आंद्रे ब्रेविक ने नार्वे में जो नर संहार किया है, उसकी तैयारी और वैचारिक पूर्ती उसको नेटवर्किंग साईट्स से ही मिली थी, और यह ऐसी sites के दुरूपयोग कि एक जिंदा मिसाल है, कट्टरपंथ से आतंक की राह भी निकल सकती है, यह इस घटना से साफ़ हो गया है, और अब हमारे देश में भी ऐसे न जाने कितने ब्रेविक और कसाब तैयार किये जा रहे हैं, फेसबुक पर ऐसे कई संगठनो द्वारा चलाये जा रहे समूहों की अचानक बाढ़ सी आ गयी है, और इनमें ज़्यादातर का जन्म अन्ना हजारे के आन्दोलन के बाद India Against Corruption (IAC) समूह की सफलता को देख कर हुआ, इस भ्रष्टाचार के विरुद्ध आरम्भ हुए इस आन्दोलन की आड़ लेकर अब फेसबुक पर सैंकड़ों की संख्या में प्रायोजित समूह पैदा हो गए हैं...जहाँ ऐसी रेवड़ियाँ बांटी जा रही हैं, और भ्रष्टाचार के विरुद्ध चलाये जा रहे आन्दोलन के गर्म तवे पर खूब कई प्रकार की रोटियां सेंकी जा रही हैं, कसाब और ब्रेविक की तरह युवा वर्ग का brain wash किया जा रहा है, मगर यह समूह और इनको चलने वाली मूढ़ बुद्धि लोग यह क्यों नहीं सोचते की ऐसे कसाब ब्रेविक अगर उन्होंने पैदा भी कर दिया तो वो कर क्या लेंगे..?.केवल अशांति और विध्वंस ही तो कर सकते हैं..जैसे ब्रेविक ने किया जैसे कसाब ने किया..अरबों के इस देश में ऐसे समूह और ऐसे brain washed लोग सौ दो सौ लोगों को ही मार सकते हैं...किसी देश के system को कभी भी ऐसे मुठ्ठी भर सर फिरे नहीं बदल सकते...system को बदलने के लिए अन्ना हजारे जैसे व्यक्ति की इस देश को आवश्यकता है, न की ब्रेविक या कसाब जैसे लोगों की,यह फेसबुक के दुरूपयोग का जीता जागता उदाहरण भी है इस देश में, ऐसे तो कभी भी देश में तहरीर चौक जिंदा ही नहीं हो सकता, दूसरी और ऐसे देशप्रेमी लोग भी हैं जो सच्चे मन से बढ़िया समूह बनाकर देश के ज्वलंत मुद्दों पर आमराय बना रहे हैं..और भ्रष्टाचार के विरुद्ध चलाये जा रहे आन्दोलन को आमजन तक पहुंचा रहे हैं, मंथन कर रहे हैं...इस आन्दोलन को सड़कों सड़कों और गलियों गलियों तक ले जा रहे हैं....वे धन्यवाद के पात्र हैं...और उनके जज्बे और मेहनत को मेरा सलाम....जय हिंद..!!
बुधवार, 27 जुलाई 2011
रविवार, 17 जुलाई 2011
आओ tweet करें~~~~~~~~~~!! =====================
Social Networking Sites ने इस दौर को दो ऐसी चीज़ें भी दी हैं..जिसका दुरूपयोग भी उतना ही हो रहा है जितना की उपयोग...और वो हैं..पहला facebook ..और दूसरा है tweeter ...! ट्वीटर का नाम आते है हमें IPL के दौरान शशि थरूर और ललित मोदी के बीच हुए ट्वीटर युद्ध याद आ जाता है, और इसी युद्ध के कारण थरूर की कुर्सी भी चली गयी थी ! और फिर एक बार ट्वीटर सुर्ख़ियों में है...मुंबई बम ब्लास्ट के बाद महान हस्तियों ने खूब ट्वीट किये..सामयिक मुद्दों पर फिल्म बनाने वाले और फैशन फिल्म के निर्माता मधुर भंडारकर उस समय एक फैशन शो के मज़े ले रहे थे, जब मुंबई ब्लास्ट हो चुके थे....और वो लगातार ट्वीट कर के अपनी भावनाए बता रहे थे, लोगो को पुलिस कंट्रोल रूम के नंबर भी ट्वीट कर रहे थे.. और सुन्दर बालाओं की केटवाक वाली महफ़िल में डूबे हुए भी थे !
