बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

तहरीर चौक से जनलोकपाल आन्दोलन तक सिर्फ विफलता~~~~~!!

अप्रैल' 2011  में जब समाजसेवी अण्णा हजारे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का नेतृत्व करने दिल्ली के जंतर-मंतर गए और उनके तथाकथित आमरण अनशन के समर्थन में हजारों लोगों की भीड़ जमा हो गई तो मीडिया के एक वर्ग ने इस आंदोलन की तुलना इजिप्ट के तहरीर चौक क्रांति से की थी।सोशल नेटवर्किंग मीडिया के उस वर्ग ने अण्णा के आंदोलन में जितना बखूबी सदुपयोग किया गया उससे भी अण्णा लीला और जास्मिन क्रांति का साम्य दिखाना स्वाभाविक था। जिस रिकी पटेल ने इजिप्त, जॉड्रन और ट्यूनीशिया में सोशल मीडिया का उपयोग किया था वही रिकी पटेल अण्णा हजारे की अनशनलीला में भी योगदान कर रहा था। यह दुर्दशा अकेले जंतर-मंतर की मौखिक क्रांति की ही नहीं है, बल्कि अरब की जास्मिन क्रांति भी विफलता का सामना कर रही है। जब अण्णा ‘मौन व्रत’ पर थे ठीक उसी समय जास्मिन क्रांति के भूक्षेत्र अरब में महत्वपूर्ण घटनाएं हुई।


 तहरीर चौक की क्रांति के साथ ही लीबिया में शुरू हुई बगावत में छिड़े युद्ध में कर्नल मुअम्मर गद्दाफी अपने गृह नगर सिरते में मारे गए। गद्दाफी के बाद सऊदी अरब के 86 वर्षीय राजकुमार की मौत और ट्यूनीशिया में चुनाव सम्पन्न हुए। जास्मिन क्रांति में शामिल सीरिया में बशर-अल-असद की सत्ता के खिलाफ हिंसा का दौर जारी है, यमन अराजकता के अंधड़ से मुकाबिल है। इजिप्त तहरीर चौक की क्रांति पर पछता रहा है। आठ माह पुरानी क्रांति घायल, रक्तरंजित और भ्रमित है, विशेषकर बड़े पैमाने पर अब अलोकप्रिय है। कोई नहीं जानता कि इसका नियंत्रा किसके पास है? शक है कि यह सचमुच क्रांति थी या सैनिक तख्तापलट। अधिकांश इजिप्तवासी निराश और खौफजदा हैं।होस्ने मुबारक को हटाना सेना को तो मुबारक हुआ है, जनता को नहीं।  अमेरिका के पैसों पर पलने वाली सेना अब वहां आम निहत्ते नागरिकों का क़त्ले आम कर रही है...कुछ दिनों पहले पूरे विश्व में मिश्री सेना द्वारा सरे आम एक महिला को निर्वस्त्र कर जूते लातों से निर्ममता से पीटने का विडियो और समाचार प्रकाशित हो चुके हैं...तहरीर चौक रो रहा है...उधर  बहरीन में जास्मिन क्रांति विफलता का स्वाद चख चुकी है। अब मुंबई में जनलोकपाल पर हुए असफल आन्दोलन के बाद ....केवल असफलता के समाचार निकल कर आ रहे हैं... टीम अन्ना के निरंकुश बर्ताव ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है...जिस टीम ने कभी अपने मंच से उमा भारती को चढ़ने नहीं दिया था...जिस ने रामदेव से परहेज़ किया था...अब वही टीम अन्ना के सदस्य ...रामदेव की शरण में जा रहे हैं...उन रामदेव की ...जिनका काला धन मुद्दा...हाशिये पर पड़ा है...बाबा काले धन पर जोर लगाएं.....या जनलोकपाल पर......कुल मिलकर ...देखा जाए....तो तहरीर चौक की क्रान्ति से लेकर....लीबिया, यमन, ट्यूनिसिया, सीरिया...की प्रायोजित क्रांतियों के साथ  जनलोकपाल आन्दोलन का  हश्र  भी लगभग...एक जैसा ही हो चुका है.....!!

