सोमवार, 8 दिसंबर 2014

ये कौन लोग हैं ? अमर प्रेम के स्मारक ताजमहल के दुश्मन ??

कल एक मित्र के स्टेटस पर एक साहब ने दो एक लिंक पोस्ट कर दावा किया कि यह ताजमहल नहीं ...एक शिव मंदिर है या तेजोमहालय है, और इसके लिए उन्होंने किसी पुरुषोत्तम नागेश ओक द्वारा पेश की गयीं दलीलें भी दीं थी. मगर इन सबकी गहराई में न जाकर सोचा जाए तो कई बातें समझ आती हैं...पहली तो यह कि जो लोग इस विश्व धरोहर और अमर प्रेम के स्मारक ताजमहल के बारे में यह सब सुनियोजित षड्यंत्र कर रहे हैं, उसके मूल में केवल हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य को बढ़ाना मात्र ही है, वो हर स्मारक को हिन्दू मुस्लिम स्मारक के तौर पर देखना चाहते हैं, और दिखाने की चेष्ठा कर रहे हैं ! कुछ देर के लिए यदि मान लिया जाए कि यह शिव मंदिर या तेजोमहालय है..तो क्या करना है इसका..तोड़िएगा इसको ? या पूजा पाठ करना है इसमें ? क्यों हज़ारों सालों तक इस शिव मंदिर या तेजोमहालय की सच्चाई छिपा कर रखी गयी ? या फिर अचानक से पिछले कुछ वर्षों से यह ख़ुफ़िया अभियान चला कर इतिहास से कुश्ती कबड्डी खेलने का तमाशा क्यों ? ताजमहल के लिए लिखी गयी कई हिन्दू-मुस्लिम और अँगरेज़ इतिहासकारों और विद्वानो द्वारा सैंकड़ों किताबें ..इन दो चार पूर्वाह्गृह से ग्रसित इतिहासकारों के सामने झूठी कैसे हो गयीं ?

बाबरी मस्जिद और राम मंदिर विवाद किसे याद नहीं है ? हुआ क्या ? इतिहास से कुश्ती लड़ी गयी, सुनियोजित रूप से विध्वंस किया गया ? उसके बाद दंगों में सैंकड़ों लोग मारे गए ? उसके बाद ? अब यदि यही लोग यह जताते हैं कि  यह ताजमहल नहीं ...एक शिव मंदिर है या तेजोमहालय है, तो इनका पूर्वाहग्रह और इनकी नियत समझ आती है ! कल को कोई और इतिहासकार यह दलील देगा कि मुम्बई में विक्टोरिया टर्मिनल को भी किसी पुराने मंदिर को तोड़कर बनाया गया है ? या फिर दिल्ली और आगरा के किले भी किसी मंदिर को तोड़ कर बनाये गए हैं ? किस किस को आप झूठी दलीलें देकर तोड़ेंगे साहब ? और किस किस को आप नए नए नामो से नवाजोगे ? मुग़ल गार्डन को ? ढाई दिन की झोंपड़ी को ? क़ुतुब मीनार को ? हुमायूँ के मक़बरे को ? कश्मीर के शालीमार गार्डन को ? बुलंद दरवाज़े को ?

जिस सदी में हम जी रहे हैं...कई देश चाँद और ग्रहों पर चहल क़दमी कर भी आये हैं, मगर हम हैं कि मंदिर-मस्जिद के झगड़ों से बाहर निकलना ही नहीं चाहते...या कुछ लोग और संगठन ऐसे हैं जो यह नहीं चाहते कि लोग मंदिर-मस्जिद से आगे की सोचें...ऐसे लोग देश को पीछे ही धकेलना चाहते हैं...आगे ले जाना नहीं ! अमेरिका की एक ताजा सरकारी रिपोर्ट में विश्व के सबसे शक्तिशाली देशों की सूची में अमेरिका और चीन के बाद भारत को स्थान दिया गया है, देश के युवा और वैज्ञानिक वैश्विक स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं, सूचना क्रांति के दौर में हम विश्व से क़दम से क़दम मिला कर चल रहे हैं...देश का युवा अपने प्रयत्नो से भारत को उन्नति और प्रगति के पथ पर ले जाने को कटिबद्ध है ...ऐसे में साहब आप चाहते हैं कि लोग आपकी इन वाहियात दलीलों पर गाल बजाएं, तालियां बजाएं, समर्थन में मुंडी हिलाएं ? अफ़सोस कि ऐसा अब बिलकुल सम्भव नहीं है...एक विध्वंस से देश ने बहुत कुछ सीखा है .अब और नफरत नहीं...और विध्वंस नहीं, अब इतिहास से कुश्ती कबड्डी नहीं ! देश के करोड़ों युवा अपने कौशल से न सिर्फ एक खूबसूरत वर्त्तमान लिख रहे हैं....बल्कि देश को एक उन्नत और प्रगतिशील स्वर्णिम भविष्य की और ले जाने को कृत संकल्प है...उसे मंदिर-मस्जिद के झगड़ों से अब कोई दिलचस्पी नहीं...न ही अब वो इन से सहमत है...और ना ही उसकी इसमें रूचि है ! आप अपने पूर्वाहग्रह और इतिहास की पोटली सर पर लिए आवाज़ लगाते घूमते रहिये !

जय हिन्द !!

By : Śỹëd Äsîf Älì

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

'वैचारिक आतंकवाद' है मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन ~~!!

कीनिया में हुए आतंकी हमले में 6 भारतीयों सहित 68 लोगों की हत्या से न सिर्फ पूरा विश्व सहम गया है बल्कि हिंदुस्तान में भी दुःख की लहर है, सभी देश वासी आहत हैं, .... मारे गए सभी लोग निर्दोष थे यह बताने की ज़रुरत नहीं...मारने वाले अपने आपको एक संगठन अल-शबाब का बता रहे थे...यह वो ब्रेन वाश लोगों का झुण्ड है...जिसे इनके आकाओं ने अपने हित साधन के लिए और एक औज़ार की तरह इस्तेमाल करने के लिए ... मज़हब को तोड़ मरोड़ कर ...उनमें भावनाएं भड़का कर मैदान में छोड़ दिया है... सबसे बड़ी बात तो यह कि आतंकवाद का कोई मज़हब नहीं होता...बल्कि यह एक तरह का वैचारिक आतंकवाद होता है...दुनिया में हर जगह अलग अलग तरह का आतंकवाद होता है...नार्वे में आंद्रे ब्रेविक ने जो किया वो भी आतंकवाद ही था..उसे कट्टर बना दिया गया था..आयरलेंड में भी किसी समय जमकर आतंकवाद का नंगा नाच हुआ था...जिससे ब्रिटेन ने भी पनाह मांग ली थी, अफ्रीका में अल कायदा से इंस्पायर्ड छोटे छोटे ग्रुप हैं....संगठन अल-शबाब भी इनमें से एक है !