दूसरा उदाहरण शाहरूख खान का है...ब्लास्ट के समय यह भी " ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा " फिल्म के सितारों के साथ पार्टी के मज़े ले रहे थे...और लोगों को ट्वीट कर के दुःख भी जता रहे थे. यह दोनों वही लोग हैं जिनको मुंबई ने एक पहचान दी है...और मुंबई के लोग इन लोगों को सर आँखों पर बैठाते हैं...इन के केर्रिएर और TRP बढाते है, और इन लोगों ने ऐसे दुखद समय में मुम्बईकरों के साथ भद्दा मजाक किया है, यह Celebrity बाजारवाद के मोहरे हैं....इन को केवल अपनी TRP और Career की पहले चिंता है, न देश की न जनता की, इन की फिल्म हिट होना ज़रूरी है...इसके लिए यह किसी हद तक भी जा सकते हैं....माई नेम इस खान फिल्म के लिए शाहरुख़ खान ने अमेरिका में जो ड्रामा किया था...वो इसका एक उदाहरण है....यह लोग ...भावनाओं से खेल कर अपना उल्लू सीधा कर काम निकालने में माहिर हैं....और अब तो इन के हाथ एक और हथियार और लग गया है...नाम है....ट्वीटर, ...तो आओ दोस्तों.हम इनके ज़मीर और अंतरात्मा को एक .tweet करें कि कुछ भी करो मगर ऐसे हादसों के समय ऐसे मजाक करके लोगों के ज़ख्मों पर नमक तो नहीं छिड़का करें..!!
दूसरा उदाहरण शाहरूख खान का है...ब्लास्ट के समय यह भी " ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा " फिल्म के सितारों के साथ पार्टी के मज़े ले रहे थे...और लोगों को ट्वीट कर के दुःख भी जता रहे थे. यह दोनों वही लोग हैं जिनको मुंबई ने एक पहचान दी है...और मुंबई के लोग इन लोगों को सर आँखों पर बैठाते हैं...इन के केर्रिएर और TRP बढाते है, और इन लोगों ने ऐसे दुखद समय में मुम्बईकरों के साथ भद्दा मजाक किया है, यह Celebrity बाजारवाद के मोहरे हैं....इन को केवल अपनी TRP और Career की पहले चिंता है, न देश की न जनता की, इन की फिल्म हिट होना ज़रूरी है...इसके लिए यह किसी हद तक भी जा सकते हैं....माई नेम इस खान फिल्म के लिए शाहरुख़ खान ने अमेरिका में जो ड्रामा किया था...वो इसका एक उदाहरण है....यह लोग ...भावनाओं से खेल कर अपना उल्लू सीधा कर काम निकालने में माहिर हैं....और अब तो इन के हाथ एक और हथियार और लग गया है...नाम है....ट्वीटर, ...तो आओ दोस्तों.हम इनके ज़मीर और अंतरात्मा को एक .tweet करें कि कुछ भी करो मगर ऐसे हादसों के समय ऐसे मजाक करके लोगों के ज़ख्मों पर नमक तो नहीं छिड़का करें..!!
रविवार, 19 जून 2011
कौन नालायक कहता है कि हम ग़रीब है.....??
by Asif Ali Hashmi on Sunday, June 19, 2011 at 2:14am
और शरद पंवार को भ्रष्टाचार में मात दे दी....
जगन रेड्डी के पास 365 करोड़ कि संपत्ति....
सुरेश कलमाड़ी ने कोमोन्वेल्थ खेलों के आयोजन में 100 करोड़ का घोटाला किया...
कनिमोझी को 200 करोड़ रूपये के लेनदेन में जेल....
येदुरप्पा पर करोड़ों के ज़मीनी घोटाले का आरोप ......
यह हमारे देश के कुछ नेता और राजनेता.....और उनके कुछ कारनामे जो बाहर आयें और हमें पता चला...
यह हमारा दुर्भाग्य है कि ...देश के नेताओं की पैसे के हवस ने इस देश को लूट लूट कर लहू लुहान कर दिया....
और दूसरी और......
स्व. आचार्य रजनीश..... .अमरीका में विशाल आश्रम ...अमीर भक्त, और राल्स रायस कारों का काफिला........
स्व. धीरेन्द्र ब्रह्मचारी.....वायुयान तक तोहफे में दे दिया था...
चन्द्र स्वामी.....अदनान खशोगी ( हथियारों का अंतर्राष्ट्रीय दलाल) से रिश्ते और बोफोर्स सौदे में संदिग्ध भूमिका.....स्व. पुट पार्थी साईँ .....98 किलो सोना, 300 किलो चाँदी, 11 करोड़ से अधिक नकदी, और विदेशी मुद्रा की जांच चल रही है...
बाबा रामदेव...1177 करोड़ की आय....( केवल 4 ट्रस्टों से ) शेष 200 से अधिक कंपनियों की आय व्यय ...का पता नहीं....यह हैं हमारे देश के कुछ बाबा......और उनके साम्राज्य की झलक .....
इस सूची में और भी कई साम्राज्य हैं.....
परन्तु प्रश्न उठता है .....कि......क्या इन सब के साम्राज्य ऐसे होना.....हमारे लिए....
