सोमवार, 20 जनवरी 2014

"मोदी गान" से कांग्रेस लाभान्वित ??

वर्तमान में राष्ट्रिय राजनैतिक परिदृश्य में जो अचानक से उठा पटक देखने में आयी है, उसमें प्रमुख है भाजपा द्वारा अपने तथाकथित लोह्पुरुष और भीष्म पितामाह का राजनैतिक वध कर उन्हें हाशिये पर धकेल ...मोदी को अपना चेहरा बना लेना, इसका चरम गोवा में तब देखने को मिला जब मोदी को अडवाणी की अनुपस्थिति में भाजपा के प्रचार अभियान समिति प्रमुख बनाने की घोषणा करना और इसके बाद अडवाणी का इस्तीफ़ा और उसके बाद NDA गठबंधन से JDU का अलग हो जाना !

मोदी को अप्रत्यक्ष रूप से प्रधान मंत्री के लिए आगे किये जाने से न केवल भाजपा में आंतरिक कलह खुल कर सामने आयी है, बल्कि उसके बड़े सहयोगी भी किनारा करने लगे हैं, जबकि प्रत्यक्ष रूप से भाजपा खुल कर भी मोदी को अगले भावी प्रधान मंत्री के रूप में प्रोजेक्ट नहीं कर पा रही है, इसके पीछे भी कई कारण हैं...जो समय आने पर सामने आते रहेंगे !

मगर भाजपा के इस मोदी गान से अभी तक देखा जाए तो नुकसान में सिर्फ भाजपा ही रही है, चाहे वो आंतरिक कलह हो, या अडवाणी का इस्तीफ़ा या JDU का 17 साल पुराना गठबंधन टूटना, आगामी लोकसभा चुनाव भाजपा केवल मोदी के सहारे जीतने की आशा कर रही है, मगर शायद गठबंधन और विखंडित जनादेश के इस दौर भाजपा मोदी के दम पर आगामी लोकसभा चुनावों में बहुमत हासिल कर सके, मुश्किल नज़र आ रहा है, कारण यह कि भाजपा के पास इस समय कोई ज्वलंत मुद्दा नहीं है, भ्रष्टाचार हो या काल धन...दोनों मुद्दे अन्ना/केजरीवाल और बाबा रामदेव ने पहले ही लपक लिए हैं,  राम मंदिर का मुद्दा खुद भाजपा ही उठा कर ठन्डे बसते में डाले बैठी है, अब केवल विकास और विकास पुरुष ही उसके पास एक आसरा हैं...जो कि शायद ही 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता को आकर्षित कर पाए, हाँ यह बात दीगर है कि इस बार राम मंदिर के बजाय मोदी को चेहरा बना कर वोटों का ध्रुवीकरण करने की भाजपा की मंशा हो, मगर राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों और बंटे हुए जनमानस के कारण मोदी फेक्टर समूचे देश में हिलोरें लेने लगे तो यह भी संभव नज़र नहीं आता !

UPA 2 सरकार में हुए घोटालों से आक्रोशित जनता के आक्रोश के दोहन का सुनहरा मौक़ा भाजपा के हाथ से फिसलता नज़र आ रहा है, क्योंकि पीछे देखें तो पाएंगे कि कांग्रेस ने अन्ना/बाबा रामदेव और केजरीवाल के भ्रष्टाचार और काले धन के विरुद्ध लगातार किये गए आन्दोलनो, उपवासों, क्रांतियों के बावजूद उत्तराखंड,  हिमाचल से लेकर कर्णाटक तक सरकारें बनाई हैं,  कांग्रेस द्वारा जीते गए इन राज्यों के चुनाव नतीजे आगामी लोकसभ चुनावों पर प्रभाव डाल पायें या ना डाल पायें ..मगर भाजपा को इससे नसीहत लेने की आवश्यकता ज़रूरी है !

