रविवार, 3 मार्च 2013

अब बोल क्या लब आज़ाद हैं तेरे ??

हमें किसी ने बताया था  कि फैज़ अहमद फैज़ साहब ने कहा था कि...बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, और यही सोच कर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर डरते डरते क़दम रखा था, फेसबुक ने ललचाया था, ट्वीटर की कूक ने लुभाया था, ब्लागर्स के ब्लॉग देखकर ब्लॉग लिखने को मन किया था, मगर जब वास्तविकता से पाला पडा तो होश फाख्ता होते देर नहीं लगे !

जब भी किसी विषय पर लिखने कि कोशिश की ...हर जगह ...हर साइट्स पर लोगों की लठैती झेलनी पड़ी, अब चाहे वो अन्ना सम्प्रदाय के हुल्लड़ पर हो या बाबा के काले धन के डमरू पर, या राहुल जी की चुप्पी पर मनमोहन सिंह जी के निर्णयों पर या  शिंदे जी के इरादों पर, कल की ही बात है. सात सवाल के शीर्षक सहित हस्तक्षेप.काम का  एक लिंक शेयर किया था..तब से ही एकाउंट बार बार उखड़ी उखड़ी साँसे ले रहा है !

इससे पहले तो लोकपाल आन्दोलन के मजमेबाजी के दौरान मेरा एकाउंट 14 - 15 बार हेक करने की कोशिश भी की गयी, जो कि हर बार काफी कसरतों के बाद रिकवर किया गया ! अब लिखें तो किस पर...? मौसम पर या अभिनेत्रियों के सौन्दर्य पर या बुश के कुत्ते पर, या मटरू की बिजली पर ?

अब सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर हम लड़कियों से ईलू ईलू करने तो नहीं आयें हैं, और ना ही रोज़ आन लाइन होकर Good Morning,सुप्रभात करने या आफ लाइन होते समय Good Night या शब-बा-खैर मात्र के लिए तो इन्टरनेट प्रयोग नहीं कर रहे हैं, अब दिल की बात लिखने का मूड तो होता है ना भाई, सो दीवारों पर तो लिखने से रहे, जब पूनम पांडे से लेकर शाहरुख खान तक, और मोदी जी से लेकर ममता तक और यहाँ तक कि हमारे शहर टोंक के जुम्मन मियाँ तक अपने ख्यालातों से सोशल नेटवर्किंग साइट्स को गुलज़ार बना रहे हैं, तो हम ने क्या गुनाह किया है भाई ?

कल ही एक समाचार पढ़ा था..कि जनाब  कुरियन के खिलाफ कमेंट करने पर 111  लोगों  पर केस दर्ज किया गया है, इनमें एक ने तो पोस्ट किया था और बाक़ी 110 ने शेयर किया था, बस तब से ही दिल धमाल मचाये है , बात बेबात धड़क रहा है, हर घंटी पर चुपके से झाँक कर देखता हूँ कि कहीं कानून के रखवाले अपनी मिजाज़ पुरसी करने तो नहीं आ गए ? क्या पता हिंदुस्तानी दारोगा है भाई, जैसे कार्टूनिस्ट असीम और शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की अंत्येष्टि के दिन बंद पर सवाल उठाने वाली शाहीन ढाडा के साथ कर चुके  है, कहीं दोहरा न दे ..क्या करे ...इन दारोगाओं के पास न तो इतनी साइबर समझ है और न ही इतने हाई टेक !

अब तो कुल मिलाकर यही डर सताने लगा है कहीं किसी पोस्ट, शेयर या कमेन्ट या लाइक पर दरवाज़े की घंटी बजे और .....!! अब तो बस अपने आप से बार बार यही सवाल करता रहता हूँ कि " अब बोल क्या लब आज़ाद हैं तेरे ??" !!*

< व्यंग्य मात्र है...* शर्तें लागू ..:)) ..>
(Wednesday February 27, 2013)

रंग रंगीलो आतंकवाद ~~??

कल परसों आतंकवाद पर एक बयान निकल कर आया, अब वो सिर्फ बयान था, खुलासा था, खबर थी या फिर मजबूरी थी, यह समझ नहीं आ रहा, मगर इससे एक बात तो पता चली कि अब आतंकवाद के भी कई रंग हो गए हैं, पहले भी कोई रंग था पता नहीं, अब जब यह बयान बाहर आया है तो पता चला कि आतंकवाद भी अब रंग रंगीलो हो गयो है, मगर यह बयान क्या सिर्फ एक खबर मात्र है या कुछ और ?

यह खबर है या खुलासा है, या सिर्फ बयान है? या फिर  मजबूरी ? तुष्टिकरण या राजनैतिक हथकंडा भी हो सकता है, कोई नया पैंतरा भी हो सकता है, या फिर सच भी हो सकता है, मगर सूचना क्रांति के इस दौर में कुछ भी छिपा नहीं है, देश के बाहर और अन्दर हुई हर बड़ी आतंकवादी घटनाओँ और बम ब्लास्ट के कारण और नतीजे खुले तौर पर मौजूद हैं। और इनमें हुई गिरफ्तारियाँ भी सब को पता हैं, किस रंग के आतंकवाद में कौन गिरफ्तार हुआ है ..देश जानता है, और क़ार्रवाहियाँ चल भी रही है।

अब ऐसे में जब यह बयान बाहर आया है तो हैरानी होती है कि इस का मंतव्य क्या है ? यदि सबूत हैं तो देश के सामने लाये जाएँ, और इनमें लिप्त लोगों या संगठनो पर फ़ौरन कार्रवाही की जाए, यह आतंकवाद किसी भी रंग का हो वो न केवल देश की एकता, अखंडता और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए खतरनाक है बल्कि यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी बहुत ही घातक है , इससे किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाना चाहिए, और ना ही देरी की जानी चाहिए, और ना ही इस झुनझुने को और बजाना चाहिए। और यदि ऐसा नहीं होता है,  तो यह बहुत ही शर्मनाक बात होगी, देश ऐसे राजनेताओं को कभी माफ़ नहीं करेगा। अब तीर (बयान) कमान से निकल चुका है, इसका अंजाम जो भी हो ...मगर यही दुआ करते हैं कि कोई रंग बदनाम नहीं होने पाए, कोई धर्म बदनाम नहीं होने पाए ..इसी आशा के साथ।

(Wednesday January 23, 2013)

" मज़बूत जोड़ है साहब !!"

