बुधवार, 23 मार्च 2016

जानिये इंसानियत को शर्मसार कर देने वाले इस फोटो के पीछे की कहानी !!

यह फोटो सोशल मीडिया पर कई बार कई मौक़ों पर शेयर किया जाता रहा है, इस फोटो के पीछे की कहानी भी दिल दहला देने वाली है !



घटना है 15 जनवरी 2010 की, जब अफगानिस्तान में दक्षिणी कंधार में तैनात अमरीकी सेना की 'स्ट्राइकर ब्रिगेड' के 5 सैनिकों ने 15 वर्षीय निहत्थे अफगान बालक गुलबुद्दीन जिसके पिता एक किसान थे, की गोली मार कर हत्या की, और उसके बाद उसकी लाश के साथ फोटो खिंचवाए !

इन पांच सैनिकों के नाम थे, एंड्रू होल्म्स, माइकल वैगनों, जेरेमी  मोरलॉक और आदम  इन्फिएल्ड ! इन्होने उस खेतों में काम कर रहे निहत्थे गुलबुद्दीन पर ठीक वैसा ही हमला किया जैसा कि किसी हथियार बंद आतंकियों की टोली पर करते हैं, हैंड ग्रेनेड फेंके और गोलियां मरी गयीं, बच्चे की अर्धनग्न लाश के साथ फोटो शूट करने के बाद वो उसे वहीँ पड़ा छोड़ गए थे !

अमरीकी सेना की 'स्ट्राइकर ब्रिगेड' के इन 5 सैनिकों ने इसके बाद 22 फ़रवरी 2010 में मराक आग़ा नाम के एक बच्चे की कलाश्निकोव राइफल से नज़दीक से सर में गोली मार कर हत्या की !

उसके बाद 2 मई 2010 में इन्होने मुल्ला अहदाद नाम के एक निहत्थे की ग्रेनेड और राइफल से गोलियां मार कर हत्या की !

यह लोग यहीं नहीं रुके इन्होने मारे गए लोगों की लाशों के साथ दुर्दांत हरकतें की, किसी के मृत शरीर का सर अलग कर उसके साथ फोटो खिंचवाया तो किसी मृत शरीर पर बोर्ड लगा कर उसपर 'तालिबान मर गया है' जैसे नारे लिख कर फोटो खिंचवाए !

यही नहीं जब वो अमरीका लौटे तो उनके द्वारा मारे गए अफगानी लोगों के शरीर की उंगलियों की हड्डियाँ, पैर की हड्डियाँ  और दांत भी एक जीती हुई ट्रॉफी की तरह साथ लेकर गए !

इन अमरीकी सैनिकों की इस अमानवीय हरकतों की फोटो जब अखबारों में छपी तो विश्व भर में इसकी तीव्र प्रतिक्रियाएं हुई, निंदा और लानतें भेजी गयीं, आखिर में अमरीकी सेना ने इन सैनिकों के कृत्य के लिए माफ़ी मांगी तथा सैन्य अदालत ने केल्विन गिब्स को अफगान नागरिकों की हत्या का दोषी माना, व बाक़ी दोषी सैनिकों के खिलाफ कोर्ट मार्शल की कार्रवाही के साथ साथ मुक़दमों की भी अनुशंसा की गयी !

Source :-
https://en.wikipedia.org/wiki/Maywand_District_murders

http://www.aljazeera.com/news/americas/2011/11/201111114265669553.html

http://www.bbc.com/hindi/lg/southasia/2010/09/100910_ussoldiers_afghan_vv.shtml

बुधवार, 9 मार्च 2016

बाबाओं, कॉर्पोरेट्स, पूंजीपतियों और राजनैतिक दलों की चिरपरिचित जुगलबंदी !!

चाहे श्री श्री हों या ललित मोदी, रामदेव हों या विजय माल्या यह लॉबी ऐसी है जिसका कोई भी सरकार बाल बांका नहीं कर सकती, इस लॉबी की ताक़त के आगे सभी राजनैतिक पार्टियां नतमस्तक नज़र आती हैं, यह बात अलग है कि कुछ राजनैतिक दलों के सत्ता में आते ही इनके धंधों में चार चाँद लग जाते हैं,धंधों को खाद पानी मिलने लगता है, नयी ऊर्जा मिलने लगती है, और इसके लिए यह लॉबी कई बार सरकारों के बनने बिगड़ने में भी अहम रोल अदा करती नज़र आती है !

