बुधवार, 22 जुलाई 2015

इंसान का तराज़ू ~~!!

शीर्षक का नाम सुनते ही फिल्म इंसाफ का तराज़ू की याद आयी होगी, मगर यहाँ इस वक़्त इंसान का तराज़ू है, वो अदृश्य तराज़ू जो इंसान के दुनिया में आते ही उसके साथ लग जाती है, और इंसान मरते दम तक इसके साथ ही जीता है, वैज्ञानिक कह चुके हैं कि बच्चा गर्भ में अपनी माँ की आवाज़ सुनता है, और जब वो दुनिया में आता है तो माँ ही उसकी सबसे नज़दीकी और परिचित होती है, मगर जैसे जैसे वो देखना, समझना,रोना और मुस्कुराना शुरू करता है, तो उसे एक और व्यक्ति नज़र आता है वो होता है उसका पिता, जिसे वो जल्दी ही स्वीकार भी कर लेता है, और माँ-बाप के प्यार दुलार को तुलना शुरू कर देता है, और कह सकते हैं कि यहीं से उसके साथ एक अदृश्य तराज़ू साथ लग जाती है, और वो अपने माँ-बाप के बीच स्वयं द्वारा दिए जाने वाले पलों को तौलने लग जाता है, वो दोनों को अपना प्यार दुलार बांटना शुरू कर देता है, रिश्तों के बीच एक बैलेंस बनाने की जद्दो जहद यहीं से शुरू हो जाती है, बाद में धीरे धीरे यह दायरा बढ़ने लगता है, जैसे घर के अन्य सदस्य, दादा दादी, बड़े भाई बहन वगैरह, बच्चा जैसे जैसे बड़ा होता जाता है, संबंधों और भावनाओं के बैलेंस के लिए उसे उस अदृश्य तराज़ू की बार बार ज़रुरत पड़ने लगती है !


युवा होने का बाद वो कई मानसिक अवस्थाओं से गुज़रता है, कई प्रकार के भावनात्मक व वैचारिक बदलाव आते हैं, उसे अपनी पढ़ाई लिखाई के साथ अपने भविष्य को भी तराज़ू में रख कर तौलना पड़ता है, उसे अपनी शिक्षा, उसका खर्च, अपने लक्ष्य, भविष्य तथा माता पिता की आशाओं के बीच बैलेंस बनाना पड़ता है, हर चीज़ को हर आवश्यकता को हर मजबूरी को तौल कर देखना पड़ता है !


इस तराज़ू की सबसे बड़ी ज़रुरत पड़ती है शादी हो जाने के बाद, भले ही वो आदमी हो या औरत ...दाम्पत्य जीवन की शुरुआत से ही रिश्तों के पलड़ों का बैलेंस बनाने के लिए झूझने की अनवरत प्रक्रिया शुरू हो जाती है, पति को पत्नी के साथ संबंधों, कर्तव्यों और ज़िम्मेदारियों का बैलेंस बनाना होता है, तो दूसरी ओर घर परिवार के अन्य लोगों के साथ अपने नए परिवार के साथ भावनात्मक तथा मनोवैज्ञनिक बैलेंस बनाना होता है, यही कुछ औरत के साथ भी होता है, बल्कि औरत को उस सम्बन्ध रुपी तराज़ू के पलड़ों को समान रखने के लिए पुरुष से ज़्यादा जद्दो जहद करती पड़ती है, वो एक बेटी, एक बहन, एक पत्नी, एक माँ के बाद दादी और नानी तक का फ़र्ज़ अदा करती है, और भावनात्मक संतुलन को बार बार नाप तौल कर परखती भी है, दाम्पत्य जीवन की शुरुआत से ही हर रिश्ते को बैलेंस करने तथा पलड़े बराबर रखने के लिए सभी को बार बार इस तराज़ू की ज़रुरत पड़ती है !


कभी एक पलड़े में अपनी प्राथमिकताएं तो दूसरे पलड़े में ज़रूरतें तौली जाती हैं, तो कभी कर्तव्यों को एक पलड़े में तो मजबूरियों को दूसरे पलड़े में रख कर संतुलन बनाने की जी तोड़ कोशिश की जाती है !


जैसे जैसे ज़िन्दगी आगे बढ़ती है, बच्चों की ज़िम्मेदारियों उनके भविष्य तथा खुद के भविष्य का नाप तौल करने के लिए इंसान को बार बार इस तराज़ू की ज़रुरत पड़ती है, हर ज़िम्मेदारी और रिश्तों के वज़न से उठते गिरते पलड़ों का बैलेंस बनाते बनाते उसे पता ही नहीं चलता कि वो तो अपना सब कुछ बाँट चुका है और बिलकुल ही खाली हो चुका है, उसकी ज़िन्दगी की शाम भी आ चुकी है, वो थक हार कर आखरी बार उस तराज़ू के पलड़ों को गौर से देखता है और पाता है कि वो अभी भी बैलेंस में नहीं हैं, फिर भी कहीं कोई न कोई कमी रह ही जाती है, उस तराज़ू के इन ऊंचे नीचे होते पलड़ों को भीगी आँखों से ताकते हुए वो न जाने कब अपनी आखरी हिचकी लेकर ज़िन्दगी से अलविदा कह देता है, ऊंचे नीचे होते पलड़ों वाली वो अदृश्य तराज़ू छिटक कर टूट जाती है !