सोमालियाई समुद्री लुटेरों को कौन नहीं जानता, यह सभी निर्धन देशों से हैं और पैसे के लिए और अमरीकी हथकंडों के खिलाफ काफी समय से हिंसा का तांडव मचाये हैं...न सिर्फ कीनिया बल्कि नाइजीरिया में भी यह ग्रुप बहुत सक्रीय हैं...सोमालिया भी इनसे अछूता नहीं है, पाकिस्तान, अफगानिस्तान का तो कहना ही क्या...मोसाद और इजराईल के आतंकी करतूतों पर शायद भारतीय मीडिया कभी लिखेगा/बोलेगा भी नहीं....क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय मीडिया (Sponsored by USA-Britain) का पिछलग्गू जो है...और अपने ही देश में होने दंगों के नाम पर नरसंहार को भी भले ही आप आतंकवाद का नाम ना दें, पर यह भी मानवता के नाम पर कलंक की तरह ही है...और वैचरिक आतकवाद का एक नमूना ही है...और इससे भी वर्ष भर में उतनी ही जाने जाती हैं...जितनी कि आतंकवादी घटनाओं में.... और इसमें शामिल हिन्दू और मुस्लिम दोनों होते हैं.....और मरने वालों में भी दोनों ही होते हैं....मगर देखा जाए तो मरता हिंदुस्तानी है....धर्म के नाम पर ब्रेन वाश किये गए लोगों को यह पता नहीं होता कि वो धर्म के खिलाफ काम करने जा रहे हैं....इसी लिए शैलेश जैदी साहब ने भी खूब ही कहा है... >

खादियों में छुपाकर विषैले बदन।
दंश अपना चुभोने ये विषधर चले।।

मय के प्यालों में था आदमी का लहू।
बज्म में वैसे कहने को सागर चले।।

निकले 'हर-हर-महादेव ' घर फूकने ।
जान लेनें को 'अल्ला-हो-अकबर' चले।।

धर्म क्या है किसी को पता तक न था।
धर्म के नाम पर फिर भी खंजर चले।।

(शैलेश जैदी)

Śỹëd Äsîf Älì
September 24, 2013

इस्लामोफोबिया क्यों ..और कैसे ??

9/11 हमलों के बाद अमेरिकी शह पर #मुस्लिम_विरोध की एक नयी लहर को विस्तार दिया गया है, और इस लहर को नाम दिया गया है 'इस्लामोफोबिया', यानी इस्लाम के खिलाफ घृणा या इस्लाम से असम्यक् भय ! इस्लामोफोबिया शब्द की खोज ब्रिटेन में एक दशक पूर्व 1996 में स्वघोषित कमीशन ऑन ब्रिटिश मुस्लिम एंड इस्लामोफोबिया ने की थी. और अब इसका उपयोग मुसलमानों के विरुद्ध पूर्वाग्रह के रुप में किया जाने लगा है ! जाहिर है एक सोची-समझी रणनीति के तहत ऐसा किया जा रहा है! न सिर्फ अमेरिका बल्कि यूरोप के कई मुल्क इस इस नकारात्मक भेदभाव वाले लफ्ज़ इस्लामोफोबिया के बहाने मुसलमानो के धार्मिक अधिकारों पर पाबन्दी लगाने में जुट गए, जैसे कि फ़्रांस और बेल्जियम में बुर्क़े पर पाबंदी लगा देना, इसके पीछे कई वाहियात दलीलें दी गयीं हैं, उनका मानना है कि बुर्का बंधनमुक्त समाज की नीति के प्रतिकूल है !

इसके अलावा #पोलैंड #जर्मनी #स्विट्जरलैंड #ऑस्ट्रिया और #ब्रिटेन में भी इस्लामोफोबिया (इस्लाम के खिलाफ घृणा) तेज़ी से फैल रहा है यहाँ के लोग अपने देश में मुसलमानो को शक की नज़र से देखने लगे हैं, वास्तविकता यह है कि इस पूर्वाःग्रह के पीछे #यहूदी लाबी जमकर सक्रिय है, और #करोड़ों_डालर इस इस्लामोफोबिया मुहीम पर खर्च किये जा रहे हैं ! इस्लाम के खिलाफ पैदा किये जाने वाले इस घृणित हव्वे को अब कई देश अपने अपने हिसाब से केश कराने में लगे हैं...यदि #इंटरनेट को खंगाला जाए तो कई आश्चर्यजनक और काफी हद तक वितृष्णा पैदा करने वाले तथ्य सामने आते हैं। दक्षिणपंथी और मुस्लिम विरोधी संगठन...इस हव्वे का अपनी अपनी योजनाओं के हिसाब से भुना रहे हैं, नार्वे में आंद्रे ब्रेविक द्वारा किया गया नर संहार जिसमें तक़रीबन 77 लोगों को उस अकेले ने मौत की घाट उतार दिया था...वजह थी ..सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर मुस्लिम विरोधी साइटों से उसका जुड़ा रहना !