सोशल नेटवर्किंग साइट्स से राष्ट्रिय एकता और धार्मिक सौहार्द की कीमत पर समझौता हरगिज़ नहीं~~!

देश में सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लगाम की अटकलों पर नज़र डाली जाए तो पायेंगे कि ..इसके मूल में राष्ट्रिय एकता, सौहार्द और धार्मिक समन्वयता को बिगाड़ने वालों पर शिकंजा कसने और सजा  का ही विचार है....न कि किसी राजनैतिक पार्टी या आन्दोलन पर लगाम लगाने की....यह अफवाहें फैलाने वाले वही लोग हैं...जो कि इस गंदगी को फेसबुक पर फैला कर खुश हो रहे हैं.....जो फेसबुक यूज़र ज्यादा राजनैतिक ग्रुप्स के सदस्य रह चुके हैं...उन को पता होगा कि कई ग्रुप तो सिर्फ विद्वेष और घृणा फैलाने के लिए ही बने हैं...काफी यूज़र इस बात के गवाह भी होंगे...भले वो सामने ना आयें...या सहमती ना दें...पर यह सच है....फेसबुक पर ऐसे सैंकड़ों  घृणित ग्रुप्स की बड़ी लम्बी लिस्ट हैं...जैसे  कि समाचार हैं...कि गूगल, फेसबुक और 19 अन्य सोशल नेटवर्किंग साइटस पर विभिन्न वर्गों  के बीच वैमनस्य बढ़ाने के आरोप में कानूनी कार्रवाई के आदेश कोर्ट ने दिया हैं..  अदालत ने कहा था कि शुरुआती प्रमाणों के आधार पर आरोपी  21 कंपनियों के खिलाफ वर्ग वैमनस्य बढ़ाने, राष्ट्रीय एकता को क्षति पहुंचाने और लोगों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने के लिए समन जारी करने का मामला बनता है।
भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश में सोशल नेटवर्किंग साइट्स का गलत प्रयोग  कुछ प्रदूषित  मानसिकता वाले संगठनों द्वारा प्रायोजित ग्रुप और कुछ हद तक धार्मिक वैमनस्यता फैला कर वोट बटोरने वाली राजनैतिक पार्टियाँ करती चली आ रही हैं...!!

 राजस्थान में पिछले माह तीन शहरों में ऐसे ही फेसबुक पर  धार्मिक वैमनस्यता फैलाने वाले फोटो को लेकर तीन चार दिन तक जमकर उपद्रव हुआ था...जिसको की बाद में राज्य व केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बाद हटा दिया गया...अब ऐसे में देश के किसी भी धर्मं का आदमी नहीं चाहेगा कि उसके धर्म का फेसबुक या अन्य साइट्स पर अपमान हो....इसलिए केंद्र सरकार और सूचना प्रसारण मंत्रालय को कोई रास्ता इस साइट्स के अधिकारीयों के साथ मिल बैठकर निकालना होगा.... .जिससे कि देश में कम से कम ऐसे ज़बरदस्त सोशल नेटवर्किंग साइट्स का दुरूपयोग न हो पाए...और साथ ही मैं जो करोड़ों यूज़र इस का सदुपयोग कर रहे हैं...उनको निराशा भी ना हो....और रास्ता होगा भी.....निकलेगा भी....क्योंकि इस सूचना क्रान्ति के दौर में कुछ भी असंभव नहीं...! और साथ ही में कोर्ट यह भी सुनिश्चित करे कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का हनन भी ना हो....तीसरी बात यह क़दम राष्ट्रीय एकता..अखंडता और सौहार्द को बचने के लिए हो.....ना कि राजनीतक लाभ उठाने या फिर किसी दल विशेष को निशाना बनाने के लिए...!और इसके समर्थन में उन सभी यूज़र्स को आगे आना चाहिए जो कि इस मंच का रचनात्मक उपयोग कर रहे हैं...जो इसकी उपयोगिता समझते हैं...!!

भाजपा--लोकायुक्त ---और जनलोकपाल--मुखौटा दर मुखौटा~~~~!!