देश को नए शब्दों और मायनों में परिभाषित करने वाले शायद भूल गए ...इंडिया और भारत के अलावा एक हिंदुस्तान भी है ...जो दामिनी के साथ हुए अमानवीय काण्ड के बाद एकजुट होकर घरों से निकला ...तब उस हिन्दुस्तान को न तो दामिनी के असली नाम का पता था, न धर्म का पता था, न ज़ात का न पात का, न सोशल स्टेटस का ....न आयु का ..ना ही क्षेत्र का ....फिर भी यहाँ भारत और इंडिया दोनों मिल कर हिन्दुस्तानी के रूप में दामिनी के समर्थन के लिए उठ खड़े हुए !

राज पथ, जंतर मंतर और इंडिया गेट पर एकत्रित जनसमूह का कोई धर्म नहीं था ....कोई ज़ात नहीं थी ...वो भारत, इंडिया और यंगिस्तान सहित एक संगठित हिंदुस्तान था और इस संगठित हिन्दुस्तान के इस साझे हौंसले और जज्बे को कोई बाँट नहीं सकता ...न ये ठाकरे की सुनें न इमाम की न मोदी की माने न ओवेसी की ...जब भी कोई आंच आएगी ...जज्बे को ठेस पहुंचेगी ....हर हिंदुस्तानी  दूसरे की आवाज़ में आवाज़ मिलाएगा ..एक शक्ति पुंज बन जाएगा ....भारत और इंडिया मिलकर ...हिंदुस्तान के रूप में एक स्वर ...एक मत हो कर उठ खड़े होंगे .....यह बहुत मज़बूत जोड़ है साहब ...इतनी आसानी से टूटेगा नहीं ....याद कीजिये वो गाना जिसे सुनकर आप और हम बड़े हुए और अब भी सुन कर रगों में जोश भर जाता है ...>

हम हिन्दुस्तानी, हम हिन्दुस्तानी ...
आओ मेहनत को अपना ईमान बनाएं,

अपने हाथों को अपना भगवान बनाएं,
राम की इस धरती को गौतम की भूमी को,

सपनों से भी प्यारा हिंदुस्तान बनाएं,
नया खून है, नयी उमंगें, अब है नयी जवानी,
हम हिन्दुस्तानी, हम हिन्दुस्तानी ..!

यह मज़बूत जोड़ सलामत रहे इसी दुआ के साथ ....."आखिर दिल है हिंदुस्तानी !!"

 (Wednesday January 09, 2013)

थर्राने वाला डर पैदा करना ही होगा !!

दामिनी को न्याय दिलाने के लिए जन समूह पंद्रह दिनों से सड़कों पर है, मगर स्त्रियों के प्रति होने वाले यौन अपराधों/रेप की घटनाएं देश के कई भागों में रोज़ ही कहीं न कहीं बदस्तूर जारी हैं, चाहे वो दिल्ली में कंडक्टर और ड्राइवर द्वारा लड़की से बस में हुई छेड़ छाड़ हो, या हाथरस में रेप के बाद जिंदा जल दी गए महिला हो, या राजस्थान के सीकर में  11 साल की एक मासूम बच्ची (जिसकी हालत गंभीर बनी हुई है) से भी किया गया गेंग रेप हो, यह सब घटनाएं कहीं न कहीं बहुत कुछ सवाल उठती नज़र आती है।

कारक कई हैं मगर इसके मूल में देखा जाए तो सबसे पहली बात तो कानून का बिलकुल ही डर नहीं होना है, कई मामलों में देखा गया है कि सरे आम लड़की को अगवा कर ले जाया गया है, या फिर कुछ साल की सजा काट कर वापस आ कर लड़की पर जानलेवा हमला करना भी यही ज़ाहिर करता है, और इसके पीछे पीड़ित पक्ष का बदनामी के डर से पुलिस के पास नहीं जाना भी एक बड़ा कारण रहता है। ऐसी घटनाओं में पीड़ित पक्ष का सबसे पहले पुलिस से ही पाला पड़ता है, यदि पुलिस ही FIR दर्ज करने नहीं करे या अपराधियों को बचाने की कोशिश करे तो फिर आगे न्याय के लिए रास्ता ही कहाँ रह जाता है ?

" सख्त कानून और सख्त सजा " का विकल्प यदि हो तो अपराधियों में भय अवश्य पैदा होता है, ज़रुरत है तो इसको नियमानुसार लागू करने की, दामिनी के साथ हुई इस दर्दनाक घटना के बाद से सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर यूज़र्स ने सऊदी और ईरानी कानून और दंड पर काफी चर्चाएँ की हैं, मगर वहां के सख्त कानून और उसके implementation तथा सजा पर बराबर अमल होता है।

बात सबसे पहले पुलिस की ही आती है, जिस रात बस में यह सब हुआ उसी बस कुछ समय पहले बस में सवार राम आधार नामक एक आदमी को भी इन दरिंदों ने लूट कर भगा दिया था, इसकी शिकायत राम अधार ने आईआईटी गेट के पास मौजूद दिल्ली पुलिस के पीसीआर से किया था लेकिन दिल्ली पुलिस ने कोई कार्रवाई करने की बजाय उसे ही उल्टा सीधा सुना दिया और कहा कि घर जाओ और सो जाओ। यदि उस रात दिल्ली पुलिस उस राम आधार की बात सुन लेती तो शायद दामिनी आज हमारे बीच जिंदा होती ...इस पूरे समाचार के लिए यह लिंक देखिये :-
http://visfot.com/index.php/news/7991-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%B8-%E0%A4%A4%E0%A5%8B-%E0%A4%B5%E0%A4%B9-%E0%A4%A8-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%9C%E0%A5%8B-%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%97%E0%A4%AF%E0%A4%BE.html



किसी भी अपराध की शिकायत के लिए या सुरक्षा के लिए आम आदमी सबसे पहले पुलिस के ही पास जाता है, अब यदि पुलिस ही निष्क्रिय, निष्ठुर, कामचोर और निकम्मी हो जाए तो फिर न्याय और कानून व्यवस्था कहाँ रह जायेगी ?