यह कोई नयी बात नहीं है, इस जुगलबंदी की शुरुआत स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी से हुई थी, चन्द्रा स्वामी की राजनैतिक जुगलबंदी का इतिहास उठकर देख लीजिये, हज़ारों करोड़ों की अकूत संपत्ति के शिखर पर बैठे बाबा लोग हर सरकार में निर्भय होकर तथाकथित सेवा करते नज़र आते हैं, हर बाबा अपनी अपनी राजनैतिक गोटियां फिट करके रखते हैं, चाहे वो श्री श्री हों, रामदेव हों, स्वामी अग्निवेश हों, बाबा राम रहीम हों, रामपाल बाबा हों, आसाराम बापू हों, या नित्यानंद हों !


अडानी, अम्बानी से लेकर, टाटा बिड़ला की ताक़त कौन नहीं जानता,  ललित मोदी की पहुँच किसे पता नहीं है, 2011 से दीवालिया हुए  विजय माल्या का किस सरकार ने क्या बिगाड़ लिया ? यह सब इस ताक़तवर लॉबी के राजनीति से मज़बूत गठजोड़ के सबूत हैं !


भारत के विभिन्न कार्पोरेट घरानों ने समाचार पत्र-पत्रिकाओं, टीवी चैनलों में अपना पैसा निवेश किया हुआ हैं, कुछ के अपने ही चैनल्स हैं, यह सब प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से देश की राजनीति को प्रभावित करते हैं !

बाबा लोग भी कहाँ पीछे रहने वाले हैं, उनके भी अपने निजी चैनल्स भक्तों को आशीर्वाद और ज्ञान बांटते देखे जा सकते हैं, जिस बाबा का खुद का चैनल नहीं है, वो कई न्यूज़ चैनल्स पर बढ़िया टाइम स्लॉट में अपनी बाबागिरी पेश करता नज़र आता है !

पूँजी पतियों और राजनीति का सबसे कुरूप गठबंधन अगर देखना हो तो BCCI की ओर नज़र डाल लीजिये, जहाँ क्रिकेट को बेचने और मुनाफा कमाने के लिए यह किसी भी हद तक जाते नज़र आते हैं !

जनता के आगे मुद्दों का टुकड़ा फेंक कर अपने हित साधने वाले सियासतदान ही इसके असली गुनहगार है, तो चलिए देर किसी बात की, सोशल मीडिया की चीख पुकार में शामिल हो जाइए, और देश की चिंता कीजिये !!  

सोमवार, 7 मार्च 2016

महिला शिक्षा बिना 'नारी दिवस' या 'नारी सशक्तिकरण' अधूरा !!

आज हर साल की तरह फिर से नारी दिवस मनाया जा रहा है, जो कि एक औपचारिकता ही कही जा सकती है, नारी दिवस हर रोज़ हर महीने मनाना चाहिए, और इसकी सबसे पहली सीढ़ी है बेटियों को तालीम/शिक्षा से आरास्ता करना, तालीम माँ-बाप की ओर से बेटियों को दिया गया वो अनमोल तोहफा है, जिससे बेटियां मानसिक तौर पर सशक्त होती हैं, ज़िन्दगी में आने वाली हर मुश्किल का सामना कर सकती हैं ! ज़िन्दगी में आगे तरक़्क़ी की राह खुलती है, समाज में इज़्ज़त मिलती है !


यहाँ एक बात यह गौर करने वाली है कि बेटियों को एक जैसी शिक्षा के लिए बेटों से ज़्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, वो बेटों से ज़्यादा जद्दो जहद करती हैं, घर से बाहर निकलने से लेकर, अपनी सुरक्षा, समाज का नजरिया और बहुत कुछ झेलना पड़ता है !

शिक्षा नहीं होगी तो बेटियों का सशक्तिकरण नहीं हो पायेगा, आज भी हम जब ऐसे मौक़ों पर कुछ सोचते हैं या उदाहरण देने बैठते हैं तो हमारा ध्यान उन बेटियों/महिलाओं पर जाता है, जो अपनी शिक्षा/क़ाबलियत के दम पर नारी शक्ति का परचम लहरा रही हैं !