मगर ज़रा रुकिए...........मरने के बाद फिर उसे एक और तराज़ू का सामना करना पड़ता है, जहाँ दुनिया में किये गए उसके आमाल (किये गए अच्छे बुरे काम) को बारीकी से नापा तौला जाता है, और उसी नाप तौल के बाद ही नतीजा सुनाया जाता है ! इस तराज़ू के नाप तौल से भी कोई नहीं बच सकता, मगर इस तराज़ू के पलड़े बराबरी का बैलेंस नहीं मांगते......यहाँ सिर्फ नेकी पलड़ा भारी होना ही आपकी जीत है, नेकी का पलड़ा जितना भारी और बदी का पलड़ा जितना हल्का होगा...आपको उतनी ही राहत नसीब होगी, और यही आपकी आखरी बड़ी जीत भी होगी !!

सोमवार, 20 जुलाई 2015

pk को ताली, बजरंगी भाईजान को गाली, क्यों ?

सोशल मीडिया पर इन दिनों कई साईबर फतवे धारी प्रकट हुए हैं जो कि बजरंगी भाईजान फिल्म का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विरोध करते नज़र आ रहे हैं, एक से बढ़कर एक नसीहतें दी जा रही हैं, फोटोशॉप का फूहड़ उपयोग कर सलमान खान और फिल्म का मज़ाक उड़ाया जा रहा है !

मैं सलमान खान का प्रशंसक तो नहीं मगर इस प्रकार के पूर्वाःग्रहों के खिलाफ ज़रूर हूँ, मैंने pk फिल्म के समय भी सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं देखी हैं, मोदी महोदय के साथ सलमान के पतंग उड़ाने के बाद 'जय हो' फिल्म के समय भी प्रतिक्रियाएं देखी हैं, इनमें से कई लोगों द्वारा डर्टी पिक्चर का विश्लेषण भी सोशल मीडिया पर देखा और पढ़ा है और इन दिनों बजरंगी भाईजान पर नाज़िल हो रहे इन साईबर फतवों को भी देख रहा हूँ !

हैरानी इस बात पर होती है कि कभी pk के समय बढ़ चढ़ कर लोगों को pk देखने की नसीहतें देने वाले अधिकांश लोग अब बजरंगी भाईजान के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं, यह क्या तमाशा है ?

इनका विरोध सिर्फ एक फिल्म के लिए है, चाहे आप बाहुबली देख आएं, मगर बजरंगी भाईजान ना देखें ! हास्यास्पद बात तो यह है कि यह इस फिल्म के विरोध के लिए फूहड़ तर्क देकर खुद ही उपहास का केंद्र बने हुए हैं !

फ़िल्में मनोरंजन का साधन है, यह किसी समूह के पूर्वाःग्रहों की संतुष्टि के लिए नहीं बनाई जाती हैं, हाँ यह बात अलग है कि फिल्म को कई बार मार्केटिंग के लिए विवाद का विषय बना कर लोगों का ध्यान आकर्षित करने का फंडा भी आज़माया जाने लगा है !

pk फिल्म पर तालियाँ बजाने वाले और बजरंगी भाईजान को गलियाने वाले अधिकांश लोग वही हैं जो भारत में बैन हुई फिल्म 50 Shades of Grey को यू ट्यूब पर देख कर शेखी बघार चुके हैं, डर्टी पिक्चर पर अपना विश्लेषण दे चुके हैं, और pk की तारीफ कर चुके हैं ! बजरंगी भाईजान का विरोध करने वाले लोग पहले अपने ड्राईंग रूम्स से टी.वी. उठकर फेंकें, केबल नोच डालें फिर आकर फतवेबाज़ी करें !

आज जहाँ एक ओर मंगल ग्रह पर बस्तियां बसाने की तैयारियां चल रही हैं, मस्तिष्क प्रत्यार्पण में सफलता पा ली गयी हो, मानव चाँद पर जाकर लौट आया हो, वहीँ दूसरी ओर इस प्रकार की कूप मंडूक मानसिकता तथा हास्यास्पद पूर्वाःग्रहों से ग्रसित लोग अपने फूहड़ एजेंडों को थोपने की नाकाम कोशिशें करते नज़र आ रहे हैं !

अफ़सोस !!

(बजरंगी भाईजान विरोधी मुझे अन्फ्रेंड कर सकते हैं, मुझे ख़ुशी होगी)

शनिवार, 18 जुलाई 2015

संयुक्त परिवारों से क्यों विमुख हो रहे हैं लोग !!

(कुछ इस प्रथा को अभी भी दांतों से पकडे हैं, और कई ऐसे हैं जिनके लिए यह जंजाल साबित हुआ है, और वो इसमें फंसे फड़फड़ा रहे हैं)