इसलिए सबसे पहला चरण तो पुलिस को आम जन के प्रति समर्पित और जवाबदेह बनाने की बहुत ही ज्यादा ज़रुरत है, यदि पुलिस ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से अपना काम करे तो अपराध अवश्य ही कम होंगे।

दूसरा आम जन भी (भले ही वो पुरुष हो या महिला) खुद पहले अपनी सुरक्षा के प्रति सचेत रहे, विशेष कर जब कि उसको पता है कि देश की पुलिस का रवैय्या और कार्यप्रणाली क्या है, सुरक्षा के प्रति सचेत रहने में लाभ ही है, हानि कुछ भी नहीं है, स्वयं की सुरक्षा में चूक हो जाने के दशा में न केवल महिला ..बल्कि पुरुषों को भी कई प्रकार की लूटा मारी और राहज़नी की वारदातों का शिकार होना पड़ता है।

तीसरी बात  ...न्याय व्यवस्था और कानून की आती है, बलात्कार जैसे अपराधों में कड़े दंड का प्रावधान का नहीं होना या दंड प्रक्रिया का लम्बा होना या अन्वेषण के तरीके का उचित नहीं होना ...कई कारण हो सकते है।

दामिनी सब को जगा कर सो गयी है, मगर आने वाले समय में स्त्रियों के प्रति होने वाले यौन अपराधों पर लगाम लगाने में दामिनी का नाम सबसे पहले आएगा,  अब जहाँ  देश में बलात्कार और उसके अपराधियों को कड़े दंड के प्रति बड़ी बहस छिड़ी है, वहीँ दूसरी ओर अब गेंद न्यायपालिका और सरकार के पाले में है, हम सभी यही आशा और दुआ करते हैं कि सरकार महिलाओं के प्रति होने वाले यौन अपराधों/बलात्कारों के लिए सख्त से सख्त सजा का कानून बना कर एक उदाहरण पेश करे ... ... और दामिनी के हत्यारों को जल्दी से जल्दी वो सख्त सजा दिलाये ...चाहे वो नपुंसक बनाने का हो या रेयरेस्ट आफ द रेयर केस में फांसी का हो ...ताकि आगे से इस देश में कोई और दामिनी ऐसी शर्मनाक घटना की भेंट नहीं चढ़े ...इसी दुआ और आशा के साथ।

(Wednesday January 02, 2013)

आहत,सहमी हुई और आक्रोशित हमारी चिड़ियाएँ !!

दिल्ली गेंग रेप के बाद जैसे जैसे पूरा देश आवेश में उबल रहा है, और समाचार तथा विवरण बाहर आ रहे हैं, वैसे वैसे अपने सुकोमल से संसार में मस्त रहने वाली बेटियाँ जो कि नन्ही चिड़ियों की तरह ही होती है, अचानक से सहम सी गयीं है, उनके हँसते खिलखिलाते चेहरे एकदम से खामोश से नज़र आने लगे है, बेटियों का पिता होने के नाते मुझे उनके इस बदलाव का अहसास है, सुबह स्कूल ...फिर स्कूल से ट्यूशन ..और शाम को अपने घोंसले में लौटने तक इनके लिए हमारी चिंता अचानक से बढ़ गयी है ...ज़ाहिर है .और सबको पता भी है कि आज भी  देश के हर राज्य में हर शहर में हर मोहल्ले में कहीं न कही कई  "रामसिंह" जैसे  गिद्ध इन असहाय चिड़ियों की तलाश में घूम ही रहे होंगे  ...किसी ऐसे ही मौके की तलाश में ..!

सफदरजंग अस्पताल में भर्ती  उस बच्ची को "दामिनी" का नाम दे दिया गया है, बच्चियां दिन भर की पढाई लिखाई की व्यस्तता में भी टी.वी. पर आ रहे दामिनी के केस के समाचार पर सब काम छोड़ कर नज़र गडा  देती हैं, समाचार सुन कर और ज्यादा आहत और भयभीत नज़र आने लगती है, मगर फिर अब कहीं न कहीं इनके भीतर समाज और कानून व्यवस्था के प्रति एक आक्रोश भी नज़र आने लगा है, ...इक्कीसवीं सदी में जहाँ स्त्री चाँद पर हो आयी है, वहीँ देश में हो रही ऐसी घटनाओं से महिलाओं, बच्चियों  में भय और आक्रोश उफनना स्वाभाविक है !

इन आहत चिड़ियों ने मौत से झूझती उस घायल चिड़िया "दामिनी" के लिए अपने अपने तौर पर अपने अपने स्तर पर आवाज़ उठानी शुरू की है, सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इन्होने एक ब्लैक गोले वाली फोटो शेयर की है जिसके नीचे लिखा है :-
 " I am sorry Damini "
Keep this as your display picture today ...The BLACK DOT OF SHAME ..Because we live in a society which can't protect it's own women.




और साथ में सभी आहत चिड़ियों ने यह आवाज़ उठाई है कि इन दरिन्दे गिद्धों को फांसी से कम सजा नहीं हो, और जब इनको फांसी दी जाए तो दामिनी को सामने खड़ा किया जाए ..ताकि वो इन घृणित अपराधियों को अपनी नज़रों से सजा मिलती देख सके !

अब गेंद पुलिस, कानून और न्याय व्यवस्था के पाले में है, देखना है कि कितनी जल्दी उस मौत से लडती घायल चिड़िया "दामिनी" को इन्साफ दिला सकते है, ताकि देश की करोड़ों चिड़ियाएँ जब भी निकलें तो आत्मविश्वास से निकलें और सुरक्षित अपने अपने घोंसलों में लौट सकें ..इस बार कोई कडा फैसला होकर ही रहे  ...इसी उम्मीद के साथ ....और भगवान्, अल्लाह उस घायल चिड़िया को ज़िन्दगी और मौत की जंग में जीतने का हौंसला दे ...इसी दुआ के साथ।

(Saturday December 22, 2012)

आम आदमी पार्टी : एक धूमिल सी आशा !!

हाल ही में हुए देश में हुए दो बड़े आंदोलनों जनलोकपाल और काले धन का विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट नज़र आता है कि यह दोनों आन्दोलन विपक्ष की पस्ती और सरकार की मस्ती की ही देन है, जहाँ भाजपा ने अपना आधार खोया है, आपसी फूट और अंदरूनी कलह के कारण भाजपा राष्ट्रीय हितों से ज्यादा पार्टी के झगडे सुलटाने में ही व्यस्त नज़र आयी है, वो चाहे भावी प्रधान मंत्री का पद हो या हाल ही में हुए गडकरी मामले की फजीहत !

उधर वर्तमान मिली जुली सरकार के शासन काल में हुए घोटालों के कारण भ्रष्टाचार का मुद्दा जोर शोर से उछला और आगे जाकर इसने आन्दोलन को जन्म दिया, आन्दोलन के जन्म पर भी छीना झपटी हुई थी ...अडवानी जी ने कहा की इस आन्दोलन का झंडा सबसे पहले मैंने उठाया था ..उधर बाबा रामदेव का कहना था की भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन उनकी देन है, देखा जाए तो यहाँ विपक्ष के निठल्लेपन के कारण यह मुद्दा (भ्रष्टाचार) आन्दोलन के रूप में परिवर्तित हुआ, जो कार्य विपक्ष को करना चाहिए था उसको एक आन्दोलन के रूप में परिवर्तित कर अन्ना ने जनलोकपाल आन्दोलन प्रारंभ किया और इसको व्यापक जनसमर्थन मिला !