वो दिन मेरे लिए बहुत ख़ास होगा जब मेरी बेटियों को तालीम की वजह से पहचाना जायेगा, लोग इन्हे इज़्ज़त के साथ सलाम करेंगे, और हमें हमारी पहचान की जगह उनके नाम से पहचाना जायेगा ! वो लम्हा बहुत फख्र का होता है जब औलाद की उपलब्धियों और आला मक़ाम की वजह से माँ बाप को पहचान मिलती है !

इसलिए कोशिश कीजिये कि बेटियों को पहली सीढ़ी से ही सशक्त बनाना शुरू करें, तालीम और तरबियत से आरास्ता करें, ताकि भविष्य में कभी नारी दिवस मने तो वो बेटियां आपको याद करें, आपको सलाम करें, उस मुक़ाम तक पहुँचाने के लिए आपकी शुक्रगुज़ार रहें, दुनिया में आप रहें या ना रहें, बेटियों को आपका दिया हुआ तालीम का तोहफा महकता रहेगा !

शुक्रवार, 4 मार्च 2016

कन्हैया को सोशल मीडिया पर मुसलमानो के समर्थन के मायने !!

सोशल मीडिया पर मुसलमानो द्वारा कन्हैया के समर्थन में आने पर कई मुस्लिम बुद्धिजीवी, ओवैसी समर्थक, और कुछ राष्ट्रिय मुस्लिम मंच टाइप के मुसलमान ऊँगली उठा रहे हैं !

इनमें कुछ तो इस्लाम की दुहाई देकर, 'राष्ट्रप्रेम' की हिज्जे कर मुसलमानो को इस मुहीम से अलग करने की नाकाम कोशिश करते देखे गए हैं, तो कुछ वामदलों के इतिहास की दुहाई देकर इस मुहीम को फेल करने में लगे नज़र आये !

क्योंकि मैं इन तीनो चारों श्रेणियों में से ना हो कर एक आम सोशल मीडिया यूज़र हूँ, इस नाते यहाँ जो सालों से देखा और महसूस किया उसके हिसाब से इसमें कोई बुराई नहीं होना चाहिए !

देश का मुसलमान अपनी विचारधारा और राजनैतिक समझ के अनुसार कई हिस्सों में बंटा हुआ है, यहाँ सोशल मीडिया पर कांग्रेस, भाजपा, AAP , सपा, बसपा, वामदल और कई क्षेत्रीय दलों के समर्थक मुसलमान मौजूद हैं !

ऐसे में अगर कोई ओवैसी समर्थक यह ऐतराज़ करे कि इससे अच्छी स्पीच तो ओवैसी ने हज़ार बार दे डाली, मुसलमानो ने क्यों वाह वाही नहीं की ?

यहाँ बात गौर करने की यह है कि कन्हैया एक गरीब घर का युवक है, एक छात्र है, उसकी तुलना खाते पीते, बैरिस्टर और घाघ नेता ओवैसी से या उनके भाषणो से क्यों ? क्या कन्हैया कोई चुनाव लड़ने जा रहा है, या मुस्लिम वोट बैंक छीन कर भाग रहा है ?

रही बात ओवैसी समर्थकों की या उनके भाषणो की तो यहाँ सोशल मीडिया पर उनके समर्थकों के हल्लेबाज़ी कम नहीं है, वो सब कुछ यहाँ कई बार शेयर कर चुके हैं और वाह वाही करा चुके हैं !

कन्हैया तो बाद में गिरफ्तार हुआ है, यहाँ सोशल मीडिया पर यही मुसलमान रोहित वेमुला के मुद्दे पर भी रोहित के समर्थन में एकजुट थे, तब किसी को क्यों आपत्ति नहीं हुई ?

यहाँ रोहित वेमुला या कन्हैया या फिर उमर खालिद के मुद्दे पर मुसलमानो के एकजुट हो जाने का मतलब उनकी तथाकथित वाम विचारधारा का समर्थन कैसे मान लिया जाए ?

यह थोपे जा रहे छद्म राष्ट्रवाद और संघ के साम्प्रदायिक एजेंडे के प्रति प्रतिरोध के खिलाफ आवाज़ है जिसके लिए मुसलमान एकजुट हो कर कन्हैया की आवाज़ में आवाज़ मिला रहे हैं !