ऐसे हालात में मुख्यधारा के #मुसलमानों को #क्या_करना चाहिए ?
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अब वक़्त आ गया है कि #दुनिया_के_मुसलमान इस धृणित लहर इस्लामोफोबिया के खिलाफ एकजुट हो जाएँ, और इसको बे-असर करने - झूठा साबित करने के लिए आगे आयें, और गैर इस्लामी भाइयों को इस्लाम की खूबियों से वाक़िफ़ कराएं, नफरत के इस ज़हर को नफरत और जोश से कम नहीं किया जा सकता, मुसलमानों को अपना आत्मनिरीक्षण करने की भी ज़रुरत है, कोशिश होनी चाहिए कि हम फौरी तौर (तत्काल) पर अपने ही समाज में हिंसक और उग्रवादी तत्वों से लड़ने और उन्हें बेनकाब करने की कोशिश करें। ये खासतौर से नज़रियाती (वैचारिक) तौर पर करना होगा, आखिरकार ये एक नज़रियाती जंग है इन लोगों को अपने धर्म को उग्रवादी मुसलमानों और जाहिल उलमा के हाथों से बचाने की कोशिश करनी चाहिए। मेरे मुताबिक यही एक रास्ता है कि हमें इस्लाम की अमन और सद्भाव के धर्म और बहुलवाद वाले समाजों में सह-अस्तित्व की समझ को स्पष्ट और ज़ोरदार अंदाज़ में प्रचारित करना चाहिए। और इसमें क़ुरान करीम की आयतें और नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम (स.अ.व.) का करिदार हमारे लिए मददगार होगा। पूरी दुनिया के मुसलमान अगर इस नफरत की मुहीम 'इस्लामोफोबिया' के खिलाफ उठ खड़े हो जाए तो अमरीका और गिनती के यूरोपीय मुल्कों कि क्या मजाल कि इस नफ़रत के पौधे को आगे खाद पानी देने की हिम्मत करे !

#नोट:- अभी हाल ही में हैदराबाद में जनवरी में हुए जमात-ए-इस्लामी हिंद द्वारा यहां आयोजित स्प्रिंग ऑफ इस्लाम सम्मेलन में ब्रिटिश पत्रकार, #मोहतरमा_वॉन्नी_रिडले को वीजा देने से इंकार कर दिया था, बाद में उन्होंने वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिए लड़कियों, महिलाओं और पत्रकारों के तीन सत्रों को सम्बोधित किया। यह वही मोहतरमा वॉन्नी रिडले है जिन्हे तालिबान ने 2001 में बंधक बना लिया था और 2003 में रिहाई के बाद खुद उन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया था, यह वॉन्नी रिडले मोहतरमा भी इसी 'इस्लामोफोबिया के खिलाफ अपनी आवाज़ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बुलंद किये हुए हैं ! आप इन Yvonne Ridley के बारे में इंटरनेट या फिर WIKIPEDIA पर तफ्सील से पढ़ भी सकते हैं, WIKIPEDIA लिंक यह है :- http://en.wikipedia.org/wiki/Yvonne_Ridley 



Śỹëd Äsîf Älì
February 3' 2014



ताकि और अरीब मजीद ना बन पाएं ~~!!

कल्याण के इंजीनियरिंग स्टूडेंट अरीब मजीद का नाम अब कोई अनजान नाम नहीं है,  ISIS के लिए काम करने गए अरीब मजीद को ईराक़ से लौटते ही NIA ने अपनी गिरफ्त में ले तो लिया गया था, और जैसा कि जांच और खुद उसके बयानों से यह बात सामने आयी है कि वो सोशल मीडिया के ज़रिये ही इस काम के लिए मोटीवेट हुआ था, और इस ब्रेन वाश करने में  एक लड़की का हाथ है। उसका नाम है ताहिरा भट्ट,जिससे उसकी दोस्ती फेसबुक पर हुई थी। अपने छह पन्ने के बयान में मजीद ने दावा किया है कि ताहिरा ने उसका और उसके तीन दोस्तों शाहीम तनकी, फहाद शेख और अमन टंडेल का ब्रैनवॉश कर इस काम के लिए उकसाया !!


सोशल मीडिया देखा गया है कि कई नौजवान उकसाने और  कट्टरता फैलाने वाली पोस्ट्स पर बिना सोचे समझे न सिर्फ ज्यादा तवज्जो देते हैं, बल्कि दिन रात इसी धुन में लगे भी रहते हैं...यह नौजवान फेसबुक पर कई उकसाने वाले ग्रुप्स और पेजेज़ के सदस्य भी हैं ! वो यह नहीं सोचते कि सोशल मीडिया पर उनकी इस गतिविधियों से क्या हासिल होने वाला है ? फेसबुक पर ऐसे कई ग्रुप्स भी हैं...जो कि मुसलमानो के नाम से कोई और ताक़ते आपरेट कर रही हैं, बिना सोचे समझे इनके जाल में फंसने वाले नौजवान खुद अपने लिए ही आफत का सामान इकठ्ठा कर रहे हैं ! 


पहले भी IM (इंडियन मुजाहिदीन) के जाल में कई नौजवान फंसे हैं, गिरफ्तार हुए हैं, और इसी IM की आड़ में सैंकड़ों बेगुनाह मुस्लिम नौजवान परेशान किये गए, हिरासत में लिए गए, कई छोड़े गए, कइयों का सामजिक, पारिवारिक जीवन बर्बाद हुआ ! अब इस ISIS के आकर्षण में फिर से मुस्लिम नौजवानो के फंसने की खबर आयी है तो यह भी एक बड़ा खतरा ही कहा जा सकता है !


मुझे इसी बात पर अपने फेसबुक दोस्त जनाब अकरम शकील साहब का एक स्टेटस याद आ गया, उन्होंने लिखा था कि :- " जन्नत जाने का रास्ता लीबिया, ईरान, सीरिया या ईराक़ से ही नहीं जाता है, आप जन्नत अपने ही मुल्क हिंदुस्तान में अच्छे आमाल करके भी जा सकते हैं ! "


ऐसे में सभी नौजवानो से यही अपील है कि कभी किसी के उकसावे या बहकावे में नहीं आयें, कभी किसी प्रकार की लालच में नहीं आयें, संदेहास्पद लोगों से दूरी बनाये रखें, ख़ास तौर पर इंटरनेट पर ऐसे अजनबी लोगों से सावधान रहें, जो मुसलमान के रूप में आपको गुमराह करना चाहे हों, उग्र विचार वालों से होशियार रहें, कभी तैश में नहीं आयें, किसी भी मुद्दे या घटना पर आक्रोशित कभी ना हों, विरोध करें तो लोकतांत्रिक तरीक़े से और क़ानूनी मर्यादा में रहते हुए करें, पूरी  होशमन्दी का सबूत दें, ताकि आगे कोई और अरीब मजीद ना बन पाये !
Śỹëd Äsîf Älì 
December 3, 2014 


सत्ता से दूरी - कांग्रेस के लिए ज़रूरी !!