भारत में भ्रष्टाचार से लड़ाई अगर लोकपाल , या उसके कथित आदर्श रूप ' जन लोकपाल ' के जरिए ही लड़ी जानी है , तो संसद के दोनों सदनों में इस मुद्दे पर हुई राजनैतिक दलों की  बहस से लगता है कि इस लड़ाई का कोई भविष्य नहीं है। संसद में बीजेपी ने इस बिल की सबसे बड़ी कमजोरी यह बताई कि इसमें सीबीआई को लोकपाल के हवाले नहीं किया गया है। जिस पार्टी ने अपने शासनकाल में सीबीआई का खुला दुरुपयोग अयोध्या कांड में फंसे अपने गृहमंत्री को बचाने में किया हो , वह अचानक इस संस्था को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के लिए आतुर हो जाए , यह बात आसानी से गले नहीं उतरती। बहरहाल , सरकारी लोकपाल विधेयक के प्रति बीजेपी की सबसे बड़ी नाराजगी का बिंदु सीबीआई नहीं , राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति है। लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने के विधेयक का विरोध करते हुए उसका कहना था कि सरकारी बिल में लोकपाल की ही तर्ज पर लोकायुक्तों की नियुक्ति की बात कह कर देश के संघीय ढांचे का उल्लंघन किया गया है। यह चूंकि खुद में एक असंवैधानिक प्रस्थापना है , लिहाजा इसे जायज बनाने वाले संविधान संशोधन को मंजूरी नहीं दी जा सकती।


बिना किसी प्रस्तावना या पूर्वपीठिका के आया बीजेपी का यह विचार सचमुच बौखलाहट पैदा करने वाला है। रामलीला मैदान में अपने अनशन के दौरान अन्ना हजारे ने जो तीन - चार शर्तें संसद के सामने रखी थीं , उनमें एक यह भी थी कि राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति लोकपाल को ही मॉडल बनाते हुए की जाए और इसे लोकपाल कानून के जरिए बाध्यकारी बनाया जाए। उस समय बीजेपी ने न सिर्फ संसद में अन्ना की सारी शर्तों की ताईद की थी , बल्कि तब से अब तक सभी संभावित मंचों से इसका श्रेय लेने की भरपूर कोशिश भी की थी। और तो और , हाल में जंतर - मंतर पर अन्ना के एक दिवसीय अनशन में उनके मंच पर पहुंचे शीर्ष बीजेपी नेताओं ने एक बार भी ऐसा कोई संकेत नहीं दिया कि अन्ना की कुछ शर्तों से उनका विरोध है , और उन्हें वे असंवैधानिक मानते हैं। बल्कि मीडिया के सामने अन्ना की हर बात में उनकी मुंडी हाँ में ही हिलती नज़र आयी थी...जो कि संसद में अचानक ही ना में हिलती नज़र आने लगी...!

कंबल ओढ़कर घी पीने की यह रणनीति मौका मिलने पर भारत की सारी राजनीतिक पार्टियां अपनाती हैं , जिसमें उनके नेता यह मानकर चलते हैं कि इस देश की जनता ज्यादा महीन बातें नहीं समझती , और जब तक हवा अपनी तरफ है , तब तक किसी भी मुद्दे पर स्याह - सफेद में कुछ कहने की जरूरत क्या है।

यह तो वही घृणित राजनीतिक ट्रेंड है~~~~!!

अन्ना हजारे ने अपने लोकपाल आंदोलन के प्रचार में जिस प्रकार कांग्रेस के नौजवान नेता राहुल गांधी का नाम घसीटा और बार - बार बिना किसी तर्क के उनकी आलोचना की , वह अनावश्यक था। लेकिन वह वर्षों पुराने एक राजनीतिक ट्रेंड की याद दिलाता है। यह ट्रेंड है किसी जन नेता की लोकप्रियता को खत्म करने के लिए उस पर बार - बार कीचड़ उछालना , उसके प्रति लोगों के मन में संदेह पैदा करना और उसे विलेन की तरह पेश करना। यह ट्रेंड मुख्य तौर पर भारतीय जनता पार्टी का रहा है। जनसंघ के जमाने से बीजेपी इसी ढर्रे पर चल रही है।

