई ज्योतिषाचार्य टी.वी. पर अजब अजब उपाय बता कर तो कोई वास्तु बाबा घर के चीज़ों को इधर से उधर रखवा कर...  और बाबा ही नहीं कई मुन्ना भाई डाक्टर भी इस मनोवैज्ञानिक आश्वस्ति या फेथ हीलिंग के दम पर अपनी पौ बारह किये बैठे हैं...और यह भी सच है कि आप और हम इस प्लेसिबो इफेक्ट के कारण ही कई बाधाएं भी पार कर जाते हैं...और कई बीमारियों पर विजय भी पा जाते हैं...यह कहीं न कहीं दवाओं से ज्यादा हमारे आत्म विश्वास  और मानसिक दृढ़ता को भी प्रकट करता है, और तो और यह प्लेसिबो इफेक्ट कही��� न कही हमारे सामाजिक और पारिवारिक जीवन पर भी किसी न किसी रूप में असर अंदाज़ होता है...यहाँ इसका प्रभाव आपसी समझ और विशवास की भावना से पैदा होता है.!

सोचिये यदि यह प्लेसिबो इफेक्ट नहीं होता तो ना जाने क्या होता...??


शुक्रवार, 1 मार्च 2013

भाजपा के लिए हास्यास्पद सर दर्द ~~!!

बार बार मोदी का नाम 2014 के चुनावों हेतु प्रधानमंत्री के लिए  आगे कर जहाँ एक और भाजपा देश और NDA के राजनैतिक तापमान को माप रही है,  वहीँ दूसरी और अंदरूनी कलह से परेशान हुई बैठी भाजपा खुल कर मोदी को अगले प्रधान मंत्री के लिए प्रोजेक्ट भी नहीं कर रही है ..इनकी गाडी दो क़दम आगे जाती है, तो दूसरे ही दिन तीन क़दम पीछे भी हो जाती है, कभी ख़ुशी ...तो कभी ग़म ...वाली बात हो रही है, वैसे इनका संकट बहुत गहरा है !

खुद मोदी ने अपने आपको पी आर एजेंसियों की मदद और मीडिया की मदद से अपनी ऊंचाई तो बढवा ली, तो दूसरी और भाजपा ने भी इस बढे हुए प्रायोजित क़द का गुणगान करना शुरू कर दिया, अब चाहे वो कुम्भ में साधू संतों से मोदी का समर्थन कराना हो या कालेजो में विकास के झुनझुने पर भाषण !

और नतीजा यह हुआ कि  इन्होने मोदी का क़द अपनी पार्टी से भी बड़ा करा करा कर ...खुद ही आफत मोल ले ली है, अब न भाजपा मोदी को निगल ही सकती है, और ना ही उगल सकती है, दूसरी और NDA के बड़े सहयोगी दलों ने भी इस " मोदी मोदी खेलने " के तमाशे पर आँखें तरेंरना शुरू कर दिया है, कभी नीतीश की घुड़की ...तो कभी मुलायम की गुगली तो कभी फर्जी एन्काउन्टर हो या दंगो के केस ...से हैरान भाजपा ...बेकफुट पर आ जाती है, अब ऐसे में यह लोग मोदी महोदय को कभी गुजरात तो कभी दिल्ली के चक्कर लगवा कर बहला रहे हैं, अब आगे आगे देखिये होता है क्या ? अभी अडवानी कथा भी तो बाक़ी है !!

हमारी अरज भी सुनो वित्त मंत्री जी ~~~!!


मध्यम वर्ग इस बजट से निराश ही नहीं बहुत आक्रोश में भी है, जहाँ नौकरी पेशा वर्ग को टेक्स स्लेब में कोई राहत नहीं दी गयी है, वहीँ दूसरी और digitization होने जा रहे देश में सेट टॉप बॉक्स को महंगा किया गया है, दूसरी और सूचना क्रांति के दौर में 2 हज़ार से ऊपर के मोबाइल भी महंगे किये गए है, गेस, पेट्रोल और डीज़ल के बढे दामो से त्रस्त सबसे ज्यादा यही माध्यम वर्ग ही है, यह वही मध्यम वर्ग है, जिसने कभी बढ़ी हुई प्याज की कीमतों से क्रुद्ध होकर सरकार बदल डाली थी, इस वर्ग को GDP के आंकड़ों के मायाजाल से कोई लेना देना नहीं, आपने महिलाओं को विदेश से एक लाख का सोना लाने के लिए ड्यूटी फ्री कर दिया है, कितनी महिलायें और कौनसी महिलायें इससे प्रसन्न होंगी, सब जानते हैं !
आपने एक करोड़ से ऊपर के आय वालों पर दस प्रतिशत का टेक्स लगाया है, ऐसे लोग देश में लगभग 42000 के लगभग ही है, इससे क्या साबित करना चाहते हैं, ? गरीबों को मानसिक संतुष्टि देना कि  देखो हमने अमीरों पर भी टेक्स लगाया है ! पर  आप भले ही देश की अर्थव्यवस्था को  होमोपेथी की पुडियाएं देने की कोशिश कर रहे हों, मगर इस समय त्रस्त जनता को कुछ instant relief चाहिए, पे-दर-पे एक के बाद एक आर्थिक बोझ से दबा कुचला यह वर्ग ....आपके तथा कथित आने वाले विकास के वादों पर अब नहीं बहलने वाला, इसके आक्रोश को समझिये, या फिर इसके आक्रोश की चिंगारियों को आने वाले समय में वोटिंग मशीनों से निकलता देखिये।
(अभी अभी ब्लॉग लिखते लिखते समाचार सुना कि बजट के फ़ौरन एक दिन यानी 1 मार्च '2013 की मध्य रात्रि से  पेट्रोल की कीमत 1रुपया 40 पैसे की वृद्धि कर दी गयी है ...कुचलिये और कुचलिये ..हमारे शहर के साहित्यकार श्री शरद तैलंग जी ने शायद ऐसी ही परस्थिति पर यह अशाअर लिखे थे :-

कभी जागीर बदलेगी, कभी सरकार बदलेगी,

मगर तक़दीर तो अपनी बता कब यार बदलेगी ?



अगर सागर की यूँ ही प्यास जो बढती गई दिन दिन,

तो इक दिन देखना नदिया भी अपनी धार बदलेगी...!!
(शरद तैलंग)