भारत की आजादी के बाद से कांग्रेस ने सिर्फ 13 साल छोड़ कर बाकी सारे समय देश पर राज किया है. इस बार भी लगातार 10 साल तक सत्ता में रहने के बाद उसे हार का सामना करना पड़ा है. इसका कारण बताने की ज़रुरत भी नहीं है ! गठबंधन सरकार की मजबूरियों को बहाना बना कर ढीली और कमज़ोर सरकार का तमगा लिया, कई निर्णय और विधेयक ठन्डे बस्ते में ही रहे, 2 G घोटाले से लेकर कॉमन वेल्थ घोटाले ने तथा कई और भी घोटालों ने भी इस हार में मुख्य भूमिका निभाई ! और इसका नतीजा 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को प्रचंड बहुमत के रूप में सामने आया !


कांग्रेस की बुरी तरह से पराजय हुई, यहाँ तक कि कई राज्यों के विधान सभा चुनावों से लेकर स्थानीय निकायों के चुनावों तक में सूपड़ा साफ़ हो गया ! भले ही इसे मोदी लहर कहें मगर एक नज़रिये से देखा जाए तो यह कांग्रेस के विरुद्ध जनादेश भी कहा जा सकता है ! 


कांग्रेस के लिए सत्ता से दूरी क्यों ज़रूरी है, इसकी दलील यह है कि इस लोकसभा चुनावों से ठीक पहले हवा के रुख को देखते हुए  कई दिग्गज कांग्रेसियों ने भाजपा को ज्वाइन किया है, जो कि कांग्रेस के लिए  ठीक ही रहा, यदि यह लोग कांग्रेस में ही रहते तो वफादारी किस प्रकार निभाते यह शायद कांग्रेसी जान चुके होंगे, दूसरी बात 10 साल सत्ता सुख भोगते भोगते कांग्रेस और उसके कई बड़े नेता अति आत्म विश्वास से लबरेज़ हो गए थे, फूहड़ बयान बाजियां जमकर हुईं, चमचा गिरी और चापलूसी की इंतिहा होगई, एक साहब ने तो सोनिया गांधी को देश की माँ तक कह डाला था, वहीँ दूसरी ओर  देश में सुलग रहे जनाक्रोश से भी पूरी तरह अनजान रहे,  और उस जनाक्रोश को अन्ना आंदोलन के ज़रिये विस्फोटित किया गया, बाद में रामदेव बाबा भी इसमें कूद पड़े ! 


कांग्रेस के लिए सत्ता से दूरी की ज़रुरत को समझने के लिए हमें 6 -7 वर्ष पीछे लौट कर सत्ता से 10 वर्ष दूर रही भाजपा और उसकी उस समय की स्थिति तथा अब की स्थिति पर भी एक नज़र डालना होगी, तभी इसे ढंग से समझा जा सकता है, उस समय भाजपा इतनी कमज़ोर थी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उसकी कमज़ोर आवाज़ या फिर काले धन के खिलाफ उसका विरोध एक औपचारिकता मात्र ही लगता था,  मगर जब भाजपा के थिंक टैंकों ने अपनी रणनीति  बदली और सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों को कांग्रेस के शासन के विरोध आवाज़ उठाने के लिए अपने साथ लिया तो स्थिति तुरंत ही बदल गयी,  इसका सबसे बड़ा उदाहरण भ्रष्टाचार के खिलाफ तैयार किया अन्ना आंदोलन और रामदेव बाबा का काला धन विरोधी आंदोलन ! यदि यह दो आंदोलन नहीं होते तो शायद भाजपा को यह प्रचंड बहुमत भी नहीं मिल पाता ! जनाक्रोश को सुनियोजित ढंग से समझ कर उसका मंथन किया गया !


कांग्रेस का अर्थ 'जीत' नहीं है, कांग्रेस का अर्थ केवल 'सत्ता' ही नहीं है, अब कांग्रेस किस स्थिति में है, किसी से छिपा नहीं है, सत्ता से दूर रहकर कांग्रेस को बहुत कुछ सोचना है,  पिछले दस सालों के लेखे जोखे से सबक लेना है, वर्तमान नीति बनानी है, भावी रणनीति पर भी काम करना है, और 2014 में हुए इस सत्ता परिवर्तन पर और उसके मूल कारणों पर भी मंथन करना है, समय बहुत है, हो सकता है इन्हे भी पूरे दस वर्ष उसी तरह प्रतीक्षा करना पड़े जैसा कि भाजपा को करना पड़ा था,  और यदि चेते नहीं तो हो सकता है 10 वर्ष से भी ज़्यादा प्रतीक्षा काल हो जाए, और यदि ऐसा हुआ तो 'कांग्रेस मुक्त भारत' का नारा भी सच हो जाएगा !

Śỹëd Äsîf Älì
1st Dec., 2014

आप इतिहास रच सकते हैं मोदी जी, बशर्ते...!!

लगभग तीन महीने पहले AMU (अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी) में मेडिकल परीक्षा के काम से अलीगढ जाना हुआ था, वहां क़याम के दौरान कई लोगों से पॉलिटिक्स पर बात चीत हुई,  वहां के लोगों ने बहुत ही विचारोत्तेजक बिन्दुओं पर ध्यान दिलाया, वहां की बात चीत में जो बाते निकल कर सामने आईं वो कुछ इस तरह से थीं कि ... पहली और सबसे बड़ी बात तो यह कि वहां के लोगों का यह कहना था कि नरेंद्र मोदी की इस बड़ी जीत से घबराने या आशंकित होने की बिलकुल ही ज़रुरत नहीं है, यह एक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया है, कोई भी राजनैतिक दल सत्ता पाने का अधिकारी होता है ! 


वहां के लोगों का यह भी कहना था कि प्रधान मंत्री पद की शालीनता, कर्तव्य, और गरिमा होती ही ऐसी है कि उस पद पर आसीन होने के बाद व्यक्ति में परिवर्तन स्वाभाविक होता है, और यही कारण है कि नरेंद्र मोदी की चुनावी आक्रामक शैली अब कहीं नज़र नहीं आ रही है, इस पद पर आसीन होने के बाद उन्हें अपने कर्तव्यों का पालन करने को बाध्य तो होना ही है, इस विशाल देश और उसकी की जनता का वर्तमान और भविष्य संवारने का ज़िम्मा और मौक़ा उन्हें मिला है, ऐसे मौके को खोना नहीं चाहिए और अपने आपको साबित करना चाहिए, लम्बी पारी खेलनी है तो सभी को साथ लेकर चलना चाहिए,  आपने वर्तमान जीत लिया तो भविष्य भी आपका है !