मगर बाद में टीम अन्ना निजी टकराव के कारण बिखरी और टीम केजरीवाल का जन्म हुआ ...यह एक प्रबल प्रवाह के विभाजित होने जैसा हादसा ही कहा जा सकता है, इस विभाजन से कई समर्पित लोगों की आशाओं पर कुठाराघात भी हुआ, केजरीवाल ने अपनी पार्टी बना कर राजनीति में कूदने का ऐलान किया और एक के बाद एक खुलासे कर कुछ समय के लिए जनता का ध्यान आकर्षित किया, मगर जहाँ एक के बाद हुए खुलासों से पिछले खुलासे दबते गए, वहीँ इन खुलासों के निष्कर्ष और इन पर तर्क सम्मत कानूनी दबाव बनाने में टीम केजरीवाल की मंशा बिलकुल नज़र नहीं आयी !

आन्दोलनों से लोकतंत्र का शुद्धिकरण होता है, आमजन की देश के प्रति जागरूकता बढती है, सहभागिता बढती है, जो की बहुत ज़रूरी है, भारत जैसे देश में आन्दोलन के नाम पर या किसी लुभावने नारे पर जनता को घरों से निकालना बहुत मुश्किल होता है, मगर जब जनता घरों से निकल कर सड़कों पर आ जाती है, तो उसके आक्रोश के प्रवाह को सार्थक निष्कर्ष तक पहुँचाना भी आन्दोलनकारियों का कर्तव्य होता है ! जिसमें कि अभी तक असफलता ही नज़र आई है, हाँ यह बात ज़रूर है कि सरकार पर दबाव बना है, लोकपाल पर बनी कमेटी ने कुछ संशोधनों के साथ अंतिम मसौदा सरकार को दिया है, और दूसरी और देश में इन ज्वलंत मुद्दों पर जागरूकता बढ़ी है और राजनैतिक पार्टियाँ भी खूब सचेत हुई हैं।

केजरीवाल महोदय आज से राजनीति में प्रवेश कर रहे हैं ...मगर  राजनीति के अखाड़े में बहुत कुछ और भी होता है, सिर्फ भ्रष्टाचार विरोधी नारे मात्र से ही कोई चुनाव नहीं जीता जा सकता, चुनावों में मुद्दे इसके अलावा भी बहुत होते हैं, इसका जीता जागता उदाहरण उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम हैं, जहाँ न कांग्रेस का जादू चला न भाजपा का, न मायावती का, न बाबा के काले धन आन्दोलन का और  न ही अन्ना के जनलोकपाल आन्दोलन का !

अब आज केजरीवाल ने अपनी पार्टी "आम आदमी पार्टी " ( जिसे अंग्रेजी में देखा जाए तो " AAP " (आप) जैसा भान भी होता है )...की घोषणा की है ..तो मुझे लगता है कि इसे  पिछले आंदोलनों की सफलता, असफलता, आपसी मनमुटाव, टीम विभाजन के बाद इसको एक आशा की किरण ही कहा जा सकता है, मगर बहुत धूमिल,  देखना है कि इस किरण को वो कितना प्रज्जवलित करते हैं ...और घरों से निकली ...आंदोलनों की नूरा कुश्ती से हतप्रभ और  भ्रमित जनता के सपनो को यथार्थ में बदलते है ...आशा और शुभक��मनाओं के साथ !!

(Saturday November 24, 2012)

'तेरी माँ की यूथ!!' पर क्यों बिग बॉस??


बिग बॉस सीज़न-6 शो के पहले ही दिन पारिवारिक शो का दम भरने का नाटक करने की पोल खुल गयी...जब बिग बॉस प्रतियोगी सपना भावनानी ने सलमान को एक टी.शर्ट दी...जिस पर लिखा था " Teri Maa ki Youth " इस का मंतव्य क्या था...? यह शो पहले भी कई बार लड़ाई झगड़ों और अश्लीलता के कारण विवादों में रहा है...सबको पता है, अश्लीलता को लेकर विशेष रूप से...और इस बार भी शुरुआत भी बड़े ही गलियाते तरीके से हुई. "तेरी माँ की यूथ" जैसे नारे से लिखी इस शर्ट के पीछे ..इस देश में टी.वी. चेनलों द्वारा बार बार कुछ सीमाओं को तोड़ने की कोशिश में सफल होने की झलक भी नज़र आयी...हमने देखा है कि कामेडी सर्कस शो में भी कुछ इसी प्रकार का संवाद कृष्ण और सुदेश के बीच बड़ा मशहूर हुआ है..." तेरी माँ का साकीनाका " आरम्भ में सुनकर झटका तो लगा था...मगर फिर यह एक हास्य का प्रतीक बना ...परन्तु अब इस पर ज़रा भी हंसी नहीं आती ...शो निर्माता/निर्देशक मार्केटिंग और मनोविज्ञान के माहिर खिलाडी होते हैं...जब उन्होंने देखा कि दर्शकों ने "तेरी माँ का साकीनाका"  जैसे संवाद को हज़म कर लिया तो...उन्होंने इससे भी आगे की जा सोची....और उसको पेश भी कर डाला "तेरी माँ की यूथ" की शक्ल में ! इसको तो अपनों के बीच उच्चारित करते भी डर लगता है !
 
मगर यह सब जानबूझ कर हुआ है, सब जानते हैं..और इसके पीछे एक बहुत बड़ी संख्या इस प्रकार के अश्लील और नान वेज टाइप संवाद या गालियों को पसंद करने वाले वर्ग या दर्शक हैं....और इस प्रकार के दर्शकों या सम्प्रदाय को आप " Yo " नस्ल भी कह सकते हैं ..माल कल्चर में जीने वाले, बिसलेरी हाथ में लिए, चिप्स मूंह में ठूंसे, सिगरेट के छल्ले उड़ाते...TAB पर लगातार चेटिंग करते..बियर बार के बाहर उल्टियाँ करते " Yo " सम्प्रदाय को बहुत ही पसंद आया होगा...यह वही Yo नस्ल है...जो Mtv रोडीज में रघु की गलियाँ और उसके द्वारा की गयी बाद तमीज़ियाँ खुश और तन्मय हो कर देखते हैं...इनके आपसी संवादों में कहीं न कहीं एक दो अंग्रेजी गाली ठूंसी सुनाई देगी, इस बिग बॉस शो में इस ड्रामे के फ़ौरन बाद tweeter और facebook पर इस नस्ल को इस विषय पर मज़े लेता देखा गया..! यह लिंक देखिये : http://ibnlive.in.com/news/bigg-boss-6-how-teri-maa-ki-youth-became-a-hit-overnight/298905-44-124.html
जहाँ सत्यमेव जयते जैसे शो ने एक सामजिक अलख सी जगाई थी...एक सार्थक सन्देश दिया था...देश के कई परदे के पीछे छिपे नायक और नायिकाओं को हम सबके सामने लाया गया था...जिन्होंने देश, समाज, स्वास्थ्य विज्ञान तथा अन्य कई क्षेत्रों के लिए अपना जीवन सौंप दिया था...वहीँ बिग बॉस जैसे शो के सन्देश को समझना एक पहेली हो रहा है, पोर्नस्टार से लेकर विदेशी अभिनेत्रियों तक को बुलाना, विवादास्पद व्यक्तियों को बुलाना...घर के अन्दर खूब गालियाँ देना (जिसको कि यह "बीप" "बीप" में बदल देते हैं) और खूब लड़ना झगड़ना ...यानी कुल मिलाकर विवादित होकर अपनी TRP बढ़ाना...औत्र रोकड़ा लेकर निकल लेना !