1 गर्व की बात है.....?
२. दुःख की बात है...?
3 . शर्म की बात है....?
4 . सोचने की बात है...?
जिस देश में किसान आत्म हत्याएं कर रहे हों......जहाँ ..गर्भवती औरतें अस्पतालों के दरवाजों पर बच्चे पैदा करने को मजबूर हों....उस देश के नेता , और बाबा दोनों के आय व्यय के आंकड़े भी हर कुपोषित बच्चे कि मौत पर उनकी आय में एक शून्य लगा रहा हो जैसे. हैं.....यह एक सोचने कि बात है ....
क्यों यह नेता लोग और बाबा लोग हर बार ये बात भूल जाते हैं की....." कफ़न में जेब नहीं होती " ......!!!
बुधवार, 15 जून 2011
देशभक्ति के झंडे का फंडा~~~~~~~!!
फेसबुक पर अचानक एक नयी लहर से चल पड़ी है....हर तरफ आन्दोलन और देशभक्ति के नारे, आरोप, प्रत्यारोप, वाद, विवाद और देशभक्ति के नारों से फेसबुक गुंजायमान हो गया है...हर पेज और ग्रुप के हाथ में हर आदमी के हाथ में देशभक्ति का झंडा नज़र आ रहा है.. ख़ुशी की बात तो है...परन्तु इस के मूल से शुरू करें तो इस देशभक्ति के झंडे के फंडे ही अलग नज़र आते हैं...!
सबसे पहले श्री अडवाणी जी ने कहा की काले धन को भारत वापस लाओ, उनके हाथ में झंडा नज़र सा आने लगा...मगर इस मुद्दे को उठा कर खुद झंडे को ले कर बैठ गए....फिर बाबा रामदेव जी ने कहा भ्रष्टाचार मिटाओ ...और एक झंडा उन्होंने भी उठा लिया..उन्होंने उस झंडे को उठा तो लिया, मगर नारा जो लगाया था, उस को क्रियान्वित करना भूल गए...फिर एक दिन अचानक श्री अन्ना हजारे जी जिसने भ्रष्टाचार में लिप्त 6 मंत्री और 463 अधिकारियों को नपवा दिया था...एक दिन यह झंडा ले कर अपने 5 -7 साथियों के साथ जंतर मंतर पर आ कर बैठ गए....और भरष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजा डाला..और सरकार को नचा डाला !
जब अन्ना के हाथ में झंडा था..और वे सरकार को पसीने पसीने कर रहे थे...अनशन कर दिया था..तब फेसबुक पर पेजेस /ग्रुप्स और लोगों के हाथ में देशभक्ति के झंडे की बजाये...टीम इंडिया की जीत का बासी झंडा ही नज़र आ रहा था...जैसे जैसे अन्ना के आन्दोलन का तवा गर्म होता गया और ...झंडा ऊंचा होता गया...लाइव टेलीकास्ट होने लगा.. लोगों ने भी एक एक झंडा उठा लिया..., अडवाणी जी ने कहा की यह झंडा तो मेरे पास था और में ने ही इसको पहले उठाया था, उधर बाबा रामदेव बोले की...अन्ना से पहले से ही यह झंडा मैंने उठाया था...और उन्होंने अन्ना की टीम के एक सदस्य के झंडा उठाने पर आपत्ति टी.वी. पर बयान दे कर ज़ाहिर कर दी...!
और एक दिन अपना झंडा लेकर खुद रामलीला मैदान में भक्तों को आमंत्रित कर के खुद का झंडा ज्यादा ऊंचा दिखाने की ललक लिए अनशन क्रिया के लिए बैठ गए....तब सरकार को लगा की यह झंडे तो सरकार के झंडे से भी ज्यादा ऊंचे होते जा रहे हैं...तो सरकार ने सरकारी दिखाई और अपने झंडे में से डंडा निकल लिया ...और जो भी उस दिन हुआ कोई उस को काला दिवस कह रहा है कोई दमन दिवस...जो भी हुआ उसके मूल की पहेली कभी भी न तो सरकार सुलझाएगी...और न ही बाबा जी...!
खैर...उस काण्ड के बाद बाबा जी अपना झंडा ले कर अपने आश्रम पधार गए...अब यह झंडे का झगडा हर जगह दिखाई दे रहा है...कभी बाबा अपना झंडा अन्ना के झंडे के साथ बाँध कर ऊंचा करना चाहते हैं..कभी सेना बना कर सैनिकों के हाथ में देना चाहते है...कुल मिला कर .....इस के बाद झंडा पुराण चल पड़ी.....और अब हर हाथ में एक झंडा है....और हर कोई यह कह रहा है की मेरा झंडा तेरे से ऊंचा है..! जब अन्ना हजारे ..जंतर मंतर पर बैठे थे तब यह व्यक्तिगत झंडे न जाने कहाँ थे....? अब न जाने ....किस का झंडा सब से ऊंचा रहेगा....और इस झन्डे के फंडे में से कोई और झंडा तो नहीं निकल आएगा......चिंतन मनन जारी है.....