हर प्रकार के सामाजिक समूहों में परिवार सबसे अहम और व्यापक समूह होता है, और परिवार के बिना समाज की कल्पना नहीं की जा सकती, परिवार के भी कई रूप होते हैं, जैसे मोटे तौर पर देखा जाए तो पश्चिम में एकल परिवार (Nuclear Family) और हमारे देश में संयुक्त परिवार (Joint Family), हम सब में से भी अधिकांश इसी संयुक्त परिवार में पले बढे हैं, संयुक्त परिवार प्रथा कभी एक मज़बूत व्यवस्था मानी जाती थी, दो तीन पीढ़ियां एक साथ रहने के कारण सामाजिक मूल्यों का बराबर से प्रसार होता था, बुज़ुर्गों से नयी पीढ़ी संस्कार सीखती थी, आदर और सम्मान बना रहता था, सुरक्षा की भावना बनी रहती थी, सामाजिक कार्यकलापों में अग्रसर रहते थे, सभी सदस्यों में प्रेम भाव और समर्पण का जज़्बा बना रहता था, संयुक्त परिवार में बच्चों के लिए सर्वाधिक सुरक्षित और उचित शारीरिक एवं चारित्रिक विकास का अवसर प्राप्त होता है .बच्चे की इच्छाओं और आवश्यकताओं का अधिक ध्यान रखा जा सकता है .उसे अन्य बच्चों के साथ खेलने का मौका मिलता है .माता पिता के साथ साथ अन्य परिजनों विशेष तौर पर दादा ,दादी का प्यार भी मिलता है यही कारण है कि संयुक्त परिवारों में पले बढे बच्चे अधिक संस्कारी और और आज्ञाकारी होते है !

मगर अचानक से लोगों का संयुक्त परिवार से मोह भंग होने लगा है, और इस को देखते हुए समाजशास्त्री चिंतित भी हैं, इसके मूल में कई कारण हैं जैसे कि रोज़गार धंधे के लिए लोगों का गाँवों और शहरों से पलायन, परिवार के लोगों की बढ़ती महत्वकांक्षाएं, निजता की अधिक चिंता, आर्थिक असमानताएं, परिवार के सदस्यों के बीच त्याग, समर्पण की ख़त्म होती भावना, ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ना, निजी स्वार्थों को परिवार से अधिक महत्त्व देना, संयुक्त परिवार के मुखिया के पक्षपात पूर्ण निर्णयों से भी बड़ी समस्या उत्पन्न होती है, Generation Gap को ढंग से नहीं पाटना, सामूहिक हित की अनदेखी करने से भी पारिवारिक सहयोग समाप्त होता है, अमीर सदस्य या उच्च पद वाले सदस्य के प्रति मुखिया का नर्म रवैय्या, किसी भी पारिवारिक समस्या को सुलझाने में मुखिया के संदेहास्पद निर्णय से परिवार में कलह की स्थिति उत्पन्न होती है, सदस्यों में असंतोष पनपता है, जो कि आगे जाकर विस्फोटक भी हो जाता है, जिस घर में कलह और किट किट आम हो जाए तो उस परिवार में पारिवारिक मूल्यों का क्षरण तो होता ही है, नयी पीढ़ी भी इससे प्रभावित होती है !

बुजुर्ग लोग दुनिया में आ रहे सामाजिक बदलाव को अनदेखा कर युवा पीढ़ी के परंपरा विरोधी व्यव्हार से क्षुब्ध रहते हैं। उसके लिए सिर्फ और सिर्फ अपनी संतान को दोषी मानते हैं। वे उनकी तर्क पूर्ण बातों को बुजुर्गों का अपमान मानते हैं। वे युवा पीढ़ी की बदली जीवन शैली से व्यथित होते हैं। नयी जीवन शैली की आलोचना करते हैं। क्योंकि आज की युवा पीढ़ी अपने बुजुर्गों का सम्मान तो करना चाहती है या करती है परन्तु चापलूसी के विरुद्ध , परन्तु बुजुर्ग उनके बदल रहे व्यव्हार को अपने निरादर के रूप में देखते हैं। बुजुर्गो के अनुसार उनकी संतान को परंपरागत तरीके से अपने माता पिता की सेवा करनी चाहिए, नित्य उनके पैर दबाने चाहियें उनकी तबियत बिगड़ने पर हमारी मिजाजपुर्सी को प्राथमिकता पर रखना चाहिए। उन्हें सब काम धंधे छोड़ कर उनकी सेवा में लग जाना चाहिए और यही उनके जीवन का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। यही संतान का कर्तव्य होता है। उनके अनुसार संतान की व्यक्तिगत जिन्दगी, उसकी अपनी खुशियाँ, उसका अपना रोजगार, उसका अपना परिवार कोई मायेने नहीं रखता। और जब संतान उनकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती तो वे उन्हें अहसान फरामोश ठहराते हैं। 

कभी कभी घर के बुजुर्ग व्यक्ति अपनी संतान के मन में उनके लिए सम्मान को, अपनी मर्जी थोपने के लिए इस्तेमाल करते हैं उन्हें भावनात्मक रूप से ब्लेक मेल करते हैं। इस प्रकार से वे अपनी संतान के भविष्य के साथ तो खिलवाड करते ही हैं, उनके मन में अपने लिए सम्मान भी कम कर देते हैं। और उपेक्षा के शिकार होने लगते हैं। अतः प्रत्येक बुजुर्ग के लिए आवश्यक है की कोई भी निर्णय लेने से पूर्व अपने हित से अधिक संतान के हित के बारे में सोचें ताकि उनके भविष्य को कोई नुकसान न हो या कम से कम हो।