हर चीज से एतराज :
लेकिन जब इंदिरा जी ने कार्यभार संभाला तब जनसंघ उनके खिलाफ बहुत आक्रामक था। अटल बिहारी वाजपेयी तब जनसंघ के आक्रमण का नेतृत्व करते थे। तब उन्हें ' गूंगी गुड़िया ' बताने का प्रयास किया जाता था।  जब राजा - रजवाड़ों के प्रिवी पर्स समाप्त करने की उन्होंने घोषणा की , तब जनसंघ ने उसी प्रकार उनके खिलाफ अभियान चलाया , जैसे बीजेपी ने हाल के दिनों में खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी निवेश के सरकारी निर्णय के खिलाफ जोरदार प्रचार किया था। तब जनसंघ ने न सिर्फ प्रिवी पर्स खत्म करने के निर्णय के खिलाफ संसद में मतदान किया था , बल्कि अटल जी ने इस विधेयक के खिलाफ जोरदार भाषण भी दिया था। भारत - पाक युद्ध में हमारी विजय हो या बैंकों के राष्ट्रीयकरण का प्रस्ताव , जनसंघ ने हमेशा इंदिरा जी को निशाने पर रखा और बहुत बाद में जाकर उनका नेतृत्व स्वीकार किया। जब कांग्रेस के क्षितिज पर राजीव गांधी का उदय हुआ , तब तक बीजेपी अस्तित्व में आ चुकी थी। उन्हें बच्चा , नासमझ , अपरिपक्व बताने में बीजेपी ने कभी कोताही नहीं बरती। वही राजीव गांधी आगे चलकर कंप्यूटर क्रांति और उदारीकरण की नींव रखते हैं , जिस पर अपना आशियाना बनाने से अटल बिहारी वाजपेयी भी नहीं चूके। चाहे दलबदल विरोधी कानून हो या संविधान का 73 वां व 74 वां संशोधन , या 18 वर्ष तक के युवाओं को मतदान का अधिकार देने का फैसला , बीजेपी विरोध के लिए विरोध करती रही , लेकिन बाद में इन सभी फैसलों को भारत की राजनीतिक विरासत मानकर उसी रास्ते पर चली।

1998 में जब श्रीमती सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली , तब फिर बीजेपी को एक नया निशाना मिला। उनके विदेशी मूल के मुद्दे को बीजेपी ने राष्ट्रीय प्रश्न बना दिया। आडवाणी जी से लेकर स्व . प्रमोद महाजन तक - कांग्रेस के प्रति वैचारिक मतभेद पर जोर देने के बजाय सोनिया गांधी पर व्यक्तिगत हमले करने लगे। उन्होंने इसे चुनावी मुद्दा भी बनाया। 2004 का लोकसभा चुनाव बीजेपी ने इसी मुद्दे पर लड़ा। सुषमा स्वराज ने बाल मुड़वा कर संन्यासन बनने तक की धमकी दे डाली। नतीजा क्या हुआ ? दोबारा 2009 में भी बीजेपी को लोकसभा चुनाव हारना पड़ा। अब उन्होंने सोनिया गांधी का नेतृत्व स्वीकार कर लिया है। अक्सर सरकार के विवादास्पद फैसलों के वक्त बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व सोनिया जी की तरफ एक उम्मीद से देखता है। यह कोई बदलाव नहीं , बल्कि जनसंघ के जमाने से चला आ रहा घिसापिटा तौरतरीका है।