( इन सब के झंडों से ऊंचा एक झंडा स्वामी निगमानंद जी का मानता हूँ, जिसने गंगा नदी के सौन्दर्य और गौरव के लिए अपने आपको मिटा दिया....उस वीर और देशभक्त को मेरा सलाम...!!! काश आप के बलिदान से यह बाबा रामदेव, अन्ना हजारे और ये सरकारें, राजनीतिक दल कुछ सबक लें...)
सबसे पहले श्री अडवाणी जी ने कहा की काले धन को भारत वापस लाओ, उनके हाथ में झंडा नज़र सा आने लगा...मगर इस मुद्दे को उठा कर खुद झंडे को ले कर बैठ गए....फिर बाबा रामदेव जी ने कहा भ्रष्टाचार मिटाओ ...और एक झंडा उन्होंने भी उठा लिया..उन्होंने उस झंडे को उठा तो लिया, मगर नारा जो लगाया था, उस को क्रियान्वित करना भूल गए...फिर एक दिन अचानक श्री अन्ना हजारे जी जिसने भ्रष्टाचार में लिप्त 6 मंत्री और 463 अधिकारियों को नपवा दिया था...एक दिन यह झंडा ले कर अपने 5 -7 साथियों के साथ जंतर मंतर पर आ कर बैठ गए....और भरष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजा डाला..और सरकार को नचा डाला !
जब अन्ना के हाथ में झंडा था..और वे सरकार को पसीने पसीने कर रहे थे...अनशन कर दिया था..तब फेसबुक पर पेजेस /ग्रुप्स और लोगों के हाथ में देशभक्ति के झंडे की बजाये...टीम इंडिया की जीत का बासी झंडा ही नज़र आ रहा था...जैसे जैसे अन्ना के आन्दोलन का तवा गर्म होता गया और ...झंडा ऊंचा होता गया...लाइव टेलीकास्ट होने लगा.. लोगों ने भी एक एक झंडा उठा लिया..., अडवाणी जी ने कहा की यह झंडा तो मेरे पास था और में ने ही इसको पहले उठाया था, उधर बाबा रामदेव बोले की...अन्ना से पहले से ही यह झंडा मैंने उठाया था...और उन्होंने अन्ना की टीम के एक सदस्य के झंडा उठाने पर आपत्ति टी.वी. पर बयान दे कर ज़ाहिर कर दी...!
और एक दिन अपना झंडा लेकर खुद रामलीला मैदान में भक्तों को आमंत्रित कर के खुद का झंडा ज्यादा ऊंचा दिखाने की ललक लिए अनशन क्रिया के लिए बैठ गए....तब सरकार को लगा की यह झंडे तो सरकार के झंडे से भी ज्यादा ऊंचे होते जा रहे हैं...तो सरकार ने सरकारी दिखाई और अपने झंडे में से डंडा निकल लिया ...और जो भी उस दिन हुआ कोई उस को काला दिवस कह रहा है कोई दमन दिवस...जो भी हुआ उसके मूल की पहेली कभी भी न तो सरकार सुलझाएगी...और न ही बाबा जी...!
खैर...उस काण्ड के बाद बाबा जी अपना झंडा ले कर अपने आश्रम पधार गए...अब यह झंडे का झगडा हर जगह दिखाई दे रहा है...कभी बाबा अपना झंडा अन्ना के झंडे के साथ बाँध कर ऊंचा करना चाहते हैं..कभी सेना बना कर सैनिकों के हाथ में देना चाहते है...कुल मिला कर .....इस के बाद झंडा पुराण चल पड़ी.....और अब हर हाथ में एक झंडा है....और हर कोई यह कह रहा है की मेरा झंडा तेरे से ऊंचा है..! जब अन्ना हजारे ..जंतर मंतर पर बैठे थे तब यह व्यक्तिगत झंडे न जाने कहाँ थे....? अब न जाने ....किस का झंडा सब से ऊंचा रहेगा....और इस झन्डे के फंडे में से कोई और झंडा तो नहीं निकल आएगा......चिंतन मनन जारी है.....
( इन सब के झंडों से ऊंचा एक झंडा स्वामी निगमानंद जी का मानता हूँ, जिसने गंगा नदी के सौन्दर्य और गौरव के लिए अपने आपको मिटा दिया....उस वीर और देशभक्त को मेरा सलाम...!!! काश आप के बलिदान से यह बाबा रामदेव, अन्ना हजारे और ये सरकारें, राजनीतिक दल कुछ सबक लें...)