साधारणतयः परिवार में युवा पुरुष या दंपत्ति परिवार की आय का स्रोत होते है, जिसके द्वारा अर्जित धन से वह अपने बीबी बच्चों के साथ घर के बुजुर्गों के भरण पोषण की जिम्मेदारी भी उठाता है। इसलिए उसका नजरिया भी महत्वपूर्ण होता है। वह अपने बुजुर्गों के प्रति क्या विचार रखता है? उन्हें कितना सम्मान देना चाहता है,वह अपने बीबी बच्चों और बुजुर्गों को कितना समय दे पाने में समर्थ है,और क्यों ? वह अपने परिवार के प्रति, समाज के प्रति क्या नजरिया रखता है ? वह नए ज़माने को किस नजरिये से देख रहा है? क्योंकि वर्तमान बुजुर्ग जब युवा थे उस समय और आज की जीवन शैली और सोच में महत्वपूर्ण परिवर्तन आ चुका है।

अक्सर देखा गया है की बुजुर्गों का अपने बच्चों के प्रति नकारात्मक नजरिया उनकी समस्याओं का कारण बनता है। वे अपनी संतान को अपने अहसानों के लिए कर्जदार मानते हैं। उनकी विचारधारा के अनुसार उन्होंने अपनी संतान को बचपन से लेकर युवावस्था तक लालन पालन करने में अनेक प्रकार के कष्टों से गुजरना पड़ा,जिसके लिए उन्हें अपने खर्चे काट कर उनकी सुविधाओं का ध्यान रखा, उनकी आवश्यकताओं के लिए अपनी क्षमता से अधिक प्रयास किये। ताकि भविष्य में ये बच्चे हमारे बुढ़ापे का सहारा बने। जब आज वे स्वयं कमाई करने लगे हैं तो उन्हें सिर्फ हमारे लिए सोचना चाहिए, हमारी सेवा करनी चाहिए। कभी कभी तो बुजुर्ग लोग संतान को ज़र खरीद गुलाम के रूप में देखते हैं।

यह भी एक हकीकत है कि संयुक्त परिवारों के टूटने के गंभीर परिणाम सबसे ज़्यादा बुज़ुर्गों को ही भुगतने पड़ते हैं ! इसलिए अगर पारिवारिक मूल्यों को सहेज कर रखना है, और संयुक्त परिवार प्रथा को बनाये रखना है तो हाथ दोनों ओर से ही बढ़ाने होंगे, बुज़ुर्गों और परिवार के सदस्यों को नि:स्वार्थ सहयोग, सम्मान और बलिदान के लिए आगे आना होगा, अन्यथा आने वाले दशकों में यह दुर्लभ प्रथा देखने या दिखाने को हमें गांवों और ढाणियों में जाना पड़ेगा !!

रविवार, 7 जून 2015

वास्तविक दुनिया से कटने का जरिया बना स्मार्ट फोन !!

स्मार्ट फोन हमारी ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा होने के साथ साथ हमारी कमज़ोरी भी बनते जा रहे हैं, और साथ ही हमें वास्तविक दुनिया से काटने का जरिया भी बनते नज़र आ रहे हैं, हम सड़कों पर, बस स्टैंड्स, रेलवे स्टेशंस पर, शादियों में, पार्टियों में....लोगों को आस पास के लोगों से बेखबर अपनी आभासी दुनिया में खोया हुआ देख सकते हैं !

पहले हम पारिवारिक आयोजनो में जाने अनजाने लोगों से मिलने जुलने में जितना समय बिताते थे, अब उस समय में कहीं कटौती नज़र आने लगी है ! हर आदमी अब स्मार्ट फोन को अधिक समय देता नज़र आने लगा है ! हर आदमी कहीं न कहीं अकेला अपने स्मार्ट फोन को सहलाता नज़र आता है !

इसके साथ ही हर वक्त अपडेट-अपडेट देखना, नया अपलोड करना है, किसने क्या, कमैंट किया है, ये ऐसी चीजें हो गई हैं जो हर समय दिमाग में घूमती रहती हैं, यह सब साइबर सिकनेस, फेसबुक डिप्रैशन और इंटरनैट एडिक्शन डिसऑर्डर जैसी मनोवैज्ञानिक बीमारियां ही हैं, जिन्हें इसके आदी लोग मानने को तैयार नहीं होते !

इस साइबर सिकनेस का बड़ा कारण इंटरनेट और सोशल मीडिया है, जिसे वैज्ञानिकों ने डिजिटल शराब का भी खिताब दिया है, युवा पीढ़ी इस लत के खुमार का सबसे ज़्यादा शिकार नज़र आ रही है ! यह भी सच है कि सूचना क्रांति के इस दौर में हम सब इससे अछूते नहीं रह सकते, मगर इस लत पर कंट्रोल करना हमारे ही हाथ में है, कोशिश करना चाहिए कि इस लत की गुलामी से आज़ाद होने के तरीकों को वक़्त वक़्त पर आज़माया जाए, और बच्चों को भी इसके दुष्प्रभावों से बचाने की कोशिश की जाए !

जानिये रोहिंग्या मुसलमानो और उनके क़त्ले आम की वजहों के बारे में !!

रोहिंग्या म‍ुस्लिम प्रमुख रूप से म्यांमार (बर्मा) के अराकान (जिसे राखिन के नाम से भी जाना जाता है) प्रांत में बसने वाले अल्पसंख्यक मुस्लिम लोग हैं ! अराकान म्यांमार की पश्चिमी सीमा पर है और यह आज के बांग्लादेश (जो कि पूर्व में बंगाल का एक हिस्सा था) की सीमा के पास है !