इसी तरीके का अब राहुल गांधी के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है। राहुल गांधी दलित के घर जाकर उनके साथ खाना खाते हैं तो बीजेपी उनकी आलोचना करती है। भट्टा पारसौल में किसानों के आंदोलन का नेतृत्व करते हैं तो बीजेपी को तकलीफ होती है। उत्तर प्रदेश में वे अपने तरीके से कांग्रेस का पुनर्जीवित करने में लगे हैं तो उसमें बीजेपी नुक्स निकालती है। लोकसभा चुनावों में जब कांग्रेस को आशातीत सफलता मिली , तो बीजेपी ने चुप्पी साध ली। गुजरात में या बिहार में कांग्रेस हार गई तो बीजेपी ने राहुल गांधी के नेतृत्व पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया। असम और केरल में जब राहुल गांधी के धुआंधार प्रचार से कांग्रेस जीती तो बीजेपी को सांप सूंघ गया। राहुल गांधी छुट्टी मनाने जाएंगे तो बीजेपी को एतराज होगा। वे लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने की बात कहें तो बीजेपी के साथी उन्हें बोलने से रोकने के लिए आक्रामक हो जाएंगे।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में बीजेपी या जनसंघ का यह चरित्र रहा है। बहुत समय तक वे गांधी का चरित्र हनन करने की कोशिश करते रहे। जब - जब गांधी - नेहरू परिवार से कोई नया नेतृत्व उभरा है , तब - तब उसे पनपने से रोकने के लिए बीजेपी ने निचले स्तर पर उतर कर हमले किए हैं। यहाँ तक की प्रियंका गांधी से भी इनको अब डर लगने लगा है...राबर्ट वढेरा को निशाना बना कर साथी हमले किये जा रहे हैं...बड़े शर्म की बात है..जो लोग महात्मा गांधी को नहीं माने..जो लोग गोडसे का महिमा मंडन करते नहीं थकते...उसके फोटो अपने घरों में लगाने की हिदायतें देते हों...उनसे आशा भी क्या की जा सकती है...
.. इसके अलावा पिछले कुछ समय तक वे मनमोहन सिंह की ईमानदारी को लेकर भी शक पैदा करने की कोशिश करते रहे हैं , हालांकि इसका उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ। अब कुछ उसी तरह के ढर्रे पर अन्ना हजारे भी चलते दिख रहे हैं। वे कहते हैं , ' गरीब की झोपड़ी में जाकर खाना खाने से कुछ नहीं होगा ' या ' मुझे ऐसा अंदेशा होता है कि इसके पीछे राहुल गांधी है।

अन्ना की ऐसी टिप्पणियां बीजेपी वालों की टिप्पणी से कतई भिन्न नहीं लगती। राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की काबिलियत पर रोज बीजेपी डर कर  अपनी आशंका प्रकट करती है , अन्ना ने भी जंतरमंतर से बोलते हुए यही कहा। दरअसल अन्ना हजारे ने जिस लोकपाल की स्थापना के लिए राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ा , राहुल गांधी ने उसको चुनाव आयोग की तरह एक संवैधानिक दर्जा देने का आग्रह करके अन्ना के आंदोलन को एक ताकत देने की कोशिश की थी । और भाजपा ने अपना पूरा जोर लगा कर इस कोशिश को अमल में नहीं लाने दिया...!!
(श्री संजय निरुपम जी के लेख से साभार)
सम्बंधित लिंक :-  http://navbharattimes.indiatimes.com/thoughts-platform/viewpoint/--/electionarticleshow/11122091.cms 


इतनी कमज़ोर टीम अन्ना...माँगे...मज़बूत जन लोकपाल~~~!!

अन्ना बीमार होकर हॉस्पिटल पहुँच गए इसके साथ उनका अनशन और जेल भरो आन्दोलन भी रद्द हो गया| अ़ब भारत जैसे देश में कुछ चुप्पी और शांति हो चुकी है| टीम अन्ना जो हमेशा मीडिया में विवरण देती नज़र आती थी अब वो कहाँ हैं ? क्या अन्ना जी की तरह टीम अन्ना भी बीमार है? यदि अन्ना बीमार हैं तो उनकी टीम को अनशन के साथ जेल भरो आन्दोलन रद्द नहीं करना चाइए था | क्या टीम अन्ना यह सब करने में असमर्थ हैं ? यह टीम अन्ना पर ही निर्भर क्यों हैं ? यदि टीम का कप्तान बीमार है तो पूरी टीम को खेलना बंद कर देना चाइए ?