अब जबकि अडवाणी ने इस्तीफ़ा वापस ले लिए है, और इधर JDU से 17 साल पुराना रिश्ता टूट गया है, और नीतीश आने वाले दिनों में निर्दलीय विधायको के समर्थन से पुन: विश्वास मत हासिल कर लेंगे...तो ऐसे में अब भाजपा को फिर से नए सिरे पर नयी रणनीति बनानी होगी..क्योंकि अभी तक ..मोदी को आगे करने का नुकसान केवल और केवल भाजपा को ही हुआ है, रही JDU की बात तो वो किसी नुकसान में नज़र नहीं आ रहा, इधर सबसे ज्यादा लाभान्वित प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस हुई है...चाहे वो राष्ट्रिय राजनीति में सिकुड़ती भाजपा हो, या उसकी आंतरिक कलह, या अडवाणी का इस्तीफ़ा या फिर JDU गठबंधन का टूट जाना, कांग्रेस इस नूरा कुश्ती के तमाशे को अपने हित में परिवर्तित करती नज़र आ रही है !

ऐसे में अब 2014 के आगामी लोकसभा चुनावों और उसके जनादेश के लिए किस मुद्दे पर कौनसी पार्टी कैसे समीकरण बैठाती है, किन किन मुद्दों पर चुनाव लडती हैं, जनता की बैचैनी, उसकी उम्मीद और समस्याओं का सकारात्मक निराकरण किस प्रकार करती है, यह देखना है, कहते हैं परिवर्तन प्रकृति का नियम है, जनता परिवर्तन के लिए वोट देती है, साथ ही चुनावों से राजनैतिक शुद्धिकरण की आशा भी जनता करती है, ऐसे में देश के बड़े राजनैतिक दलों, और सभी के दलों के नेताओं के साथ देश की जनता का भी यह कर्तव्य बनता है कि देश को एक साफ़ सुथरी, प्रगतिशील, विकासोन्मुख और शक्तिशाली सरकार देने की भरपूर कोशिश करें...जय हिन्द !!

देख तेरे फेसबुक की हालत क्या हो गई जुकरबर्ग !!

देश में सोशल साइट्स देखा जाए तो राजनीति का अखाड़ा ज्यादा ...और सोशल कम नज़र आने लगी हैं...इसमें फेसबुक भी शामिल हो गया है...जिस तरह से आज फेसबुक पर विगत कुछ वर्षों में ...क्रिया कलापों में अंतर आया है, उसके सभी पुराने यूज़र साक्षी होंगे, कभी एक समय था जब अधिकांश यूज़र्स आपस में यहाँ एक दूजे से खूब संवाद करते थे, फोटो, वीडियो शेरो शायरी आप बीती जग बीती शेयर करते थे, राजनैतिक गुटुर गूं ना के बराबर ही होती थी ...ना ही कोई ऐसे सम्बंधित ख़ास ग्रुप या पेजेज़ थे !

मगर साल 2011 के आरम्भ होते ही जैसे ही मिस्र में तहरीर चौक क्रांति का आग़ाज़ हुआ...और उस क्रांति में सोशल नेटवर्किंग साइट्स की भूमिका के प्रभाव को ..पूरी दुनिया ने देखा, भारत में भी इस सोशल मिडिया को अपने अपने हितों के लिए साधने की मुहीम प्रारंभ हो गयी, इसका सबसे बड़ा उदाहरण कहा जाए तो वो है अन्ना हजारे टीम द्वारा फेसबुक पर गठित इंडिया अगेंस्ट करप्शन (IAC) ग्रुप ! जिसने आगे जाकर जनलोकपाल आन्दोलन ...और उसके बाद केजरीवाल और फिर आम आदमी पार्टी को भी जन्म दिया !

इस IAC की नींव रखते ही इसका धुंवा धार प्रचार सोशल मीडिया के साथ धीरे धीरे न्यूज़ चेनलों पर भी होने लगा, तो अन्य दलों, संगठनो के कान भी खड़े हुए...और नतीजा यह निकला कि हर राजनैतिक दल, हर प्रकार के धार्मिक, सामजिक संगठन, NGO's, नेता ..अभिनेता ..सभी इस पर टूट पड़े, और धीरे धीरे यह फेसबुक एक अखाड़े में तब्दील होने लगा, आज यहाँ हर राजनैतिक दल, और उन दलों से जुड़े संगठन...उनके कार्यकर्त्ता अपने अपने दलों के प्रचार के लिए मोजूद हैं !

मगर इसके साथ ही कई अवांछित लोग, संगठन भी यहाँ धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए कमर कसे बैठे हैं, कई बार सुनने में और देखने में आया है कि कुछ मति भ्रष्ट लोग किसी धर्म के खिलाफ कुछ भी लिख देते है, या कई बार आपत्तिजनक फोटो आदि भी पोस्ट कर देते हैं, जो कि बहुत ही घृणित मानसिकता का धोतक है !