म्यांमार में करीब 8 लाख रोहिंग्या मुस्लिम रहते हैं जो कि बर्मा की आबादी का 5 प्रतिशत ही है, और वे इस देश में सदियों से रहते आए हैं, लेकिन बर्मा के लोग और वहां की सरकार इन लोगों को अपना नागरिक नहीं मानती है ! बिना किसी देश के इन रोहिंग्या लोगों को म्यांमार में भीषण दमन का सामना करना पड़ता है ! बड़ी संख्या में रोहिंग्या लोग बांग्लादेश और थाईलैंड की सीमा पर स्थित शरणार्थी शिविरों में अमानवीय स्थितियों में रहने को विवश हैं !

1400 के आसपास ये लोग ऐसे पहले मुस्लिम्स हैं जो कि बर्मा के अराकान प्रांत में आकर बस गए थे !इनमें से बहुत से लोग 1430 में अराकान पर शासन करने वाले बौद्ध राजा नारामीखला (बर्मीज में मिन सा मुन) के राज दरबार में नौकर थे !

वर्ष 1785 में बर्मा के बौद्ध लोगों ने देश के दक्षिणी हिस्से अराकान पर कब्जा कर लिया, तब उन्होंने रोहिंग्या मुस्लिमों को या तो इलाके से बाहर खदेड़ दिया या फिर उनकी हत्या कर दी ! इस अवधि में अराकान के करीब 35 हजार लोग बंगाल भाग गए जो कि तब अंग्रेजों के अधिकार क्षेत्र में था। वर्ष 1824 से लेकर 1826 तक चले एंग्लो-बर्मीज युद्ध के बाद 1826 में अराकान अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया !

तब अंग्रेजों ने बंगाल के स्थानीय बंगालियों को प्रोत्साहित किया कि वे अराकान ने जनसंख्या रहित क्षेत्र में जाकर बस जाएं ! रोहिंग्या मूल के मुस्लिमों और बंगालियों को प्रोत्साहित किया गया कि वे अराकान (राखिन) में बसें ! ब्रिटिश भारत से बड़ी संख्या में इन प्रवासियों को लेकर स्थानीय बौद्ध राखिन लोगों में विद्वेष की भावना पनपी और तभी से जातीय तनाव पनपा जो कि अभी तक चल रहा है !

दूसरे द्वितीव विश्व युद्ध के दौरान दक्षिण पूर्व एशिया में जापान के बढ़ते दबदबे से आतंकित अंग्रेजों ने अराकान छोड़ दिया और उनके हटते ही मुस्लिमों और बौद्ध लोगों में एक दूसरे का कत्ले आम करने की प्रतियोगिता शुरू हो गई। इस दौर में बहुत से रोहिंग्या मुस्लिमों को उम्मीद थी कि वे ‍अंग्रेजों से सुरक्षा और संरक्षण पा सकते हैं। इस कारण से इन लोगों ने एलाइड ताकतों के लिए जापानी सैनिकों की जासूसी की। जब जापानियों को यह बात पता लगी तो उन्होंने रोहिंग्या मुस्लिमों के खिलाफ यातनाएं देने, हत्याएं और बलात्कार करने का कार्यक्रम शुरू किया। इससे डर कर अराकान से लाखों रोहिंग्या मुस्लिम फिर एक बार बंगाल भाग गए।

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्त‍ि और 1962 में जनरल नेविन के नेतृत्व में तख्तापलट की कार्रवाई के दौर में रोहिंग्या मुस्लिमों ने अराकान में एक अलग रोहिंग्या देश बनाने की मांग रखी, लेकिन तत्कालीन बर्मी सेना के शासन ने यांगून (पूर्व का रंगून) पर कब्जा करते ही अलगाववादी और गैर राजनीतिक दोनों ही प्रकार के रोहिंग्या लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की। सैनिक शासन ने रोहिंग्या लोगों को नागरिकता देने से इनकार कर दिया और इन्हें बिना देश वाला (स्टेट लैस) बंगाली घोषित कर दिया।

तब से स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। संयुक्त राष्ट्र की कई रिपोर्टों में कहा गया है कि रोहिंग्या दुनिया के ऐसे अल्पसंख्यक लोग हैं, जिनका लगातार सबसे अधिक दमन किया गया है। बर्मा के सैनिक शासकों ने 1982 के नागरिकता कानून के आधार पर उनसे नागरिकों के सारे अधिकार छीन लिए हैं। ये लोग सुन्नी इस्लाम को मानते हैं और बर्मा में इन पर सरकारी प्रतिबंधों के कारण ये पढ़-लिख भी नहीं पाते हैं तथा केवल बुनियादी इस्लामी तालीम हासिल कर पाते हैं।

बर्मा के शासकों और सै‍‍न्य सत्ता ने इनका कई बार नरसंहार किया, इनकी बस्तियों को जलाया गया, इनकी जमीन को हड़प लिया गया, मस्जिदों को बर्बाद कर दिया गया और इन्हें देश से बाहर खदेड़ दिया गया। ऐसी स्थिति में ये बांग्लादेश की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं, थाईलैंड की सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसते हैं या फिर सीमा पर ही शिविर लगाकर बने रहते हैं। 1991-92 में दमन के दौर में करीब ढाई लाख रोहिंग्या बांग्लादेश भाग गए थे। इससे पहले इनको सेना ने बंधुआ मजदूर बनाकर रखा, लोगों की हत्याएं भी की गईं, यातनाएं दी गईं और बड़ी संख्या में महिलाओं से बलात्कार किए गए।