हमेशा की तरह इस बार भी यह शो शुरू हो चुका है और इसके प्रतियोगी अन्दर जा चुके हैं...मगर यह तो तय सा लग रहा है कि परिवार के साथ अब इस प्रकार के शो  देखना बिलकुल संभव नहीं है...क्या पता कब किस समय कौन सा प्रतियोगी...कौनसी नयी गाली नुमा गोली दाग दे....और हम आवाक सा मुंह लिए....रिमोट की तरफ लपकते नज़र आयें....जय हो बिग बॉस ! तुम्हें ही मुबारक...." तेरी माँ की यूथ " !!

(Tuesday October 09, 2012)


टोपियों की ओवरटेकिंग ~~~!!

अप्रेल 2011 को जब भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना का आन्दोलन आरम्भ हुआ तो जनता ने भरपूर समर्थन दिया..." मैं अन्ना हूँ " लिखी अन्ना टोपियाँ हर जगह नज़र आने लगी...लोग " मैं अन्ना हूँ " की टोपी पहन कर अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते थे... कई अनशनो और चरणों के बाद इसका अंतिम चरण केजरीवाल के आमरण अनशन और उसके बाद तेज़ी से घटित एक के बाद एक घटनाक्रमों ने अचानक से इस आन्दोलन की सार्थकता और अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगाना शुरू कर दिए !

अपने अंतिम चरण में केजरीवाल के असफल अनशन के पश्चात  अन्ना द्वारा  आन्दोलन ख़त्म करने और राजनितिक पार्टी बनाने की घोषणा करने के बाद से जो नया विवाद उठा है..अब थमने का नाम नहीं ले रहा, अन्ना से अलग होने तथा केजरीवाल द्वारा राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा के बाद..और दिल्ली में उनके धरने प्रदर्शन के दौरान एक नयी टोपी नज़र आयी...जिस पर लिखा था..." मैं अरविन्द हूँ " ..उस धरने प्रदर्शन में " मैं अन्ना हूँ " की टोपी गायब हो गयी थी... यहाँ तक कि टीम केजरीवाल के एक सदस्य ने जब जी.टी.वी. के संवाददाता के सामने " मैं अन्ना हूँ " की टोपी पहने कुछ कहने की कोशिश की तो...दूसरे सदस्य ने उसकी मैं अन्ना हूँ " की टोपी उतारने का इशारा किया, और उसने झट से टोपी उतार कर जेब में रख ली....!

इस समय अन्ना समर्थकों के लिए बड़े ही असमंजस की स्थिति है....क्योंकि " मैं अरविन्द हूँ " की टोपी ने " ...मैं अन्ना हूँ " की टोपी से ओवरटेक कर लिया है...और बड़ी ही तेज़ी से रेस में आगे निकलने की कशमकश जारी है...इसी कशमकश को सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी बड़े ही विचित्र और हास्यास्पद ढंग से देखा जा रहा है, अन्ना समर्थक कभी तो प्रोफाइल में अन्ना का फोटो लगाते हैं, कभी केजरीवाल का....ओवरटेकिंग के हिसाब से फोटो अपना स्थान लेते रहते हैं... लगता है कि अन्ना समर्थक अपनी एक जेब में " मैं अरविन्द हूँ " की टोपी रखते हैं...और दूसरी जेब में " मैं अन्ना हूँ " की टोपी...जैसा मौसम वैसी टोपी...!

मगर अब एक नयी टोपी भी 2 अक्टूबर को केजरीवाल की घोषणा सभा में नज़र आयी है...और यह टोपी दोधारी है...यानी इसके एक और लिखा है..." मैं जनलोकपाल हूँ " और दूसरी और लिखा है..." मैं आम आदमी हूँ  " ..यानी इस नयी टोपी ने पिछली दोनों टोपियों को भी ओवरटेक कर लिया है..अब यह अन्ना समर्थकों के लिए एक नया सर दर्द हो गया कि कि इस तीसरी टोपी को कौनसी जेब में रखें...दो टोपियाँ पहले से ही उनकी जेब में पड़ी हैं....यही नहीं अब तो बेचारा आम आदमी भी इस नयी दोधारी टोपी को देख कर परेशान है..उसे समझ नहीं आ रहा है कि केजरीवाल ने आम आदमी की टोपी पहनी है...या उसने आम आदमी को टोपी पहना दी है....क्योंकि जिस आन्दोलन के लिए आम आदमी अपने घरों से निकल कर सड़कों पर सैलाब की शक्ल में समर्थन देने निकला था...वो आन्दोलन इन टोपियों की ओवर टेकिंग में कहीं पीछे ...बहुत पीछे छूटता नज़र आ रहा है...!!

(Wednesday October 03, 2012)

देश को चाहिए एक आक्रामक भारतीय साइबर आर्मी~~~!!