अब फेसबुक पर लोग एक दूसरे को किसी न किसी ऐसे राजनैतिक या धार्मिक ग्रुप में घसीट कर ले ही जाते हैं. फेक प्रोफाइल की भरमार हो चली है, अब यहाँ रोज़ कोई न कोई क्रांति का बिगुल बजाया जाने लगा है, रोज़ किसी आन्दोलन की हुंकार भरी जाती नज़र आने लगी है, ..लगने लगा है कि देश यहीं से चलाया जा रहा है, चुनाव में यही से विजय घोषित होगी ...रोज़ इस आभासी दुनिया में राजनैतिक और धार्मिक विषयों पर जमकर हंगामा और लठैती होती है !

यह सही है कि सूचना क्रांति के इस हाई टेक दौर में सोशल मीडिया के इस नायाब मंच का बहुत बड़ा योगदान है, यदि इसका सदुपयोग ....सार्थक राजनीति, धार्मिक और सामजिक गतिविधियों के लिए किया जाए तो यह बहुत ही प्रभावकारी हो सकता है, परन्तु यदि इसके उलट इसका दुरूपयोग देश हित, देश की संप्रभुता, धार्मिक सद्भावना, सामजिक मूल्यों के विरुद्ध या अराजकता फैलाने के लिए होने लगे तो यह चिंतनीय है !!

BCCI को खेल अधिनियम और RTI के दायरे में लाया जाए !!

IPL 6 में हुए फिक्सिंग काण्ड के बाद से क्रिकेट प्रेमियों में निराशा और दुःख का माहौल बना हुआ है...वही दूसरी और राजस्थान रायल्स के तीन खिलाडियों की गिरफ़्तारी और उसके बाद बिंदु दारा सिंह के साथ BCCI चीफ श्रीनिवासन के दामाद मयप्पन की गिरफ्तारी ने पूरे देश को चौंका ही दिया, साथ ही एक के बाद एक सट्टेबाजों की गिरफ्तारी और उनके तार BCCI के साथ IPL की टीमों और खिलाडियों से जुड़ने के सबूत भी सामने आने लगे हैं, फिर भी छोटी मछलियाँ फंस रही हैं, बड़ी मछलियों पर कोई आंच नहीं आ पायी !

इन सबके बाद BCCI अध्यक्ष श्रीनिवासन पर इस्तीफे का दबाव भी बढ़ गया है, दामाद की गिरफ्तारी के बाद भी श्रीनिवासन अपना इस्तीफ़ा नहीं देने पर अड़े हैं, अब धीरे धीरे राज्य संघों ने भी इस्तीफे के लिए आवाज़ उठानी आरम्भ कर दी है !

मगर केवल श्रीनिवासन के इस्तीफे से ही बात नहीं बनने वाली, BCCI ने आरम्भ से अपने आपको बड़ी चतुराई से किसी भी सरकारी नियंत्रण से मुक्त रखा है, जबकि BCCI करोड़ों रुपयों की मनोरंजन कर में छूट सरकार से ही लेती है, इसके अलावा लीज़ पर ज़मीनें, और दूसरी और BCCI  इनकम टेक्स, कस्टम ड्यूटी और अन्य कई प्रकार की छूट सरकार से ही लेती है, और हर छोटे बड़े खेल आयोजन पर सुरक्षा और अन्य नागरिक सुविधाओं की ज़िम्मेदार भी सरकार ही उठाती आयी है !

अब जब कि IPL जैसे आयोजन में ललित मोदी के समय से जमकर लूटा खसोटी, सट्टेबाजी, खिलाडियों का इसमें लिप्त होने जैसी खबरें निकल कर बाहर आयीं हैं, तो भी BCCI हर पिछले काण्ड की तरह लीपा पोती पर उतर आया है, बात यहाँ श्रीनिवासन के इस्तीफे की हो रही थी, मगर केवल इस्तीफ़ा ही पर्याप्त नहीं होगा...BCCI को खेल अधिनियम और RTI के दायरे में भी लाया जाए, बोर्ड में खिलाडियों को ज्यादा तरजीह दी जाए, राजनीतिज्ञों का हस्तक्षेप बिलकुल ख़त्म हो, हर IPL और अन्य आयोजनों में पारदर्शिता लाने के लिए आयोजन से पहले ही सतर्कता कमिटी बनाई जाए, जिसमें गृह मंत्रालय के अफसरों के साथ पूर्व क्रिकेट खिलाडियों के साथ BCCI और खेल मंत्रालय के अफसर भी शामिल हों...ताकि आगे से कोई भी ऐसा काण्ड नहीं हो जिससे भारत की  क्रिकेट का नाम विश्व में बदनाम हो !