शनिवार, 4 जून 2011
अन्ना से समाज सेवा की A B C तो सीख लेते पहले...बाबा...!!
काश पहले आप अन्ना हजारे की बात मान लेते...बाबा...
उन्होंने कहा था की सरकार धोखा दे देगी....बाबा ..
अन्ना से समाज सेवा की A B C तो सीख लेते पहले...बाबा...
योग सिखाने में और समाज सेवा में दिन रात का फर्क है.....बाबा...
आपने पहले भीड़ को इकठ्ठा किया, फिर मंच पे पधारे . . ..बाबा....
अन्ना अकेले आकर मंच पर बैठा था....भीड़ बाद में खिंची .....बाबा...
आपने मीडिया को दो दिन पहले न्योता दे बुला बैठाया .....बाबा....
मीडिया को अन्ना की , दो दिन बाद याद आयी थी ...बाबा.....
आप कभी वायु यान में, कभी फाइव स्टार में नेताओं से अकेले मिले.....बाबा..
अन्ना का "प्रतिनिधिमंडल " नेताओं से मंत्रणा हेतु जाता था.....बाबा...
और एक वो अन्ना था जो मंच से न हिला था ......बाबा.....
अन्ना के मंच से उमा भारती को लोगों ने खदेड़ा था.....बाबा.....
और एक आप हो.....कैसे कैसों का समर्थन ले रहे हो .....बाबा......
काले धन पर आपकी फुफकार से हम तो खुश हुए थे......बाबा....
पर आपने धोखा खाया, धोखा दिया, किसने खाया , किसको दिया...बाबा...
हम तो इन हथकंडों से एकदम भरमा गए, , चकरा गए .....बाबा....
आप को राजनीति में आना ही है तो ज़रूर आओ ना......बाबा....
पर भीड़ इकट्ठी कर के लोगों को यूं ना भरमाओ ना ......बाबा....!!
(मेरी ही कलम से.....दिनांक : 5 जून '2011)
उन्होंने कहा था की सरकार धोखा दे देगी....बाबा ..
अन्ना से समाज सेवा की A B C तो सीख लेते पहले...बाबा...
योग सिखाने में और समाज सेवा में दिन रात का फर्क है.....बाबा...
आपने पहले भीड़ को इकठ्ठा किया, फिर मंच पे पधारे . . ..बाबा....
अन्ना अकेले आकर मंच पर बैठा था....भीड़ बाद में खिंची .....बाबा...
आपने मीडिया को दो दिन पहले न्योता दे बुला बैठाया .....बाबा....
मीडिया को अन्ना की , दो दिन बाद याद आयी थी ...बाबा.....
आप कभी वायु यान में, कभी फाइव स्टार में नेताओं से अकेले मिले.....बाबा..
अन्ना का "प्रतिनिधिमंडल " नेताओं से मंत्रणा हेतु जाता था.....बाबा...
और एक वो अन्ना था जो मंच से न हिला था ......बाबा.....
अन्ना के मंच से उमा भारती को लोगों ने खदेड़ा था.....बाबा.....
और एक आप हो.....कैसे कैसों का समर्थन ले रहे हो .....बाबा......
काले धन पर आपकी फुफकार से हम तो खुश हुए थे......बाबा....
पर आपने धोखा खाया, धोखा दिया, किसने खाया , किसको दिया...बाबा...
हम तो इन हथकंडों से एकदम भरमा गए, , चकरा गए .....बाबा....
आप को राजनीति में आना ही है तो ज़रूर आओ ना......बाबा....
पर भीड़ इकट्ठी कर के लोगों को यूं ना भरमाओ ना ......बाबा....!!
(मेरी ही कलम से.....दिनांक : 5 जून '2011)
मंगलवार, 31 मई 2011
सोशल नेटवर्किंग साइट्स.. facebook . orkut , ibibo आदि पर दम तोड़ता उर्दू अदब और हिंदी साहित्य ..!!