हालिया दौर अस्थिर, साम्प्रदायिक उन्माद, और ज़बर राष्ट्रवादी लठैती का दौर है, ऐसे में अगर मुसलमान सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ आवाज़ उठाने वाले कन्हैया की आवाज़ में सुर मिला रहे हैं तो मेरे ख्याल से किसी को ऐतराज़ नहीं होना चाहिए !

ओवैसी साहब अपना काम करते रहें, उनके समर्थक (अगर वाक़ई दिल से हैं) तो कहीं भागकर नहीं जाने वाले, और जो समर्थक नहीं है, वो ऐसी नसीहतों से समर्थक नहीं बनने वाले !

इसलिए अगर कोई अन्याय के और व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठा रहा है, तो उसकी आवाज़ में आवाज़ मिलाने का अधिकार सबको है, इसपर रोक लगाना मेरे ख्याल से लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन ही कहा जायेगा !

फिर भी मुसलमानो को ऐसे मुद्दों पर इस या आगे किसीऔर कन्हैया का समर्थन करने से रोकेंगे तो फिर भक्तों में आप लोगों में क्या फ़र्क़ रह जायेगा भला ?

सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

जानिये इस शर्मसार कर देने वाले फ़ोटोज़ के पीछे की कहानी !!

इस शर्मसार कर देने वाले फोटो को लोग कई बार कई मुद्दों पर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते देखे जाते रहे हैं, इस में जिस महिला के साथ यह घृणित दुर्व्यवहार किया जा रहा है, उसका पूरा नाम है लक्ष्मी औरांग !

आसाम के सोनितपुरी की जापोवारी औरांग बस्ती की रहने वाली और मार्टिन लूथर किंग को अपना आदर्श मानने वाली आदिवासी महिला  लक्ष्मी औरांग के साथ यह अफसोसनाक घटना 24 नवंबर 2007 को उस समय हुई थी, जब वो आसाम के चाय बागानों में काम करने वालों मजदूरों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर गुवाहाटी के बेलतला में आयोजित रैली में लक्ष्मी भी हिस्सा लेने आई थीं। इस रैली में हजारों लोगों ने भाग लिया था!

इसी दौरान कुछ स्थानीय लोगों और प्रदर्शनकारियों में झड़प होने से हिंसा भड़क उठी थी ! इस फसाद में लक्ष्मी को निर्वस्त्र कर दिया गया था और बेरहमी से पीटा गया था ! जान बचाने के लिए लक्ष्मी सड़कों पर निर्वस्त्र भागती फिरी थी !

जब लक्ष्मी अपनी जान बचाने के लिए बीच सड़क पर दौड़ रही थी और तभी एक स्थानीय युवक ने अपनी टी-शर्ट उतारकर उसे दी थी, जिससे वह अपना तन ढंक सकी थी ! अगले दिन लक्ष्मी की तस्वीरें समाचार-पत्रों में छपी थीं और असम स्तब्ध रह गया था !

यह तस्वीर आवारा भीड़ की कुरूप, उद्द्विग्न और लपलपाती मानसिकता को दर्शाती है, उस समय इस फोटो को प्रकाशित करने पर कई बुद्धिजीवियों ने आपत्ति की थी, मगर पत्रकार बिरादरी ने इसे यह कहकर पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया था कि अभिनेत्रियों के अर्ध नग्न फोटो छापने से जब किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती तो यह सामाजिक शर्म का मामला है, देश के संज्ञान में लाने के लिए सच सामने रखने के लिए इन शर्मसार करने वाले चित्रों को दुखी मन से छापना ज़रूरी है !

लक्ष्मी औरांग के बारे में या इस घटना के बारे में जानने के लिए निम्न लिंक्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं, वीडियो देख सकते हैं :-
1 http://khabar.ibnlive.com/showstory.php?id=423902&ref=hindi.in.com 

https://gaharvar.wordpress.com/2009/03/31/%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%B7%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88/ 

3 http://kafila.org/2013/01/18/remembering-laxmi-orang-and-the-gender-question-in-assam-mayur-chetia-and-bonojit-hussain/

4 http://raviwar.com/news/106_lakshmi-oraon-election-binod-ringania.shtml

शनिवार, 23 जनवरी 2016

जानिये ईधी फाउंडेशन और उसके संस्थापक अब्दुल सत्तार ईधी के बारे में !!