दूसरी अहम बात वहां के लोगों ने कही कि इस चुनाव और भाजपा की विराट जीत ने नरेंद्र मोदी को एक नायाब सुनहरा मौक़ा दिया है कि वो अगर ठान लें तो अपने आप को अटल बिहारी से आगे ले जाकर दिखा सकते हैं, और इतिहास में एक शाक्तिशाली प्रधान मंत्री के रूप में स्थापित हो सकते हैं, बशर्ते कि वो वर्तमान का सही और सार्थक उपयोग कर सकें, जो कि बहुत ही कठिन है ! कारण साफ़ नज़र आ रहे हैं कि जहाँ एक ओर इनकी ही पार्टी के योगी आदित्यनाथ और साक्षी महाराज जैसे लोग लोग लव जिहाद और मदरसों पर आतंकी पैदा करने, गरबा में मुसलमानो को प्रवेश न देने जैसे मुद्दे लेकर धार्मिक उन्माद भड़काने के लिए सड़कों पर उत्तर आएं हैं, वहीँ दूसरी ओर संघ ने भी धीरे धीरे हिन्दू राष्ट्र का राग शुरू कर दिया है, यह बहुत दुखद है..और इससे ज़्यादा दुखद है.... इन सभी मामलों पर मोदी जी की चुप्पी !


ऐसे में यदि मोदी जी ने इन ताक़तों के सामने हथियार डाल दिए तो 2019 को शायद इन्हे जनता की कड़वी दवाई पीनी पड़ जाए, इसी लिए इस चुनावों में मिले विशाल बहुमत  का सम्मान करते हुए यदि मोदी जी अपने इन बयान बहादुरों के मुंह और प्रयासों पर लगाम लगा कर. संघ के प्रभाव से मुक्त होकर सभी करोड़ों देश वासियों के हित के लिए आगे बढ़ें तो उनको सभी का समर्थन और साथ मिलता रहेगा, देश के सभी वर्ग, धर्म के लोग भारत को बुलंदियों पर देखना चाहते हैं, एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं, वे सभी अपना सुरक्षित भविष्य और सुनहरा वर्तमान चाहते हैं !


हाल ही में  देश में हुए उपचुनावों के नतीजों के बाद बयानों में आये बदलावों और आज हिंदुस्तानी मुसलमानो के लिए दिए गए उनके बयानों से आशा की एक हल्की सी लौ तो झिलमिलाई है, अब उस लौ को आशा का दीपक बनाये रखने की पूरी ज़िम्मेदारी मोदी जी की है, देखना है कि इस पर वो कितने खरे उतरते हैं !!

(Śỹëd Äsîf Älì)

20/09/2014

विवाहित नारी : अर्धांगिनी या दासी ??

विवाहित नारी को झाड़ू पोंछा बर्तन रोटी करने वाली बाई, बच्चे पैदा करने वाली .. और पाँव दबाने वाली गुलाम समझने की कुप्रथा अब भी कई समाजों में चहल क़दमी कर रही है, और दुःख इस बात का है की इस कुप्रथा की सबसे बड़ी संवाहक खुद औरत ही है, आज भी कई जगह शादी योग्य लड़कों की माँओं को औरतों द्वारा यह कहते सुन सकते हैं कि अब और कितने दिन भर के काम कर कर के शरीर को कष्ट दोगी ? बहू क्यों नहीं ले आतीं ? यानी उनके लिए बहू एक बिना वेतन के घर के काम करने वाली महरी हो गयी, और साथ में बच्चे पैदा करने का काम भी बिलकुल फ्री ! कहीं न कहीं इस कुप्रथा के पीछे अशिक्षा भी बड़ा कारण रहा है, गाॉंवों और क़स्बों में अभी भी यह कोढ़ बहुलता से देखा जा सकता है ! इस नज़रिये से तो औरत की शादी होना .....अप्रत्यक्ष रूप से उसे दासता की बेड़ियों में जकड़ना ही हुआ ! 

यही कुछ हम कई फिल्मों और टी.वी. धारावाहिकों में भी देख सुन सकते हैं, जहाँ यह सब कुप्रथाएँ धड़ल्ले से जारी हैं, सरकार ने शराब, सिगरेट जैसी चीज़ों के प्रदर्शन पर तो रोक लगा दी है, मगर समाज में एक कोढ़ की तरह रची बसी इस कुप्रथा को कई रूपों में दिखाने से रोकने के लिए किसी प्रकार का कोई क़ानून नहीं है, क्या दहेज़, क्या अत्याचार और दमन, हर धारावाहिकों में परिवारों में बहुओं पर अत्याचार के अनेक रूप आप देख सकते हैं ! अधिकांश धारावाहिकों में बहू को एक काम करने वाली महरी की तरह ही पेश किया जाता रहा है, जो घर में सिर्फ खानदान का चिराग देने, झाड़ू-पोंछा-बर्तन करने और सब के पाँव दबाने के लिए ही ब्याह कर लाई जाती है ! क्या माँ बाप अपनी बच्चियों को इस दिन के लिए पैदा करते, पढ़ाते लिखाते हैं कि कल को वो दहेज़ के साथ किसी घर में एक अवैतनिक महरी बन कर जाए ? 

जो लोग दहेज़ के बिना बहु घर नहीं लाते, और जिन लोगों के घरों में औरतों के साथ गुलामों जैसा व्यवहार होता है, उनकी बेटियों के साथ अगर कोई वैसा ही व्यवहार करे तो चीख पुकार मच जाती है, ऐसा दोहरा रवैया आखिर क्यों ? किसी की बेटी को लोग अगर ब्याह कर घर लाते हैं, और उसे बेटी का दर्जा देने से परहेज़ करते हैं तो उन्हें कोई हक़ नहीं कि अपनी बेटियों के लिए ऐसा ही दर्जा चाहें ! वो क्यों इस बात की आशा करते हैं कि उनकी बेटी ससुराल में रानी बन कर रहे, नौकर चाकर चारों तरफ रहें ? सामाजिक और पारिवारिक परम्पराएँ निभाना अलग बात है और सामाजिक कुरीतियों की भेंट चढ़ना अलग बात !  