आज कल फेसबुक पर शेरो शायरी के ग्रुप्स और पेजेस की बाढ़ सी आयी हुई है, रोज़ कहीं न कहीं चार पांच ग्रुप्स रोज़ इस विषय पर बनते हैं...और यह सिर्फ one man group होते हैं. फेसबुक पर इसी बात की तो आज़ादी है, विषय और चिंतन का मूल यह है की नयी पीढ़ी क्या हमारी साहित्यिक विरासत को साथ ले कर चल रही है.....चाहे वो उर्दू अदब हो या हिंदी साहित्य,( खासतौर पर फेसबुक की चर्चा इस लिए कर रहा हूँ की यह आज सब से अधिक यूज़र्स वाली साईट हो गयी है...और ORKUT या ibibo का तो ज़िक्र ही करना बेकार है ) तो फेसबुक पर जहाँ भी साहित्य सम्बन्धी ग्रुप या पेज देखा उस एक चीज़ बहुत खटकी...जैसे हिंदी साहित्य या हिंदी शेर-ओ-शायरी या कविता का ग्रुप हो ..तो वहां हिंदी का अकाल देखा, और दूसरा अकाल साहित्यिक समझ का देखा, अधिकतर पोस्ट SMS शायरी जैसी नयी विधा की देखी, जो की एक बेहूदा तुकबंदी और एक text message के अलावा कुछ भी नहीं, और यही बानगी उर्दू अदब और शेर/ग़ज़ल वाले ग्रुप्स और पेजेस में देखने को मिली..वहां भी उर्दू का अकाल देखने को मिला और साहित्यिक समझ और साहित्यिक सुन्दरता नदारद नज़र आयी, वही बेहूदा SMS नुमा दो लाईने या चार लाईने, न कोई तुक न ही बंदी.!
फेसबुक को देश के युवाओं का काफी बड़ा हिस्सा प्रयोग कर रहा है..और उनका प्रतिशत भी अन्य आयु वर्ग के लोगों से काफी अधिक है, और यदि यही वर्ग आज इस सूचना क्रांति के दौर में अपनी सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत से दूर होते रहे तो बहुत बुरा होगा....उनकी खुद की अगली पीढ़ी को वो क्या विरासत दे पायेंगे ! कौन याद रखेगा ग़ालिब, मीर को....कौन याद रखेगा प्रेमचंद को, निराला को, रविन्द्रनाथ टेगोर को...??
और फिर वो भी इस दौर में जहाँ आजकल न तो पत्रिकाएं पढने का समय है और न ही शौक... दरअसल इसके मूल में आधुनिकता की भागमभाग और सूचना क्रांति के साधन भी कही न कही negative रोल अदा कर रहे हैं .. और में खड़ा खड़ा पत्थर हो गया....!! जहाँ एक क्लिक से हर मनचाही चीज़ मिल जाए तो पत्रिका और किताबों का क्या ! खैर मूल विषय पर आयें... तो बात फेसबुक की चल रही थी..और अदब और साहित्य की चल रही थी, कहीं भी किसी ग्रुप में जा कर चाहे वो उर्दू ग़ज़लों का हो या शेरों का...आप किसी प्रसिद्द शायर की रचना पोस्ट करिए...फिर देखिये..वहां आपके साथ ऐसा बर्ताव होगा जैसे सड़क पर किसी भिखारी से कतरा कर लोग निकलते हैं....आपकी पोस्ट से भी लोग कतरा के निकल भागते नज़र आयेंगे..और वो पोस्ट एक " like " की आस में ही दम तोड़ देगी...उस पर टिपण्णी तो बहुत दूर की बात होगी...कारण है की...लोगों की साहित्यिक ज्ञान और अदबी समझ रही ही नहीं....वो क्या जाने मीर को, ग़ालिब को, महादेवी वर्मा को, निराला को, प्रेमचंद को....न उनको शुद्ध साहित्य की मिठास की समझ न ही उसकी गहराई से वास्ता....हाँ यदि आप दो लाइन तुकबंदी कर के लिख दें जैसे....
उसने कहा था की मेरा इंतज़ार करना "फ़राज़" ..( ?? )
और में खड़ा खड़ा पत्थर हो गया....!!
अब इस वाहियात शेर पर आपको इतने " like " और इतने कमेंट्स मिलेंगे की दिल बाग़ बाग़ हो जाएगा, और आप चाहें तो "फ़राज़" की जगह "मोहसिन" लगा सकते हैं, "ज़फर" भी चलेगा , और थोड़ी हिम्मत कर के "ग़ालिब" भी लगा सकते हैं...."ग़ालिब" लगाने पर तीन चार कमेंट्स और बढ़ सकते हैं.! और में खड़ा खड़ा पत्थर हो गया....!!
ऐसे में हम तो यही दुआ करते हैं की इस पीढ़ी को कैसे न कैसे कर के अपने उर्दू अदब और हिंदी साहित्य से परिचित कराया जाए, उन को इनकी खूबियाँ , इनका गौरव बताया जाए..जहाँ भी संभव हो ..आप और हम यह प्रण कर लें की जब भी और जहाँ भी मौका मिले इस अनजान पीढ़ी में से किसी एक को भी यदि हमने इस विरासत से परिचित करा दिया तो यह एक अमूल्य योगदान होगा..अदब और साहित्य के लिए! .यह हमारी विरासत है...और यह हमारी ज़िम्मेदारी है की इस को हम बा-वक़ार तरीके से अगली पीढ़ी को सौंप कर गौरवान्वित हों....!!
( यहाँ बशीर बद्र साहब की किताब का चित्र मैंने इसी लिए चुना है की उनको उर्दू और हिंदी में बराबर पढ़ा और सराहा जाता है, और इज्ज़त दी जाती है.)