पिछले दिनों...बिना एक भी गोली चले, लाठी चले, कई राज्यों में अफरा तफरी और भगदड़ का नज़ारा देखने और पढने को मिला...पूर्वोत्तर राज्यों के हजारों लोग आतंक और डर के मारे अपने काम धंधे, पढ़ाई और नौकरियां छोड़ कर पलायन कर गए.... इसके मूल में सीमा पार से की गयी साइबर खुराफात थी...सूचना क्रांति के इस दौर में Cyber Intelligence के मामले में हमारा देश अभी अन्य देशों से काफी पीछे है. पडोसी देश पाकिस्तान और चीन यदि साइबर हमले या खुराफात करते हैं तो इससे निबटने के लिए कोई ठोस कार्य योजना अभी देश में नहीं है...केवल सोशल साइट्स को  हड़काने या रोक लगाने के !
भारत में जिस तेजी से इंटरनेट लोकप्रिय हो रहा है उस तेजी से देश में साइबर सुरक्षा तकनीक  विकसित नहीं हो रही है जहाँ देश में लोग और खासकर युवा पीढ़ी बहुत तेज़ी से सोशल नेटवर्किंग साइट्स की और आकर्षित हो रही है, वहीँ देश के दुश्मन भी इन सोशल साइट्स को हथियार बना कर देश की सुरक्षा में सेंध आसानी से लगा रहे हैं, पिछले दिनों हुयी घटनाएं इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, कई बार सुनने और पढने को मिला है  की चीनी हेकरों ने फलाँ फलाँ विभाग की वेब साइट्स को हेक कर लिया,   देश में साइबर निगरानी या इस प्रकार के साइबर अपराधों की निगरानी, दण्डित करने  या रोकथाम के लिए कोई विशेष कार्य दल नहीं है, इस प्रकार के साइबर हमलों का जवाब देना तो दूर की बात है,  बचने के तरीके ही नहीं है,  जहाँ एक और चीन में साइबर आर्मियाँ बनी हुई हैं...वहीँ दूसरी और उसने अपना एक साइबर बेस हेडक्वॉर्टर भी शुरू कर दिया है, जिसका कार्य हर तरह के साइबर खतरों और इससे जुड़े मुद्दों से निबटना है !

कहा जा रहा है कि नए ज़माने की लड़ाई अप्रत्यक्ष रूप से यानी साइबर स्पेस में लड़ी जानी है....जिसमें बिना किसी हथियार के ही किसी देश के सुरक्षा तंत्र, संचार, उर्जा और सैन्य क्षेत्रों को तहस नहस कर दिया जाएगा.... सूचना क्रांति के इस दौर में  जब सब कुछ इंटरनेट और संचार नेटवर्कों पर निर्भर हो गया है, अपने साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर को सुरक्षित रखना और साइबर हमलों को रोकना राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में शुमार होना चाहिए !

भारत पर लगातार कई बड़े  साइबर हमले हुए  हैं और ऐसे समय में हमें अपनी एक आक्रामक भारतीय साइबर आर्मी की जरूरत है.. सॉफ्टवेयर क्षेत्र में तेज़ी से बढ़ते युवा और  कुशल सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की इतनी बड़ी आबादी होने से हमारा देश  दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले ज्यादा बड़ी और बेहतर आक्रामक साइबर आर्मी तैयार करने में सक्षम है, अभी भी समय है, Cyber Intelligence और देश के साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर को मज़बूत बनाया जाए, और कुशल सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को लेकर एक सशक्त और आक्रामक भारतीय साइबर आर्मी बनाई जाए..जो न केवल साइबर हमलों को रोकने में सक्षम हो बल्कि उन साइबर हमलों का मुंह तोड़ जवाब भी दे सके....तभी हमारा देश भविष्य में साइबर स्पेस में गर्व और शान से अपना झंडा फहराएगा....!!
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Friday August 24, 2012)

आवाज़ दो हम एक हैं~~~~!!

सूचना क्रांति के इस दौर में....सोशल साइट्स को कुछ कुत्सित मानसिकता के लोगों ने घृणा, नफरत और देश को तोड़ने का जरिया बना लिया है...पिछले दिनों पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के बीच एकदम से अफवाहें फैली हैं... और इन अफवाहों से घबरा कर यह लोग कुछ राज्यों से भारी संख्या में पलायन कर रहे हैं ... इन अफवाहों के पीछे जो भी हैं...उनका पता लगाना इस सूचना क्रांति के दौर में कोई मुश्किल काम नहीं है...रही बात...किसी संगठन की..तो वो जो कोई भी है...देश को अराजकता, उपद्रव और दंगों में झोंकना चाहता है....यह देश के दुश्मन है...दंगों में मरे इंसानों और दंगों के गर्म तवे पर रोटियां  सेंक कर खुश होने वाले देश के दुश्मन ही हैं ! दंगों में न हिन्दू ,मुस्लिम, सिख या इसाई नहीं मरता.....बल्कि एक आम इंसान मरता है....एक हिन्दुस्तानी मरता है...और उसके मरने के बाद उसके परिवार पर भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कहर टूटता है...!

इन सब देश विरोधी और देश के विघटन के लिए उतावली शक्तियों के खिलाफ हम सब एकजुट होकर मुकाबला करेंगे....आप और हम सब मिलकर ...फेसबुक, ट्वीटर, ब्लोग्स....हर जगह...बेंगलोर,केरल, महाराष्ट्र तथा अन्य राज्यों से पलायन करने  वाले पूर्वोत्तर राज्यों के भाई बहनों को असलियत से आगाह करेंगे.....और इस चाल को नाकाम कर के ही रहेंगे...हमारा देश और लोकतंत्र अभी इतना कमज़ोर नहीं हुआ है...कि ऐसी मुठ्ठी भर कुटिल लोगों की भीड़ से हिल जाए...अभी इस देश में समझदार लोग बहुमत में हैं....इसी लिए हमेशा ही इन विघटनकारी शक्तियों को मुंह की खानी पड़ती है....और भविष्य में भी आप और हम मिलकर इन विघटनकारी शक्तियों को मात देते रहेंगे......आवाज़ दो हम एक हैं......जय हिंद...!!

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Saturday August 18, 2012)

अपनी अपनी अगस्त क्रान्ति~~~!!

कल हमारे शहर में जोर जोर से जोशीले नारे लगाते कुछ भक्त टाइप भीड़ पर नज़र पड़ी...वो इन्कलाब जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे...और कुछ नेता टाइप लोग इनको टेम्पू में ठूंस रहे थे....ठूंसे जाने के दौरान भी नारे बदस्तूर जारी थे....कौतूहल वश मैंने एक भक्त को ठूंसे जाने से पहले ही लपक लिया...एक तरफ ले जाकर पहले तो उसका नारा बाहर आने से रोका...फिर पूछा भाई माजरा क्या है.....? यह कौनसा इन्कलाब है...जो जिंदा होने जा रहा है ? वो बोला आपको पता नहीं....हम अगस्त क्रान्ति में दिल्ली जा रहे हैं.....? मैंने कहा अगस्त क्रान्ति में तो मैं भी कई बार जा चुका हूँ....मगर इसमें नारे लगाने वाली क्या बात है....? वो भक्त बोला....क्या इससे पहले भी अगस्त क्रान्ति हुई थी.....? अब चौंकने की बारी मेरी थी ...मैंने कहा ...हुई थी .....से क्या मतलब.....?