पति पत्नी जीवन रुपी गाडी के दो पहिये होते हैं, अगर एक कमज़ोर या एक अधिक भरी पड़ जाए तो फिर यह गाडी चलती नहीं ...घिसटती है, आज जहाँ लड़कियां पढ़ लिख कर ऊंचाइयों को छू रही हैं, हर क्षेत्र में अपना नाम रोशन कर रही हैं, चाहे वो सेना हो या पुलिस, बैंकिंग हो या मेडिकल, राजनीति हो खेल, हर कहीं परचम बुलंद किये हुए है, पुरुषों के कंधे से कन्धा मिला कर चल रही हैं, ऐसे में इस तरह की पिछड़ी हुई सोच, और कुरीतियों के ख़त्म नहीं हो पाने के पीछे के कारणों को खत्म करने के लिए नयी पीढ़ी को बीड़ा उठाना ही होगा, ख़ास कर युवकों को आगे आकर इस अंतर को ख़त्म करना होगा, और इसकी शुरुआत अपने अपने घरों से ही करने की सोच लें तो इस कुप्रथा को खाद पानी मिलना धीरे धीर कम हो जाएगा...और आशा है कि यदि ऐसे प्रयास बड़े स्तर पर होने लगें तो आने वाले समय में यह कुप्रथा केवल क़िस्से कहानियों में ही सुनने को मिले !!

बहुत याद आते हो बाबूजी !!

मेरे वालिद मरहूम सय्यद हामिद अली जिन्हे उस दौर की फुटबॉल की दुनिया में 'भैया' के नाम से जाना जाता था, राजस्थान के टोंक शहर के रहने वाले थे, उनके वालिद (मेरे दादा) पुलिस में सुपरिन्टेन्डेन्ट थे, उनके बेहतरीन खेल का डंका न सिर्फ राजस्थान और देश में ही बजता था, बल्कि पाकिस्तान में भी उनके खेल को सराहा गया था, वो राजस्थान पुलिस के पहले राष्ट्रिय खिलाडी भी थे, वो दौर था जब जयपुर में फुटबॉल के लीग मैचेज़ हुआ करते थे, महाराजा कालेज में खेली जाने वाली इस लीग में वालिद साहब को राजस्थान क्लब से खेलने के लिए टोंक से बुलवाया जाता था !


वालिद साहब ने अपनी ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पूरी की थी, और 1945 से लेकर 1947 तक वो अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की फुटबॉल टीम के कप्तान भी रहे थे, आज भी वहां स्पोर्ट्स हाउस में उस दौर की टीम के बड़े बड़े नाम पट्टों पर उनका नाम दर्ज है ! साथ ही उन्हें अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का "कलर" भी मिला था, जो कि बिरले खिलाडियों को ही मिलता था ! 


जब वो प्रसिद्द खिलाडी मगन सिंह तंवर के नेतृत्व में पाकिस्तान खेलने गए तो उनके खेल से  प्रभावित हो कर उन्हें वहां उन्हें फ़ौज में लेफ्टिनेंट का पद तक देने की पेशकश की गयी थे, जिसे उन्होंने नकार दिया था, इसके बाद उन्हें ओकाड़ा मिल के मालिक ने 800 /- रूपये महीना और रहने को बांग्ला देने की पेशकश भी की थी, साथ ही उन्हें बेहतर तकनीक सीखने के लिए इंग्लैंड में ट्रेनिंग में भेजने की मंशा भी जताई थी, मगर वालिद साहब को अपने शहर टोंक से बहुत लगाव था, वो किसी भी पेशकश को नकारते ही गए, आखिर में उनका खेल देख कर उस समय पुलिस के DIG स्व. लक्षमण सिंह जी ने उन्हें पुलिस से खेलने और पुलिस ज्वाइन करने को मना ही लिया ! और उनको सीधा राजस्थान पुलिस में सब इन्स्पेक्टर का ओहदा दिया गया, इस ओहदे को उन्होंने बड़ी ही ईमानदारी से निभाया, उनकी पहचान एक ईमानदार, निडर, क़ानून के ज्ञाता और गरीबों के हमदर्द के रूप में आज भी है, आज भी पुलिस महकमें में उनका नाम सम्मान से लिया जाता है !!  25 फ़रवरी 2006 को वालिद वालिद साहब जन्नत नशीं हुए थे, वो एक बेहतरीन और ईमानदार पुलिस अधिकारी थे, एक अच्छे बेटे, अच्छे भाई, अच्छे पति, और दुनिया के सबसे अच्छे पिता थे,  मुझे फख्र है कि मैं उनका बेटा हूँ, वो आज भी मेरे अंदर धड़कते हैं, कोशिश करता हूँ कि उनके उसूलों और नज़रिये पर चलने की पूरी पूरी कोशिश करूँ !


आज आप बहुत ही याद आये बाबूजी !!!!  


(मैं शुक्रगुज़ार हूँ खेल पत्रकार ऐ. गनी साहब का जिन्होंने 21 फ़रवरी 2002 को भास्कर में वालिद साहब पर यह लेख लिखा) 

एक आम जूते की आत्मकथा ~~~ !!

सादर नमस्कारजी हाँ मैं जूता हूँ, मुझे भला कौन नहीं जानता ? हिंदी में जूता , अंग्रेजी में Shoes , पंजाबी में ਸ਼ੂਜ਼ (जुत्त ) , जापानी में दोसोकू , संस्कृत में पादुका ! मानव शिशु जब संभल कर माँ बाप की ऊँगली पकड़ कर चलना सीखता है, तभी से अपनी ड्यूटी पर लग जाता हूँ, और तभी से मैं इंसान का साथी बन जाता हूँ,  उसके शरीर का बोझ उठता हूँ, धूल हो या कीचड, पहाड़ हो या तलहटी, मौत हो या ज़िन्दगी, बस का सफर हो या ट्रैन का, हवाई यात्रा हो या समुद्री यात्रा, मंगल ग्रह की यात्रा हो या चन्द्रमा की, मैं हर जगह सदा मानव के साथ रहा हूँ, उसके रास्ते को कष्टकारी होने से बचाता हूँ, लोग मुझे सिर्फ सोते समय मुझे परे करते हैं !