फेसबुक को देश के युवाओं का काफी बड़ा हिस्सा प्रयोग कर रहा है..और उनका प्रतिशत भी अन्य आयु वर्ग के लोगों से काफी अधिक है, और यदि यही वर्ग आज इस सूचना क्रांति के दौर में अपनी सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत से दूर होते रहे तो बहुत बुरा होगा....उनकी खुद की अगली पीढ़ी को वो क्या विरासत दे पायेंगे ! कौन याद रखेगा ग़ालिब, मीर को....कौन याद रखेगा प्रेमचंद को, निराला को, रविन्द्रनाथ टेगोर को...??
और फिर वो भी इस दौर में जहाँ आजकल न तो पत्रिकाएं पढने का समय है और न ही शौक... दरअसल इसके मूल में आधुनिकता की भागमभाग और सूचना क्रांति के साधन भी कही न कही negative रोल अदा कर रहे हैं .. और में खड़ा खड़ा पत्थर हो गया....!! जहाँ एक क्लिक से हर मनचाही चीज़ मिल जाए तो पत्रिका और किताबों का क्या ! खैर मूल विषय पर आयें... तो बात फेसबुक की चल रही थी..और अदब और साहित्य की चल रही थी, कहीं भी किसी ग्रुप में जा कर चाहे वो उर्दू ग़ज़लों का हो या शेरों का...आप किसी प्रसिद्द शायर की रचना पोस्ट करिए...फिर देखिये..वहां आपके साथ ऐसा बर्ताव होगा जैसे सड़क पर किसी भिखारी से कतरा कर लोग निकलते हैं....आपकी पोस्ट से भी लोग कतरा के निकल भागते नज़र आयेंगे..और वो पोस्ट एक " like " की आस में ही दम तोड़ देगी...उस पर टिपण्णी तो बहुत दूर की बात होगी...कारण है की...लोगों की साहित्यिक ज्ञान और अदबी समझ रही ही नहीं....वो क्या जाने मीर को, ग़ालिब को, महादेवी वर्मा को, निराला को, प्रेमचंद को....न उनको शुद्ध साहित्य की मिठास की समझ न ही उसकी गहराई से वास्ता....हाँ यदि आप दो लाइन तुकबंदी कर के लिख दें जैसे....
उसने कहा था की मेरा इंतज़ार करना "फ़राज़" ..( ?? )
और में खड़ा खड़ा पत्थर हो गया....!!
अब इस वाहियात शेर पर आपको इतने " like " और इतने कमेंट्स मिलेंगे की दिल बाग़ बाग़ हो जाएगा, और आप चाहें तो "फ़राज़" की जगह "मोहसिन" लगा सकते हैं, "ज़फर" भी चलेगा , और थोड़ी हिम्मत कर के "ग़ालिब" भी लगा सकते हैं...."ग़ालिब" लगाने पर तीन चार कमेंट्स और बढ़ सकते हैं.! और में खड़ा खड़ा पत्थर हो गया....!!
ऐसे में हम तो यही दुआ करते हैं की इस पीढ़ी को कैसे न कैसे कर के अपने उर्दू अदब और हिंदी साहित्य से परिचित कराया जाए, उन को इनकी खूबियाँ , इनका गौरव बताया जाए..जहाँ भी संभव हो ..आप और हम यह प्रण कर लें की जब भी और जहाँ भी मौका मिले इस अनजान पीढ़ी में से किसी एक को भी यदि हमने इस विरासत से परिचित करा दिया तो यह एक अमूल्य योगदान होगा..अदब और साहित्य के लिए! .यह हमारी विरासत है...और यह हमारी ज़िम्मेदारी है की इस को हम बा-वक़ार तरीके से अगली पीढ़ी को सौंप कर गौरवान्वित हों....!!
( यहाँ बशीर बद्र साहब की किताब का चित्र मैंने इसी लिए चुना है की उनको उर्दू और हिंदी में बराबर पढ़ा और सराहा जाता है, और इज्ज़त दी जाती है.)
मंगलवार, 5 अप्रैल 2011
इलेक्ट्रोनिक मीडिया का राखी सावंतीकरण .....जय हो~~~~~~~~!!