और यह तभी संभव हो पायेगा जब BCCI को दिग्गजों, राजनीतिज्ञों, से मुक्त किया जाए, इनकी जगह पूर्व क्रिकेट खिलाडियों को अधिक से अधिक बागडोर सौंपी जाए, फ्रेंचाइज़ी से आने वाले पैसों और जाने वाले पैसों के प्रवाह पर कड़ी नज़र रखी जाए,    ...और इस स्वच्छंद हो चुके BCCI नामक घोड़े को खेल अधिनियम और RTI की लगाम से काबू में किया जा सके !!

आने दो...IPL-7 को भी~~!!


IPL 6 में हुए फिक्सिंग ड्रामे के बाद BCCI की आज हुई बैठक की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि बैठक में IPL कमिश्नर राजीव शुक्ला उपस्थित नहीं थे, मीटिंग से जो लब्बो लुबाब निकल कर बाहर आया वो कोई हैरानी वाला नहीं था, क्योंकि BCCI ने हमेशा से ही ऐसे मामलों पर लीपा पोती करने की कोशिश की है, और आगे भी जारी रहेगी, शायद IPL के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी का नाम सभी जानते होंगे, अब वो देश से रफू चक्कर हैं...उनका IPL में किया गया 470 करोड़ रुपए के गबन का मामला भी ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया है !
 
IPL के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी ने 470 करोड़ रुपए का गबन किया था...श्री मोदी के खिलाफ लगाये गये मुख्य आरोपो में मीडिया अधिकारों में 425 करोड़ रुपये का गबन , सुरक्षा मामलों पर 25 करोड़ और निशुल्क प्रसारण के व्यापारिक अधिकारों में 29 करोड़ रुपये का गबन शामिल है। BCCI ने उस समय भी ढुलमुल रवैय्या अपनाया था...क्योंकि उनको पता था कि ललित मोदी ने अगर सच बताना शुरू किया तो कई सफेदपोश चेहरे भी बेनकाब होंगे...कई बड़े नाम सामने आयेंगे...और यही कारण रहा कि ललित मोदी कुछ BCCI और कुछ राजनैतिक ढील के कारण अब तक आज़ाद हैं...अब IPL में हुए इतने बड़े गबन और घोटाले के बाद भी IPL बदस्तूर चालू है...और इस वर्ष IPL 6 में फिर फिक्सिंग का लोचा सामने आ गया है, और इसी फिक्सिंग लोचे से यह बात भी निकल कर बाहर आयी है कि IPL - 5 में भी फिक्सिंग हुई थी !


मगर जैसा कि ललित मोदी मामले में हुआ है...BCCI सहित सभी मुनाफाखोरों ने इस मुद्दे को भी धीरे धीरे ठंडा करने का मन्त्र ढून्ढ ही लिया है...क्योंकि वो बखूबी जानते हैं कि इस क्रिकेटिया नशे को लोगों की नसों में बहुत ही गहराई तक इंजेक्ट किया जा चुका है...जस्टिस काटजू के 90 % भारतियों को मूर्ख कहने से बहुत पहले ही शायद BCCI ने यह सत्य भांप लिया था, इसी लिए उसने क्रिकेट को IPL जैसे उत्पाद में परिवर्तित कर दिया ! इसलिए जब खरीदार सहमत है तो बेचने वाले क्यों पीछे रहें....तो जमकर बेचिए इस क्रिकेटिया नशे को ....और आने दीजिये...IPL - 7 को भी....!!

IPL में चौका, छक्का लगे तो उठिए और नाचिये ...!!