मेरी महिमा भी कम नहीं है, आप मेरे ईराक़ी भाई को ही ले लीजिये जो ईराक़ी पत्रकार मुन्तज़र अल ज़ैदी के पाँवों की शोभा बढ़ा रहा था, और जब वो पाँव से निकल कर बुश की तरफ दौड़ा तो पूरे विश्व में उसकी शौहरत का डंका बज गया, अपुष्ट ख़बरों के अनुसार अब वो जूते संग्रालय की शान बढ़ा रहे हैं, इसी परंपरा को भारत में भी अपनाने की होड़ लग गयी थी, फिर तो हर कोई जब जी में आये हमें किसी भी नेता पर उछाल दिया करता था, चाहे वो पी चिदंबरम पर वर्ष 2009 में जूता फेंकने वाले पत्रकार जरनैल सिंह हो या प्रकाश सिंह बादल पर जूता फेंकने वाले, या फिर राहुल गांधी की सभा में जूता उछालने वाले,  या फिर हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की जनसभा में जूता उछालने वाले, सभी को एक चस्का लग गया, और इस परंपरा को आगे बढ़ाने में जुट गए, भले ही हमारी यह उछाला उछाली कई बार राजनैतिक दलों द्वारा स्पांसर ही क्यों न की गयी हो !


और यह हम ही हैं जिसे हैदराबाद से लाने के लिए मायावती का वायुयान एक ऑफिसर और दो सुरक्षा गार्ड के साथ लखनऊ से उड़ान भरता था, और यह हम ही हैं जिसके बेहद शौक़ के कारण तमिलनाडु में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता और उसकी सखी को सत्ता से उखाड़ फैंका गया था, आज भी लोग मज़ाक में जयललिता के जूता प्रेम का ज़िक्र कर ही देते हैं ! और यह वही नेताओं का जूता है जिसे नेताओं को पहनाते या जिसके फीते बांधते कई प्रशासनिक अधिकारियों के फोटो कई बार मीडिया में नज़र आते हैं, हाल ही में गुजरात के सीमाई इलाके के दौर पर गये गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सेना के जवान से अपने जूते का फीता बंधवाया था !


हम कितने ही जर्जर क्यों न हो जाएँ मानव के काम आते ही रहते हैं, मेरे मालिक मेरी खस्ता हालत होता देख घर से बहार फेंक देता है तो भी मैं किसी और गरीब मानव के काम अवश्य आता हूँ, मेरी भी कई प्रजातियां हैं, जैसे कुछ चमड़े के घराने के, तो कुछ फाइबर के घराने के, तो कुछ प्लास्टिक के घराने के, और वैश्विक स्तर पर हमें कई बिरादरियों में बाँट दिया गया है, जैसे Adidas , Nike , Puma , और भारत में बाटा से लेकर लखानी तक, और लिबर्टी से लेकर केम्पस और मेट्रो शूज़ तक !

मगर यहाँ अंत में आकर हम जूतों को एक बात से बहुत संतुष्टि है और गर्व है कि आप मानवों की संगत में लगातार रहते हुये भी हमने खुद को आपकी सभ्यता से बचा कर रखा. हमारे लिये क्या हिन्दू, क्या मुसलमान, क्या सिख और क्या ईसाई, सब एक हैं. हम सबकी एक समान ही नि:स्वाथ सेवा करते हैं, और सेवा करते हुए अपने आपको होम कर देते हैं !!

(Śỹëd Äsîf Älì)


Dr. Jane Goodall : एक महिला जिसने अपना जीवन चिम्पेनजियों के लिए समर्पित कर दिया !!

डॉ. जेन गुडॉल (Jane Goodall) का नाम विश्‍व के सम्‍माननीय जंतु वैज्ञानिक (Zoologist) के रूप में लिया जाता है। जेन गुडाल का जन्म 3 अप्रेल 1934 को लन्दन में हुआ था, उन्होंने डार्विन कालेज, केम्ब्रिज और न्यूहेम कालेज, कैम्ब्रिज से अपनी शिक्षा प्राप्त की थी,  शिक्षा पूरी करने के बाद जेन गुडाल ने आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में जॉब किया उसके बाद वो अपने एक मित्र की मार्फ़त केन्या में  मशहूर anthropologist ....Louis Leakey के संपर्क में आयीं और उसके बाद उनको साथ एंथ्रोपोलॉजी से सम्बंधित शोध भी किया, इसी दौरान उन्हें चिम्पेनजियों पर भी काम करने के लिए दिए गए ! अफ्रीका में जेन गुडाल ने न सिर्फ वहाँ के वन्य जीवन को बहुत नज़दीकी से देखा...बल्कि चिम्पेनजियों के संकट ग्रस्त जीवन ने भी उनको बहुत प्रभावित किया !

उन्होंने तय कर लिया कि वो खुद अपने दम पर अफ्रीका के इन चिम्पेनजियों के जीवन को बचने और उनके पुनर्वास लिए काम करेंगी, और आखिर में उनको इस कार्य के लिए ग्रानाडा टेलिविज़न के रूप में स्पांसर भी मिल गए जो कि उनके इस एनीमल डॉक्युमेंट्री प्रोजेक्ट के लिए धन तथा अन्य सुविधाएँ देने को राज़ी हो गए, डा. जेन गुडाल ने अपनी माँ और एक अफ्रीकी रसोइये के साथ जुलाई 1960 को अपना काम अफ्रीकी देश तंजानिया के गोम्बे स्‍ट्रीम नेशनल पार्क शुरू किया जो कि अभी तक जारी है...डा. जेन गुडाल ने चिपेन्जियों के लिए अफ्रीका में 1960 से लेकर 1995 तक काम किया था !

डा. जेन गुडाल ने घने जंगलों में रहकर चिंपाजियों के साथ व्‍यतीत किया और उनपर शोध कार्य किया। उन्‍होंने अपने शोध के द्वारा बताया कि हम मानवों की तरह चिंपैंजी भी साथ-साथ खेलना, काम करना, लड़ना आदि काम करते हैं, ज गुडॉल विश्‍व भर में गोम्‍ब जैसे कई स्‍थानों के जंगलों को नष्‍ट करने वाले लोगों से बचाने के लिए भरसक प्रयास कर रही हैं। उनके द्वारा स्‍थापित संस्‍था ‘रूट्स एण्‍ड शूट्स’ (Roots & Shoots) 70 देशों के स्‍कूल एवं कॉलेजों को पर्यावरण पशु और जनजाति की रक्षा के लिए प्रेरित कर ही है। एक चिप रिसर्चर होने के नाते वे संयुक्‍त राष्‍ट्र की शांति की संदेशवाहक (UN Messenger of Peace) भी हैं ! नेशनल जियोग्राफिक मेगज़ीन के कवर पेजो पर डा. जेन गुडाल की चिम्पैंजियों के साथ वाली कई फोटो को स्थान मिला ! 