संयुक्त राष्ट्र, एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाएं रोहिंया लोगों की नारकीय स्थितियों के लिए म्यांमार की सरकारों को दोषी ठहराती रही हैं, लेकिन सरकारों पर कोई असर नहीं पड़ता है। पिछले बीस वर्षों के दौरान किसी भी रोहिंग्या स्कूल या मस्जिद की मरम्मत करने का आदेश नहीं दिया गया है। नए स्कूल, मकान, दुकानें और मस्जिदों को बनाने की इन्हें इजाजत ही नहीं दी जाती है।

इनके मामले में म्यांमार की सेना ही क्या वरन देश में लोकतंत्र की स्थापना का श्रेय लेने वाली आंग सान सूकी का भी मानना है कि रोहिंग्या मुस्लिम म्यांमार के नागरिक ही नहीं हैं। वे भी देश की राष्ट्रपति बनना चाहती हैं, लेकिन उन्हें भी रोहिंग्या लोगों के वोटों की दरकार नहीं है, इसलिए वे इन लोगों के भविष्य को लेकर तनिक भी चिंता नहीं पालती हैं। उन्हें भी राष्ट्रपति की कुर्सी की खातिर केवल सैनिक शासकों के साथ बेतहर तालमेल बैठाने की चिंता रहती है।

उन्होंने कई बार रोहिंग्या लोगों की हालत पर चिंता जाहिर की, लेकिन कभी भी सैनिक शासकों की आलोचना करने का साहस नहीं जुटा सकीं। इसी तरह उन्होंने रोहिंग्या लोगों के लिए केवल दो बच्चे पैदा करने के नियम को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया, लेकिन उन्होंने इसका संसद में विरोध करने की जरूरत नहीं समझी।

रोहिंग्या लोगों के खिलाफ बौद्ध लोगों की हिंसा तो समझ में आती है, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस हिंसा में अब बौद्ध भिक्षु भी भाग लेने लगे हैं। इस स्थिति को देखने के बाद भी आंग सान सूकी म्यांमार के लोकतंत्र के लिए संघर्ष में भारत की चुप्पी की कटु आलोचना करती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों की यह वैश्विक नायिका रोहिंग्या मुस्लिमों के बारे में कभी एक बात भी नहीं बोतली हैं। और अगर बोलती हैं तो केवल यह कि रोहिंग्या म्यांमार के नागरिक नहीं हैं और कोई भी उन्हें देश का नागरिक बनाने की इच्छी भी नहीं रखता है।

यह सचाई है कि बर्मा में बहुसंख्यक बौद्ध आबादी के बीच पिछले एक-दो सालों से ऐसा कट्टरपंथी प्रचार अभियान चलाया जा रहा है, जिसका शिकार वहां के सभी अल्पसंख्यकों को होना पड़ रहा है। बर्मा के फौजी शासकों ने आंग सान सू की के नेतृत्व वाले लोकतांत्रिक आंदोलन का असर कम करने के लिए दो फॉर्मूलों पर अमल किया है। एक तो चीन के साथ नजदीकी बनाकर भारत के लोकतंत्र समर्थक रुझान को कुंद कर दिया और दूसरा, बहुसंख्यक कट्टरपंथ की पीठ पर अपना हाथ रखकर खुद को धर्म-संस्कृति और राष्ट्रीय अखंडता के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में पेश किया।

ऐसे माहौल में दखल देना भारत के लिए आसान तो नहीं है, लेकिन इसके लिए वह दुनिया भर के लोकतांत्रिक और जन अधिकार संगठनों को अपना खुला समर्थन जरूर दे सकता है। म्यांमार के सत्तारूढ़ सैनिक शासकों को हर स्तर पर यह संदेश दिया जाना चाहिए कि उसकी चालबाजियां दुनिया की नजर से छुपी नहीं हैं, और उसके इशारे पर चलने वाले धार्मिक गिरोह सालों साल अपने ही देश के एक जन-समुदाय के खिलाफ इस तरह का बर्ताव नहीं कर सकते !!

(विभिन्नं स्त्रोतों से मिली जानकारी से साभार)

आज याद आ गयीं वो अकेली योद्धा सुनीता नारायण ~~!!

कितनी हैरानी की बात है कि आज मैगी नूडल पर लेड की मात्र अधिक होने के कारण हंगामा मचा हुआ है, और उधर पेप्सिको की सी.ई.ओ. इंदिरा नुई को पद्मभूषण पुरस्कार दिया गया है, यह वही पेप्सी है जिसके लिए कभी सुनीता नारायण ने (जो कि भारत की प्रसिद्ध पर्यावरणविद है और जिन्हे कि 2005 को पद्धश्री से भी अलंकृत किया गया था) एक अरसा पहले पेप्सी और कोक जैसे साफ्ट ड्रिंक में खतरनाक रसायनों की उपस्थिति की बात कहकर पूरे देश में तूफान पैदा कर दिया था !

उस मुद्दे की तपिश से संसद भी गरमा गई थी ! सुनीता नारायणन ने साबित किया था कि शीतल पेयों में कीटनाशकों की भारी मात्रा मौजूद है और ये मात्रा पहले की तुलना में अधिक है ! उन्होंने शीतल पेयों के 11 ब्रांडों के 57 नमूनों को चेक किया था, और उनमें से सभी में तीन से छह कीटनाशक मिले थे !