आजकल टी वी पर IPL के लिए किया गया फरहा खान का एक विज्ञापन बहुत दिखाया जा रहा है, जिसमें वो किसी के भी घर, दफ्तर, कमरे में बेन्ड बाजे के साथ घुसकर ...वहां मोजूद बन्दों को आदेश देती नज़र आती है...वो फरमाती है..." IPL में जब भी चौका या छक्का लगे...तो ऐसे नाचने का " ..फिर उनके साथ आया बेन्ड धुन बजाता है... जिसे विशाल शेखर ने कम्पोज़ किया ....जिसे खुद फरहा खान ने कोरियोग्राफ किया ...और फरहा खान अपना भौंडा सिग्नेचर नाच शुरू करती है..."दिल जम्पक जम्पक जंपिंग जपांग ..गीली गीली ".. फिर इसके बाद वो सामने वाले बन्दों को आदेश देती हैं कि शुरू हो जाओ...बेचारे ...फरहा खान के आदेश के बाद वो भी उस भौंडे नाच की बेहूदा नक़ल करते हैं....जब लोगों के वाहियात ठुमके पूरे हो जाते हैं ...तो फिर फरहा खान...उनको डांट कर कहती हैं...ढंग से कर....फिर सामने वाले लोग बेचारे..उस बेहूदा नाच और धुन पर ठुमकते नज़र आते हैं, बाद में जाते जाते फरहा खान एक और आदेश दे कर जाती हैं..." सिर्फ देखने का नहीं ..और रही सही कसर आँख मार कर पूरी कर जाती हैं !

राष्ट्रिय खेल की वाट लगाने हाकी तथा देश के परंपरागत खेलों को निगलने वाले और देशप्रेम की चाशनी में डूबे हुए इस बिकते हुए खेल क्रिकेट को जमकर बेचा जा रहा है, खिलाड़ियों की बोलियाँ लग रही हैं...तो सब कुछ जायज़ है भाई ... यानी कुल मिलाकर अब यदि आप इस क्रिकेटिया नशे के आदी हैं, और घर पर IPL देखना चाहते हैं...तो याद रखिये...सिर्फ देखने का नहीं...हर चौके और छक्के पर उठिए ...साथ वालों को भी उठाइये...और नाचिये...और साथ में गाइये भी..." दिल जम्पक जम्पक जंपिंग जपांग ..गीली गीली ." .....आखिर क्रिकेटिया लत जो है...और उस पर तुर्रा यह कि फरहा खान का आदेश है, और सबसे बड़ी बात ...IPL जो है भाई !!

सोशल मीडिया पर देश खतरे में जो है ~~~~!!

फेसबुक पर वो भी क्या दिन थे ..जब यहाँ किसी प्रकार का कोई राजनैतिक ग्रुप नहीं था...सभी यूज़र आपस में हंसी ठिठोली करते थे, शेरो शायरी करते थे, फोटो शेयर करते थे, एक दूसरे से सुख दुःख बांटते थे, जमकर जश्न होता था...बुरा हो इस IAC ग्रुप का...जिसने यहाँ क़दम रखा...और इसके बाद तो जैसे होड़ लग गयी, पे-दर-पे ...एक के बाद एक ग्रुप और पेज खुलने शुरू हुए ...तो अभी तक पान बीडी के खोमचों की तरह रोज़ ही एक दो खुलते ही रहते हैं,  देशभक्ति का बुखार सा चढ़ आया.....शरीर देशभक्ति से तपने लगे हैं...अब रोज़ यहाँ जोशीले नारे लगते हैं !

आन लाइन होते ही यहाँ रोज़ सैंकड़ों डिजिटल क्रांतिकारी पैदा होते हैं, और लोग आउट करते ही गायब हो जाते हैं, अब फेसबुक पर किसी भी यूज़र को इधर उधर नहीं देखने दिया जा रहा, ना ही कुछ ज्यादा सोचने दिया जा रहा है, ..देश खतरे में जो है...हर यूज़र अपने मित्र को किसी भी राजनैतिक ग्रुप में घसीट लाता है, और उस से जय कारे लगवाता है...रोज़ इस डिजिटल दुनिया में ...जिसमें फेसबुक के साथ ट्वीटर भी शामिल है...पर लाखों यूज़र ...और अलग अलग ग्रुप के सदस्य और राजनैतिक दलों के समर्थक ....आमने सामने होते हैं...जमकर लठैती होती है...दलों और नेताओं के समर्थकों में कुश्ती कबड्डी होना रोज़ की बात है..सोशल साइट्स एक अखाड़े में तब्दील हो गया है....देश खतरे में जो है...ज़रा भी चूके ...कि देश का बंटा धार ...इसी लिए...लगे रहिये...देश फेसबुक - ट्वीटर से ही तो चल रहा है....झूझिये देश को बचाने के लिए ..क्रान्ति... बस होने ही वाली है....चूकिएगा नहीं....देश खतरे में जो है...!!