वो भक्त बोला.....9 अगस्त को रामलीला मैदान में अगस्त क्रान्ति होने वाली है...हम उसमें जा रहे हैं....आप किस अगस्त क्रांति की बात कर रहे हैं.....? मैंने कहा...अरे भाई....वही ट्रेन....जिसका नंबर 12953 है....अगस्त क्रान्ति...जो मुंबई से चलकर हज़रात निजामुद्दीन तक जाती है.....हमारे शहर कोटा में रोज़ सवेरे 5 :15 बजे आकर रूकती है...और 5 : 25 बजे निजामुद्दीन के लिए रवाना हो जाती है, उस अगस्त क्रांति में तो मैं ही नहीं लगभग सारे शहर के बहुत से लोग जा चुके हैं...!

सुनकर उस भक्त ने मुझे तुच्छ नज़रों से देखा....और कहा....हम 9 अगस्त को इन्कलाब लाकर ही रहेंगे...क्रान्ति होकर रहेगी.....मैंने कहा भाई....एक जनलोकपाल क्रान्ति ने तो 2 अगस्त को जंतर मंतर पर शर्मनाक ढंग से दम तोड़ दिया....धूमधाम से उस क्रान्ति की शवयात्रा भी निकली थी...वहां भी आप जैसे हज़ारों भक्तों का जमावड़ा था क्या आपको पता नहीं....? वो भक्त बोला ...साहब ...लोग बातें तो कर रहे थे...कि जनता के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है....जूस पीकर धोखा दिया है...खुद ही नेता बनने चले गए हैं ! फिर वो बोला ...मगर हमारी अगस्त क्रान्ति...बहुत ज़ोरदार है.....मैंने कहा कैसे...? वो बोला....बाबा गुरु ने कहा है....कि देश का खरबों रुपयों का काला धन ...विदेशी बेंकों में जमा है....वो उसको मंगवाएंगे....और सारा पैसा..जनता में बटवाने की योजना है...उन्होंने कहा है कि देश का हर गरीब...लखपति हो जाएगा.....गेस सिलेंडर 200 रूपये का हो जाएगा, पेट्रोल 35 रूपये लीटर हो जायेगा, डालें 10 रूपये किलो हो जाएँगी...बिजली 1 रूपये यूनिट हो जाएगी और तो और सारा विदेशी कर्जा भी चुक जाएगा....और देश मालामाल हो जाएगा....साहब.... बाबा गुरु ने इसी लिए बुलाया है....हम भी लखपति हो जायेगे...सारी गरीबी दूर हो जाएगी ! फिर उसने एक ज़ोरदार नारा लगाया....इन्कलाब जिंदाबाद !! और टेम्पू में जा बैठा.....! अब मुझे उसकी बातें सुनकर हैरानी के बजाय अफ़सोस होने लगा था, उसके सीधेपन पर तरस आने लगा था...वो क्या जाने...काला - सफ़ेद धन,..... मगर सपनों के दोहन की परंपरा का शिकार तो हो ही गया...!


अब मैं उसको कैसे बताता कि  ट्रेन नंबर 12953 है....अगस्त क्रान्ति ..के  चालक और परिचालक दोनों ही योग्य, अनुभवी, कुशल, शैक्षिक और शारीरिक परीक्षा पास किये हुए तथा चालक का प्रमाण पत्र लिए हुए हैं...यह रोज़ ईमानदारी से निष्ठां से अगस्त क्रांति का सञ्चालन करते हैं, अपने सभी यात्रियों को सकुशल उनके लक्ष्य तक पहुंचाते हैं....यह लोग कभी चलती अगस्त क्रांति  ट्रेन से कूद कर नहीं भागे...और यह भक्त जिस  अगस्त क्रान्ति में जा रहा है....उस का परिचालक तो पहले ही प्रमाण पत्र के चक्कर में  सरकारी मेहमान बना हुआ है....और चालक महोदय की  शैक्षणिक, शारीरिक, योग्यता....अगस्त क्रान्ति के लिए...अनुभव, कौशल है भी या नहीं.....और चालक का प्रमाणपत्र है भी...या नहीं....यदि है...तो कहीं परिचालक जैसा तो नहीं..... क्योंकि यह क्रांति चालक महोदय पहले भी एक ऐसी ही यात्रियों से ठसाठस भरी क्रांति ट्रेन को रेड लाईट दिखाते ही चलते में उतर लिए थे...जिसके कारण एक निर्दोष यात्री की बाद में दुखद मृत्यु हो गयी थी.....खैर.....यदि यह बात उस भक्त को बताएं भी तो शायद वो विश्वास नहीं करेगा.....!


मैं हैरान उस बेचारे भक्त/समर्थक को देखता रहा और सोचता रहा....कि ऐसे लोग ....कब तक किस किस के औज़ार बनते रहेंगे....यह बेचारे किसी की दिखाई हुई एक मृगतृष्णा, दिखाए सपनो के पीछे अनवरत भागे जा रहे हैं.....और इनकी दुखती रगों पर हाथ रखकर ...इनके समर्थन का अपने हित में निवेश  करने वाले....अपना मकसद पूरा कर निकल लेते हैं....और ऐसे भक्त/समर्थक  .....फिर से चौराहे पर आ खड़े होते हैं.....फिर से किसी मसीहा की महत्वकांक्षा का औज़ार बनने....! यदि टीम अन्ना की तरह इस बार यह अगस्त क्रांति भी पटरी से उतर गयी...तो शायद देश की जनता इन मसीहाओं को कभी माफ़ नहीं करेगी....इन्कलाब जिंदाबाद के नारों से नफरत करने लगेगी...फिर भविष्य में किसी भी अन्ना या बाबा की पुकार पर कोई अपने घरों से बाहर नहीं निकलेगा......!! अगस्त क्रांति सकुशल ...अपने गंतव्य, अपने लक्ष्य  तक पहुंचे...इसी शुभकामनाओं के साथ.....!!
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Thursday August 09, 2012)

एक जन आन्दोलन की शर्मनाक मौत~~~!!

अन्ना ने अप्रेल 2011 को जब इस आन्दोलन का बिगुल बजाया ...तो अपार समर्थन मिली...और इस सफलता के मद में चूर हो कर सबसे पहले...टीम अन्ना ने IAC के founder member बाबा रामदेव को बाहर का रास्ता दिखा दिया...यह उनकी पहली गलती थी....दूसरी गलती ...हिसार में केजरीवाल का खुलकर कांग्रेस के खिलाफ बडबोला पन...भी सभी को पता है..और  यूं.पी चुनावों में अन्ना फेक्टर का फेल होना....फिर तो बाद के आन्दोलनों में  ऐसा लगने लगा कि यह आन्दोलन अन्ना का नहीं होकर ...केजरीवाल का है...जो अपने राजनैतिक महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं....और इसकी झलक...कोर कमिटी से लगातार निकाले गए पुराने सदस्य...( स्वामी अग्निवेश को छोड़कर) के रूप में नज़र आने लगी...जो भी केजरीवाल के आड़े आया...उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया...यह गलती भी आन्दोलन को पलीता लगाने में सहायक हुई....!