मुंबई अनशन का रद्द होना अन्ना का बीमार होना क्यों बोला जाता हैं ? यदि अन्ना जी बीमार थे तो उनको मंच पर क्यों बिठाया गया ? टीम अन्ना को अनशन जारी रखना चाइए था | यह टीम अन्ना इतनी बेसहारा और कमजोर क्यों हैं ? पर यह बात मजबूत लोकपाल के लिए करती हैं | यदि देखा जाए तो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भीड़ की वजह से आगे खिसक रहा था | कहने को इस आन्दोलन का फायदा लोगों को और यह उनके लिए है परन्तु असलियत तो यही हैं उनकी टीम भीड़ को टूल्स समझ कर इस्तेमाल कर रही है|

यह " लाओ या जाओ " क्या है...अन्ना जी....??

लोकपाल जैसी कोई संस्था होनी चाहिए, यह विचार दशकों पुराना है। इस अवधि में कई विभिन्न पार्टियां सत्ता में रहीं परंतु लोकपाल बिल की ओर किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया। चाहे वह जनता पार्टी हो, वी. पी. सिंह या भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए - सभी ने लोकपाल बिल के प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डालकर रखा। फिर एकदम अचानक से अन्ना के   यह ताबड़तोड़  नारे, उपवास, अनशन, और आंदोलन क्यों.... ? क्या एक ही बार में दशकों से चले आ रहे इस भ्रष्टाचार रुपी ट्यूमर  का इलाज करना संभव है...? यानी एक साथ ही इस ट्यूमर की कीमोथेरेपी, एंटीबायोटिक, चीर फाड, मरहम पट्टी सब हो सकना संभव है...? बिलकुल नहीं.....इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्तमान व्यवस्था में कई खामियां हैं। यह व्यवस्था बहुत धीमी गति से काम करती है। परंतु सवाल यह है कि इस व्यवस्था का विकल्प क्या है ? क्या यह विकल्प “लाओ या जाओ“ है, जैसा कि अन्ना कह रहे हैं। क्या “लाओ या जाओ” नारे की मूल प्रकृति राजनैतिक नहीं है ? क्या इसका अंतिम लक्ष्य उस पार्टी को शासन में लाना नहीं है जिससे जुड़े तत्व “मैं अन्ना हूं“ टोपियां और टी शर्टें बांट रहे हैं और घर-घर जाकर मध्यम और अन्य वर्गों का समर्थन जुटा रहे हैं ? यह कैसा इलाज है...यह इलाज तो  रोग से भी ज्यादा खतरनाक है.....।।

विचलित कोण के साइड इफेक्ट ~~~!!

भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस लड़ाई के आयाम, कोण  और दिशायें पूर्ण रूप से केवल भ्रष्टाचार के ही खिलाफ होना चाहिये न कि किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ या किसी राजनीतिक दल विशेष के खिलाफ , भ्रष्टाचार वहॉं भी है जहॉं भाजपा की या अन्य गैर कांग्रेसी दलों की सरकारें हैं , लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की दिशा बदल कर जब कांग्रेस के खिलाफ लड़ाई में बदल जाती है तो भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाया जाने वाला हर आंदोलन चाहे वह सामाजिक आंदोलन ही क्यों न हो दूषित होकर उसमें खोट आ जाता है और तब वह आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ न होकर कांग्रेस के या सरकार के या संसद के खिलाफ आंदोलन में परिणित हो जाता है...!  तब ऐसा आंदोलन राजनीतिक आंदोलन में स्वत: परिणित हो जाता है और खुद ब खुद ही ध्वस्त हो जाता है , रामदेव हों या अन्ना हों ... जब तक सामाजिक जमीन पर रहे .. आंदोलन की दिशा सामाजिक बनाये रखे रहे तब तक इनके आंदोलन जीवित बने रहे, लेकिन जैसे ही इनके आंदोलनों में राजनीतिक मिश्रण प्रारंभ हुआ और इनकी लड़ाईयॉं भ्रष्टाचार से हट कर राजनीतिक लड़ाई में तब्दील हुयीं, तैसे ही इनके आंदोलन और इन लोगों के वजूद भी ध्वस्त हो गये.... देश बनाम भ्रष्टाचार और आंदोलन बनाम कांग्रेस में बहुत फर्क है ... दूसरी बात जो भी भ्रष्टाचार की लड़ाई के  फौजी खुद ही तीन पॉंच करने काले पीले नीले हरे करने के काम में लिप्त हो यह देश उसका साथ कतई नहीं देगा ...!!