रिश्ते नाते वेंटिलेटर पर, जज़्बात कोमा में ~~!!


इक्कीसवीं सदी और वैश्वीकरण के इस दौर में हमें हर ओर प्रगति और उन्नति देखने को मिल रही है, चाहे वो कोई भी क्षेत्र हो, ज़बरदस्त दौड़ जारी है, मगर भौतिकतावाद के इस दौर में जहां शारीरिक सुख बढ़े हैं, वहीं लोगों का व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन तनावग्रस्त भी हुआ है, साथ ही पारिवारिक संबंधो की जटिलताएं भी बढ़ी हैं !
 
इसका मूल कारण है कि संबंधों को नापने तौलने का पैमाना बदल गया है, पैसा, ओहदा, समाज में रसूख, बंगला, गाडी और राजनैतिक पहुँच जैसे कई नए पैमाने बन चुके हैं, इनमें सबसे प्रमुख है "पैसा", हर रिश्ते को सबसे पहले पैसे का चश्मा लगा कर देखा परखा जाने लगा है, नए दौर में पैसों के भगवान जैसा बन जाने की वजह से रिश्तों की गर्माहट अब पहले जैसी नहीं रही, पैसों की खनक हो तो आपके रिश्ते भी औरों के साथ  खनकदार होंगे,  आपकी जेब गरम है तो रिश्ते और जज़्बात भी गर्माहट भरे होंगे, बाक़ी  रिश्ते तो सिर्फ दिखाने के लिए होते हैं, और सिर्फ घसीटे ही जाते हैं !

 आगे निकलने की अंधी दौड़, शान-ओ-शौकत, दिखावे की होड़ की वजह से  टूटते-बिखरते पारिवारिक रिश्तों की कई कहानियां अपने आस पास ही देखने सुनने को मिलती है, परिवारों में क्लेश, टूटते बिखरते परिवार, कहीं पति पत्नी में अनबन है, तो कहीं भाई भाई में, तो कहीं माता पिता द्वारा ही औलादों के साथ पैसों, रसूख और ओहदों के कारण भेदभाव !

हाल ही में हुआ पोंटी चड्ढा हत्याकांड इस गिरते, मरते, और घिसटते  पारिवारिक मूल्यों का सटीक उदाहरण है, सोचकर बहुत हैरानी होती है कि आज के दौर में पैसा खून के रिश्तों से ज्यादा ताकतवर हो गया है !

 यह एक कडवी सच्चाई है कि रिश्तों की नि:स्वार्थ गर्माहट एक तरह से गायब होती चली जा रही है, आपसी प्यार और लगाव को तरसते लोगों को परिवारों में देखा जा सकता है, भौतिकतावाद की  बलि चढ़ते इन रिश्ते नातों और जज्बातों के कारण पारिवारिक विखंडन बढ़ने लगा है, खून के रिश्ते भी किताबी से नज़र आने लगे हैं, नैतिक  पतन के साथ पारिवारिक मूल्यों का निरंतर पतन जारी है.....और इसके रुकने के कोई आसार नज़र भी नहीं आ रहे हैं...लग रहा है जैसे पारिवारिक मूल्य आई सी यू में हों,  रिश्ते नाते वेंटिलेटर पर हों, और जज़्बात कोमा में चले गए हों...शायद इसी से आहत होकर शायर दिनेश रघुवंशी जी ने यह अशआर कहे होंगे....>
 
मिलते हैं पर मिल के बात नहीं करते,
करते हैं तो दिल से बात नहीं करते !

ख़ुद से ही बतियाता रहता है अक्सर,
उसके अपने उससे बात नहीं करते !

पैसा, पैसा, पैसा, करने वाले सुन,
इंसानों से पैसे बात नहीं करते~~!!