गीता की भारत वापसी के बाद एक नाम उभर कर सामने आया है, वो है ईधी फाउंडेशन और उसके संस्थापक
अब्दुल सत्तार ईधी साहब का, गीता उसका असली नाम नहीं है. ईधी फाउंडेशन के संस्थापक अब्दुल सत्तार ईधी की पत्नी बिलक़ीस ईधी ने ही उनका नाम गीता रखा था !
पाकिस्तान में एक 'भारतीय' लोगों के घावों पर मरहम लगाता है। जब भी कहीं आतंकवादी हमला होता है या कोई आपदा आती है, सबसे पहले उसके एम्बुलेंस मौके पर पहुंचकर लोगों की मदद करते हैं। ये हैं 83 वर्षीय अब्दुल सत्तार एधी।
मौलाना एधी का जन्म 28 फ़रवरी 1928 को भारत के गुजरात राज्य के बनतवा शहर में पैदा हुए थे। उनके पिता कपड़े के व्यापारी थे। वह जन्मजात लीडर थे और शुरू से ही अपने दोस्तों की छोटे-छोटे काम और खेल-तमाशे करने पर होसला अफ़ज़ाई करते थे। जब अनकी मां उनको स्कूल जाते समय दो पैसे देतीं थी तो वह उन में से एक पैसा खर्च कर लेते थे और एक पैसा किसी अन्य जरूरतमम्द को दे देते थे।
सन् 1947 में भारत विभाजन के बाद उनका परिवार भारत से पाकिस्तान आया और कराची में बस गया। 1951 में आपने अपनी जमा पूंजी से एक छोटी सी दुकान ख़रीदी और उसी दुकान में आपने एक डाक्टर की मदद से छोटी सी डिस्पेंसरी खोली।
एधी के इस असाधारण योगदान को देखते हुए ही उन्हें 16वीं बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया है। यह अलग बात है कि उन्हें अब तक पुरस्कार नहीं मिला। लेकिन उनके सचिव अनवर काजमी के अनुसार उन्हें कभी इसका मलाल नहीं रहा।
इस काम में जुटे उनके संगठन 'एधी फाउंडेशन' की शाखाएं 13 देशों में हैं। जहां तक पाकिस्तान की बात है तो वहां की सरकार एधी की सेवाओं पर बहुत हद तक निर्भर है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने 28 नवम्बर को उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया। एधी भारतीयों को भी अपने काम से सम्बंधित प्रशिक्षण देने के लिए तैयार हैं।
कराची से ‘आईएएनएस’ से फोन पर बातचीत में ईदी ने कहा, "मैं भारत से हूं और भारतीयों को प्रशिक्षण देने के लिए तैयार हूं।"एधी का जन्म गुजरात में हुआ था।
उन्होंने कहा कि मुम्बई के लोगों के एक समूह ने काम शुरू करने के लिए उनके संगठन से सम्पर्क किया। एधी ने यह भी कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने उनसे भारत आने और यहां काम करने के लिए कहा था।
उन्होंने कहा, "हम इस वक्त 13 देशों में सेवाएं दे रहे हैं। हमारे पास 1,800 एम्बुलेंस हैं और देशभर में हमारे 450 केंद्र हैं।"
घटनास्थल पर जल्द से जल्द पहुंचने के लिए एधी फाउंडेशन के पास हवाई सेवा भी है। उन्होंने कहा, "हमारे पास तीन विमान और हेलीकॉप्टर हैं। हम एक नया हेलीकॉप्टर लेने की योजना बना रहे हैं, क्योंकि मौजूदा हेलीकॉप्टर पुराना हो गया है।"
एधी फाउंडेशन ने अब तक 40,000 नर्सों को प्रशिक्षण दिया है। 20,000 परित्यक्त बच्चों को बचाया गया, जबकि करीब 10 लाख बच्चों का जन्म एधी के मातृत्व केंद्रों में हुआ।
अब्दुल सत्तार ईधी साहब को मिले सम्मान और पुरस्कार :-
१९९७ इदी फाउन्डेशन, गिनीज बुक में
1988 लेनिन शान्ति पुरस्कार
1986 रमन मैगसेसे पुरस्कार
1992 पाल हैरिस फेलो रोटरी इन्टरनेशनल फाउन्डेशन (Paul Harris Fellow Rotary International Foundation)
2000ء अन्तर्राष्ट्रीय बालजन पुरस्कार (International Balzan Priz
26 मार्च 2005 आजीवन उपलब्धि पुरस्कार (Life Time Achievement Award)

देश की युवा पीढ़ी और भारत की विरासत !!