यह मामला इतना गरमा गया था कि सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा था......सुनीता नारायण यह चाहती थीं कि इसके लिए कोई मानक बने.....मगर यह मामला इन बहु राष्ट्रिय कंपनियों के भारी दबाव और सराकर के उदासीन रवैये के चलते ठन्डे बस्ते में चला गया !

शुक्रवार, 5 जून 2015

मुस्लिम औरतों की बदहाल शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति के लिए ज़िम्मेदार है 'बशर्ते' !!

किसी आलिम का क़ौल है कि :-
तुमने अगर एक बच्चे को पढाया तो मात्र एक व्यक्ति को पढ़ाया ! लेकिन अगर एक बच्ची को पढाया तो एक खानदान को और एक नस्ल को पढ़ाया !

“When you educate a man, you educate an individual and when you educate a woman, you educate an entire family.” 

कार्ल मार्क्स ने कहा था :- 

अगर किसी समाज की हालत और प्रगति के बारे में जानना हो तो यह देखें की उस समाज में औरतें किस स्थिति में हैं !

जो जंग तलवार, बन्दुक, तोप और रोकेट नहीं जीत सकते वो जंग आप तालीम से जीत सकते हैं !

इंडोनेशिया के बाद भारत ही वो देश है जहा मुसलमानो की दूसरी सबसे बड़ी आबादी रहती है :-

मोटे तौर पर भारत में 18 करोड़ मुसलमान हैं, जो कि  देश की आबादी का 14.88% हैं ! और इस 18 करोड़ की 'आधी आबादी' यानी मुस्लिम औरतें शिक्षा, आर्थिक स्तर से लेकर सामाजिक और पारिवारिक तथा स्वावलम्बन के मामले में बदतर हालत में हैं ! 


ताज्ज़ुब है वो कौम इल्म से दूर है जिस क़ौम के कलाम की शुरुआत ही "इक़रा " (पढ़ो) से होती है, जिस मज़हब मैं कहा गया हो कि इल्म हासिल करने के लिए चीन भी जाना पड़े तो जाओ !

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत की लगभग 60 फीसदी मुस्लिम महिलाएं शिक्षा से वंचित हैं, इनमें से 10 फीसदी महिलाएं ही उच्च शिक्षा ग्रहण कर पाती हैं जबकि शेष 30 फीसदी महिलाएं दसवीं कक्षा तक अथवा उससे भी कम तक की शिक्षा पाकर घर की बहु बनने के लिए मजबूर हो जाती हैं !

सच्चर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़ देश भर में मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर 53.7 फ़ीसदी है, इनमें से अधिकांश महिलाएं केवल अक्षर ज्ञान तक ही सीमित हैं ! सात से 16 वर्ष आयु वर्ग की स्कूल जाने वाली लड़कियों की दर केवल 3.11 फ़ीसदी है, शहरी इलाक़ों में 4.3 फ़ीसदी और ग्रामीण इलाक़ों में 2.26 फ़ीसदी लड़कियां ही स्कूल जाती हैं !

शिक्षा की तरह आत्मनिर्भरता के मामले में भी मुस्लिम महिलाओं की हालत चिंताजनक है, सच्चर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़ हिंदू महिलाओं (46.1 फ़ीसदी) के मुक़ाबले केवल 25.2 फ़ीसदी मुस्लिम महिलाएं ही रोज़गार के क्षेत्र में हैं, अधिकांश मुस्लिम महिलाओं को पैसों के लिए अपने परिवारीजनों पर ही निर्भर रहना पड़ता है, जिसके चलते वे अपनी मर्ज़ी से अपने ऊपर एक भी पैसा ख़र्च नहीं कर पातीं !

यह सभी आंकड़े बहुत न सिर्फ चौंकाने वाले हैं, बलि बहुत ही डरावने हैं, और मुस्लिम समाज के लिए एक चेतावनी भी हैं !

यह एक कड़वी सच्चाई है कि मुस्लिम महिलाओं की बदहाली के लिए कठमुल्लों द्वारा तोड़े मरोड़े गए कई धार्मिक कारण काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं, मुल्ला मौलवियों द्वारा इसकी मन मर्ज़ी से व्याख्या करने से भी है, जिसमें पर्दा भी है, मगर पर्दा इल्म हासिल करने में रुकावट बिलकुल भी नहीं है, रुकावट कुछ रूढ़िवादी समाजी सोच भी है, लोग कहते हैं कि लड़कियों को क्यों पढ़ाएं ? ससुराल में जाकर चूल्हा-चौका ही तो संभालना है. और यह कि लड़की अगर ज़्यादा पढ़ लिख जाएगी तो शादी के लिए रिश्ते नहीं आएंगे, इस सोच के चलते कई बार लड़कियां खुद तालीम हासिल करने से पीछे हट जाती हैं ! 

मुस्लिमो ने तालीम पर सारा गोरो फ़िक्र और अमल सिर्फ और सिर्फ दीनी तालीम तक ही समेट कर रख दिया हैं ! अब वक़्त की जरूरत हैं के दीनी तालीम की रौशनी में दुनियावी तालीम हासिल की जाये जिससे हम दुनिया के मुकाबिल भी एक नजीर बने और हमारी आखिरत भी कामयाब हो ! 