26 वर्ष की अवस्‍था में चिम्‍पैंजियों पर शोध कार्य प्रारम्‍भ करने वाली डा. जेन गुडॉल की बदौलत इंसान के सबसे नज़दीकी इस चिम्पैंजी के जीवन के छिपे हुए हर पहलू को विज्ञान तक  पहुँचाया है...और इस प्रजाति को विलुप्ति के कगार से बचाया भी है...इनके अद्वितीय कार्यों के लिए जेन गुडाल को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने पी,एच,डी, की उपाधि प्रदान की है, और इसके अलावा उन्हें कई बड़े प्रतिष्ठित विश्व विख्यात पुरस्कार भी मिल चुके हैं : इनको मिले विश्व विख्यात पुरस्कारों की लाइन इतनी लम्बी है कि यहाँ देने से यह लेख बहुत ही लम्बा हो जाएगा...संक्षिप्त में आप इस लिंक पर क्लिक कर उनके जीवन और कार्यों तथा पुरस्कारों के बारे में विस्तार से पढ़ सकते हैं...लिंक यह है :- http://en.wikipedia.org/wiki/Jane_Goodall !



डा. जेन गुडाल आजकल कई फार्मास्‍यूटिकल कंपनियों में व्‍यस्‍त हैं तथा उसके साथ ही साथ पर्यावरण संरक्षण के कार्य में भी लगी हुई हैं। गुडॉल ने अपने अध्‍ययनों का निचोड़ स्‍वयं द्वारा रचित दो किताबों ‘वाइल्‍ड चिम्‍पैंजीस’ (Wild Chimpanzees), ‘इन द शैडो ऑफ मैन’ (In the shadow of man) में दिए हैं। इसके अतिरिक्‍त उनके पुस्‍तकें 'अफ्रीका इन माई ब्‍लड' (Africa in my blood) एवं 'हार्वेस्‍ट फॉर होप: एक गाइड टू माइंडफुल ईटिंग' (Harvest for Hope : A Guide to Mindful Eating) भी काफी चर्चित हैं !

आज उनके कार्यों को विश्‍व भर में मान्‍यता मिल रही है तथा अफ्रीका के घने वर्षा वनों में चिपेन्जियों का जीवन सुरक्षित होने लगा है...तथा चिंपैंजियों की अठखेरियां एक बार फिर जीवंत हो गई हैं !

सपनो की ऑफ्टर सेल्स सर्विस !!

जिस तरह से तगड़ी मार्केटिंग के ज़रिये बाजार में किसी भी प्रकार का उत्पाद जमकर बेचा जा सकता है, उसी तर्ज़ पर अब राजनीति में भी करोड़ों खर्च कर मार्केटिंग के ज़रिये सपनो के बेचने की परंपरा चल निकली है, मार्केटिंग का मूल मन्त्र यही होता है, कि बेचे जाने वाले उत्पाद को दूसरी कंपनी के उत्पादों से किसी भी तरह से बेहतर साबित करना, और कैसे भी करके ग्राहक को यह विश्वास दिलाना कि यदि वो यह उत्पाद खरीद लेगा तो बहुत ही फायदे में रहेगा ! इसके लिए बड़े बड़े दावे किये जाते हैं, अन्य कंपनियों के उत्पादों की कमियां बताकर अपने उत्पाद को श्रेष्ठ बताया जाता है ! 

जब यह मार्केटिंग सफल हो जाती है तो कंपनी के उत्पादों की जमकर खरीदारी होती है, कंपनी मालामाल हो जाती है, साथ ही एक नियम यह भी होता है कि उत्पाद बेचे जाने के साथ ही कम्पनियाँ अपने अपने सर्विस सेंटर स्थापित करती है ताकि ग्राहक को उत्पाद की बिक्री के बाद आने वाले किसी भी समस्या या तकनीकी परेशानी से मुक्ति मिल सके ! 

अब राजनीति में ठीक इसी फंडे को आज़माया जाने लगा है, लोगों को जमकर सपने बेचे जाने लगे हैं, जनता की दुखती नब्ज़ पर हाथ रख कर नारे तय किये जाने लगे हैं, उनके आक्रोश के अनुसार सपने तैयार किये जाने लगे हैं, और पी.आर. एजेंसीज की मदद से तगड़ी मार्केटिंग के ज़रिये यह साबित किया जाने लगा है कि हमारे सपने उच्च श्रेणी के हैं, और यदि आप राज़ी हैं तो न सिर्फ आप बल्कि समाज और देश भी निहाल हो जायेगा ! 

पिछले सपनो के पूरे ना होने या नए लुभावने सपनो की चाहत लिए जनता मन्त्र मुग्ध हो कर सपने खरीद लेती है, वो यह नहीं देखती कि यह किस प्रकार से पूरे होंगे, वो यह भी नहीं देखती कि इन सपनो की ऑफ्टर सेल्स सर्विस का भी कोई इंतज़ाम है या नहीं, जहाँ वो किसी सपने की तकनीकी खामी के लिए शिकायत तो कर सकता हो, या इन के पूरे ना होने या असफल होने की स्थिति में कोई अन्य विकल्प तो मौजूद हो ! 

राजनीति में सपनो के बेचे जाने के बाद उनके पूरा किये जाने का कोई नियम लागू होता भी नहीं है, भले ही जनता सड़कों पर ऊतर आये, बड़े बड़े किये गए वायदे उस समय बहानो में तब्दील होते नज़र आते हैं, और ठीक बाजार की परंपरा के अनुसार जनता को यह समझाया जाता है कि हेड आफिस को इस बाबत सूचना भेज दी गयी है, सबर रखिये, या फिर सम्बंधित डीलरों पर मामला टाल दिया जाता है, या फिर यह कहा जाता है कि फ़लाँ फ़लाँ कंपनी के तो फ़लाँ उत्पाद में यह कमी पायी गयी थी, कौनसी नयी बात है ! 

और असहाय जनता हर बार की तरह खरीदे गए सपनो को किरचों की तरह चूर चूर होता हुआ देख निढाल हो कर रह जाती है, कोई चारा नहीं रह जाता है, क्योंकि सपनो की क्षति पूर्ती तो नहीं हो सकती ...ना ही इनका कोई अन्य विकल्प हो सकता है, और ना ही इन टूटे हुए सपनो के लिए कोई ऑफ्टर सेल्स सर्विस सेंटर होता है !!