देश की राजनीति में सक्रीय भूमिका निभाने में युवाओं का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है, हर साल करोड़ों नए मतदाता पंजीकृत होते हैं, मगर ये युवा पीढ़ी जिसने आँख खुलते ही स्मार्ट फोन देखे, फेसबुक ट्वीटर देखे, राहुल गांधी, मोदी, केजरीवाल, अमित शाह देखे, सचिन देखे, पीढ़ी के भारत की आज़ादी के इतिहास से अनजान हैं !

इस पीढ़ी के अधिकांश लोग उस संघर्ष से अनजान है जिसके लिए शहीदों ने अपनी जान न्योछावर की ! इस पीढ़ी के लिए राष्ट्रवाद, सेकुलरिज्म, साम्प्रदायिकता की अलग अलग साईबर परिभाषाएं हैं !
इनके हीरो अलग हैं, इनकी प्रेरणाएँ अलग हैं !

फास्ट फ़ूड युग का यह युवा 15 अगस्त, 26 जनवरी पर झट से सोशल मीडिया में अपनी DP पर तिरंगा लहरा कर खुश हो जाता है, इससे आसान युक्ति भला और कहाँ हो सकती है !

यह गांधी, सुभाष, भगत सिंह के बारे में उतना नहीं जानते जितना कि मोदी, राहुल या केजरीवाल के बारे में जानते हैं ! यह पीढ़ी सचिन के बारे में जितना जानती है, हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के बारे में उतना नहीं जानती !

यह सनी लेओनी को भी उतना ही सर्च करती है जितना मोदी, राहुल या केजरीवाल को, इसे भले ही राष्ट्रगान पूरा नहीं आता हो, मगर हनी सिंह के रैप सॉन्ग पूरे याद हैं !

इन्हें मुंशी प्रेम चन्द के बारे में उतना नहीं पता जितना चेतन भगत के बारे में पता है, इन्हे हमीद के चिमटे की कहानी, बूढी काकी की कहानी नहीं मालूम मगर हाफ गर्ल फ्रेंड की पूरी कहानी पता होगी !

आज के राजनैतिक दल विशेषकर इस पीढ़ी को ही टारगेट कर अपनी चुनावी रणनीति तय करते हैं, कई बार फिल्म इंडस्ट्री इस पीढ़ी को ही नज़र में रख कर फ़िल्में बनाती है, और सुपर हिट करा लेती है !

यह पीढ़ी अगर ठान ले तो किसी भी आंदोलन को सफल बना सकती है, किसी भी राजनैतिक दल की विचारधारा को जिता सकती है, और धूल भी चटा सकती है !

यह पीढ़ी जब भारत की राजनीति की दिशा और दशा बदलने के लिए अपनी राजनैतिक समझ को काम में लेगी तो स्पष्ट है कि उसका क्या परिणाम होगा !

मगर एक बात इस पीढ़ी की जो बहुत ही सकारात्मक है, वो यह है कि इसी पीढ़ी के कन्धों पर भावी उज्जवल भारत के निर्माण की ज़िम्मेदारी भी है, जिसे यह पीढ़ी ईमानदारी से निभा रही है, ये पीढ़ी अपने सुनहरे भविष्य के लिए कठिन परिश्रम करती नज़र आती है !


इस पीढ़ी को देश की राजनैतिक, सामाजिक, पारिवारिक और धर्म निरपेक्ष विरासत से जोड़ने और परिचित कराने के लिए सभी राजनैतिक दलों, बुद्धि जीवियों को हर संभव कोशिश करनी चाहिए, कारण कि यही पीढ़ी देश के भावी नागरिक,भविष्य के नेता, उद्द्योग्पति, वैज्ञानिक, इंजीनियर्स, साहित्यकार होंगे, यदि यह भारत की विरासत को साथ लेकर आगे जायेंगे तो यह भावी भारत के निर्माण के लिए बहुत ही सकारात्मक बात होगी !!