पाकिस्तान को पीट दो,आतंक का बदला क्रिकेट से,पाकिस्तान को धूल चटा दो,मौका मत चूको,पुरानी हार का बदला लो,अभी नहीं तो कभी नहीं,महारथियों की महा टक्कर,प्रतिद्वंद्वियों में घमासान,क्रिकेट का महाभारत….ये महज चंद उदाहरण है जो इन दिनों न्यूज़ चैनलों और समाचार पत्रों में छाये हुए हैं.मामला केवल इतना सा है कि विश्व कप क्रिकेट के सेमीफाइनल में भारत और पाकिस्तान की टीमें आमने-सामने हैं.लेकिन मीडिया की खबरों,चित्रों,रिपोर्टिंग,संवाददाताओं की टिप्पणियों और दर्शकों की प्रतिक्रियाओं से ऐसा लग रहा है मानो इन दोनों देशों के बीच क्रिकेट का मैच नहीं बल्कि युद्ध होने जा रहा है.हर दिन उत्तेजना का नया वातावरण बनाया जा रहा है,एक दूसरे के खिलाफ तलवार खीचनें के लिए उकसाया जा रहा है और महज एक स्टेडियम में दो टीमों के बीच होने वाले मुकाबले को दो देशों की जंग में बदल दिया गया है.रही सही कसर सरकार और राजनीतिकों ने पूरी कर दी है. “क्रिकेट डिप्लोमेसी” जैसे नए-नए शब्द हमारे बोलचाल का हिस्सा बन रहे हैं.राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक और मुख्यमंत्री से लेकर बाबूओं तक पर क्रिकेट का जादू सर चढकर बोल रहा है.
यह क्रिकेट के प्रति दीवानगी है या जंग जैसे माहौल का असर कि अब हर नेता,अभिनेता,व्यवसायी और रसूखदार व्यक्ति इस मैच को देखना चाहता है भले ही उसे क्रिकेट की ‘ए बी सी डी..’ भी नहीं आती हो. देश और जनकल्याण के कामों के लिए चंद मिनट नहीं निकाल सकने वाले लोग इस मैच के लिए पूरा दिन बर्बाद करने को तत्पर हैं.देश की समस्याओं के प्रति उदासीन रहने वाले आम लोग,साधू-संत,छुटभैये नेता और जेल में बंद क़ैदी तक मीडिया की सुर्खियाँ बटोरने के लिए हवन-पूजन का दिखावा कर रहे हैं.कोई अज़ीबोगरीब ढंग से बाल कटा रहा है तो कोई अधनंगी पीठ पर देश का नक्शा बनवा रहा है.मध्यप्रदेश में तो विधानसभा में कामकाज बंद कर मैच देखने की छुट्टी दे दी गयी है.पहले से ही काम नहीं करने के लिए बदनाम सरकारी दफ्तरों को भी काम से पल्ला झाड़ने के लिए क्रिकेट का बहाना मिल गया है.इस दौरान कई सवाल भी उठ रहे हैं जैसे मैच को युद्ध में बदलने से और वीवीआईपी के जमघट पर होने वाले करोड़ों रूपए के सुरक्षा तामझाम का खर्च कौन उठाएगा?अपने आप को देश के नियम-क़ानूनों से परे मानने वाले बीसीसीआई के खजाने के भरने से देश को क्या लाभ होगा?क्रिकेट हमारा राष्ट्रीय खेल नहीं है और इसपर देश के अन्य खेलों का काम-तमाम करने का आरोप तक लग रहा है उसे इतना प्रोत्साहन क्यों?लाखों-करोड़ों रूपए रोज कमाने वाले क्रिकेटरों के सरकारी महिमामंडन से बाक़ी खेलों के लिए जवानी दांव पर लगा रहे खिलाडियों की मानसिकता क्या होगी?
इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत सहित दुनिया के कई मुल्कों में क्रिकेट अत्यधिक लोकप्रिय खेल है और क्रिकेटरों को भगवान का दर्ज़ा तक हासिल है.इस खेल के मनोरंजक तत्वों को भी झुठलाया नहीं जा सकता परन्तु खेल को खेल की ही तरह खेलने देने में क्या बुराई है? खेल के नाम पर यह तनाव और युद्ध जैसा वातावरण बनाने का क्या औचित्य है? खिलाडियों के बीच मैच के दौरान स्वावाभिक रूप से रहने वाले तनाव को हमने देश भर में फैला दिया है और इससे बढ़ने वाली धार्मिक और सामुदायिक वैमनस्यता के परिणाम आने वाले समय में भी भुगतने पड़ सकते हैं.सरकार या नेताओं का तो समझ में आता है कि वे आम लोगों का ध्यान देश की मूलभूत समस्याओं से हटाने के लिए कोई न कोई बहाना तलाशते रहते हैं.अब इस मैच को जंग में बदलवाकर उन्होंने देश का ध्यान टू-जी स्पेक्ट्रम,कामनवेल्थ,विकिलीक्स,महंगाई जैसे तमाम तात्कालिक मुद्दों से हटा दिया है परन्तु देश के ज़िम्मेदार मीडिया का भी पथभ्रष्ट होना समझ से परे है…..इन न्यूज़ चेनलों का भी राखी सवान्तिकरण हो गया लगता है...
सदस्यता लें
संदेश (Atom)