शरीयत औरत को इस काबिल देखना चाहती है कि वह अपने और अपने जैसे दूसरे इंसानों की खिदमत अपनी कमाई से कर सके, हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.)  के दौर में मुस्लिम औरतें मस्जिदों में जाकर नमाज़ पढ़ती थीं ! ‘‘हज़रत खदीजा इसकी मिसाल है कि उन्होंने समाज मे आर्थिक क्रियाकलापों को बढ़ाया ! सियासत में भी मुस्लिम महिलाओं ने सराहनीय काम किए !

रज़िया सुल्तान हिंदुस्तान की पहली मुस्लिम महिला शासक बनीं, नूरजहां भी अपने वक़्त की ख्यातिप्राप्त मुस्लिम राजनीतिज्ञ रहीं, जो शासन का अधिकांश कामकाज देखती थीं, अवध के नवाब वाजिद अली शाह की पत्नी बेगम हज़रत महल ने हिंदू-मुस्लिम एकता को मज़बूत करने के लिए उत्कृष्ट कार्य किए थे !


फिर आज क्यों उसी मुस्लिम समाज में औरत की यह बदतर हालत है ? 
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इसकी सबसे बड़ी वजह है मुस्लिम समाज में लड़कियों की शिक्षा के प्रति बेरुखी, मज़हब की गलत व्याख्या और मज़हबी ठेकेदारों द्वारा दिए गए फतवे,पर्दे पर ज़्यादा ज़ोर, तथा लोग क्या कहेंगे जैसी सोच ! 

जब इस बाबत लोगों से बातचीत की गयी और उनके सामूहिक विचार जाने तो दो एक बातें निकल कर सामने आईं, पहली तो यह कि मुस्लिम औरतों को तालीम दिलाने से किसी को कोई ऐतराज़ नहीं, कुछ चाहते हैं कि वो बस इतना पढ़ ले कि काम चल जाए, कुछ यह चाहते हैं, कि खूब पढ़े, आगे जाकर नौकरियां करें, मर्दों के कंधे से कन्धा मिलकर चलें, आर्थिक तौर पर मज़बूत हो, स्वावलम्बी बने,  ! 

यहाँ एक ख़ास बात यह नज़र आयी कि कुछ कट्टर मुसलमान But, मगर, लेकिन, किन्तु परन्तु करते भी नज़र आये, और यही कहते पाये गए कि औरतों को तालीम ज़रूर दिलाना चाहिए बशर्ते कि ..'यह'  और बशर्ते कि ..... 'वो'  !! 

यह जो यहाँ 'बशर्ते'  है, यह बहुत बड़े मायने समेटे हुए है,....और यह सिर्फ भारत में ही नहीं है, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में भी पाया जाता है, जो कि खुद में मुस्लिम देश है, पाकिस्तान में औरतों की शैक्षिक/आर्थिक स्थिति और भी बदहाल है, वहां महिला शहरी क्षेत्र में साक्षरता का प्रतिशत 30% है, जबकि गावों में 5% है ! मुस्लिम देश अफगानिस्तान में औरतों की साक्षरता का प्रतिशत और भी डरावना 32 फ़ीसदी है  ! 

यह 'बशर्ते' की विचारधारा अफगानिस्तान वाया पाकिस्तान अपने मुल्क में भी काम करती चली आ रही है, और शायद करती भी रहे, अगर हम नहीं चेते तो ! 

यह #बशर्ते ही कहीं न कहीं मुस्लिम औरतों की शैक्षणिक/आर्थिक स्थिति और सामाजिक बदहाली के लिए ज़िम्मेदार है, यह खुद में ही एक क़ानून है, यह खुद में एक अप्रत्यक्ष फतवा है, एक भूल भुलईयाँ, एक जाल है, जिसे मज़हबी ठेकेदारों ने इस तरह से सामने रखा है कि आप सहम जाते हैं, भ्रमित हो जाते हैं !

ज़रुरत है इस ‘बशर्ते’ की बारीकियां समझने की, ‘बशर्ते’ के पीछे छुपे स्वार्थ और मक्कारियों को समझने की, और मक़सद को बूझने की ! जितनी जल्दी इस ‘बशर्ते’ को डिकोड करेंगे, उतना ही आपका फायदा है !  वक़्त आ गया है कि मज़हबी हुदूद में रहते हुए इस 'बशर्ते' को डिकोड कर बेटियां - बहने आगे बढे....खूब पढ़ें, आला तालीम लें, स्वावलम्बी बने,  खुद के पैरों पर खड़ी हों, अपना मुस्तक़बिल बनायें, समाज में मुल्क में अपनी बा-वक़ार, बा-इज़्ज़त मौजूदगी दर्ज कराएं, और फिर बेहतर और बेहतर समाज और क़ौम  का निर्माण करें, और साथ ही इस पढ़ने की आज़ादी का गलत इस्तेमाल ना करें, तहज़ीब, शर्मो हया और अदब के साथ इल्म हासिल करें, कोई काम ऐसा ना करें कि म'आशरे में वालदैन का सर नीचे हो !  

औरत किसी समाज भी की बुनियाद होती है और जब किसी ईमारत की बुनियाद ही कमजोर होगी  तो बुलंद ईमारत की सोच भी बेमानी होगी !

मैं अपनी बात शायर जनाब असरारुल हक़ मजाज़ के इस शेर के साथ ख़त्म करता हूँ :-

तेरे  माथे पे ये  आँचल  बहुत  ही खूब है,  लेकिन  !
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तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था !!