25 अगस्त को टीम अन्ना ने जनलोकपाल पर " आर-पार " की घोषणा के साथ जंतर मंतर पर डेरा जमा लिया...और उनके पुराने अंदाज़...कविताएं, भजन, और सरकार को कोसने का खेल शुरू हो गया....इस बार जनलोकपाल के बजाय...14 दागी मंत्रियों के खिलाफ SIT पर जोर रहा....सरकार ने इस बार इन को इन कि असली हैसियत बताने की शायद ठान ही ली थी.....सो कोई  खैर खबर नहीं ली गयी.  दूसरी बात सेनापति केजरीवाल ने भी अनशन की घोषणा कर डाली...और बैठ गए.....मगर तीन चार दिन बाद ही हालत बिगड़ी......तो भर्ती होने से इनकार भी किया ...और साथ में ही यह भी चाहा कि कहीं मर न जाए....यानी बलिदान देने से भी परहेज़.....यानी वो निगमानंद नहीं बनना चाहते थे....और साथ में यह भी चाहते थे कि...जनता उनको मसीहा माने.....सो तय हुआ कि...23 गणमान्य व्यक्तियों के प्रायोजित पत्र को लेकर..इस बार श्री श्री ..की जगह अनुपम खेर साहब पधारे  और .अनशन तुडवाने की मनुहार का ड्रामा किया ...और वही हुआ.....अचानक से ही 3 अगस्त को शाम 5 बजे अनशन तोड़ने की घोषणा और खुद का राजनैतिक दल बनाने की घोषणा के बाद यह घोषणा हुई कि अब जनता दो दिन में हमें राय दे कि हम क्या राजनीति में आये....या नहीं.....? यानी आज़ादी की दूसरी लड़ाई के नाटक का अफसोसनाक पटाक्षेप....फिर तीसरी लड़ाई के लिए कौन निकलेगा.....?

यानी जैसा कि देश के काफी प्रबुद्ध गण पहले से ही उम्मीद कर रहे थे....वही हुआ...टीम अन्ना  का राजनैतिक एजेंडा सामने आ ही गया...यदि यह आन्दोलन तीन दिन और खींच लिया जाता तो नक्शा ही दूसरा होता...मगर   बलिदान कौन करे....? सो तय यह हुआ कि ...इस आन्दोलन की बलि दे दी जाए....जो कि पहले से ही तय था...कह सकते हैं कि जनलोकपाल....वो सीढ़ी थी....जिसकी बदौलत टीम अन्ना ने अपने राजनैतिक निवेश को मज़बूत किया....और अपनी  राजनैतिक महत्वकांक्षा को पूरा किया...!


टीम अन्ना के सदस्यों ने ...विशेषकर...केजरीवाल, कुमार विश्वास, मनीष सिसोदिया और किरण बेदी ने ...इस आन्दोलन से जुड़े करोडो लोगो की भावनाओं से खिलवाड़ किया गया है, ठगा है...मूर्ख बनाया गया है.....टीम अन्ना के सदस्यों ने न केवल जनता को बेवकूफ बनाया है...बल्कि अन्ना को भी इस्तेमाल किया है...अँधेरे में रखा है......और अपने शब्द उनके मूँह से कहलवाए हैं...  अब यह लोग केजरीवाल को बचाने के लिए...जनता को SMS पोल ...यानी अपनी राय के झुनझुने में उलझाये हैं....कि हम यह करें या वो करें....? करना इनको वही है....जो यह ठाने हुए हैं...यानी अपनी राजनैतिक पार्टी बनाना., इन लोगों ने न केवल एक जन आन्दोलन को बहुत  शर्मनाक मौत दी है...बल्कि  भविष्य में होने वाले आंदोलनों का मार्ग भी कहीं न कहीं अवरुद्ध किया है...!!
Friday August 03, 2012

शनिवार, 2 मार्च 2013

भीड़ ही क्यों....समर्थक क्यों नहीं...??

अन्ना के जनलोकपाल आन्दोलन का एक और चरण पूर्व निर्धारित कार्र्यक्रम नियमित योजना  और साइबर तैय्यारियों के साथ उनके प्रिय जंतर मंतर पर 25 जुलाई से आरम्भ हुआ ...मगर दूसरे दिन ही बदहवासी फैल गयी, कारण रहा कम भीड़ का...न्यूज़ चेनलों ने लगातार कवरेज किये...और अन्ना के अनशन के हर पहलू को लगातार दिखाया, टीम अन्ना भी कम भीड़ के कारण उपस्थित कम भीड़ से यही विनती करती नज़र आयी कि भीड़ और बढ़नी चाहिए...टीम अन्ना कम भीड़ से हमेशा ही आतंकित नज़र आयी है...MMRDA मैदान मुंबई में भी यही हुआ था...कम भीड़ से आतंकित होकर टीम अन्ना ने अपना अनशन तुरत फुरत समाप्त करने की घोषण कर डाली थी...कारण बताया गया था...अन्ना की खराब तबियत !

यहाँ प्रश्न यह उठता है कि किसी आन्दोलन को शक्ति देने के लिए क्या भीड़ की आवश्यकता होती है...या उस आन्दोलन के मुद्दों पर जुटे समर्थकों की...? साफ़ नज़र आ रहा है कि अन्ना आन्दोलन के समर्थक कम होते जा रहे हैं...फेसबुक पर IAC ग्रुप की यदि बात की जाए तो वहां चाहे लोखों लोग रोज़ समर्थन में नारे लगाते हों मगर..वास्तविक धरातल तो फेसबुक से बाहर है...इसके लिए घरों से निकल कर अपना समर्थन देना होता है ! कहते हैं भीड़ का कोई मस्तिष्क नहीं होता....परन्तु ऐसा लगता है....कि  भीड़ ही टीम अन्ना का मस्तिष्क है... भीड़ कम होते ही...टीम अन्ना की सोचने कि शक्ति ख़त्म सी नज़र आने लगती है...टीम अन्ना बार बार भीड़ के लिए विनती करती क्यों नज़र आ रही है ? मुंबई में भी एक बार कम भीड़ के कारण केजरीवाल ने लोगों ( भीड़ ) से सवाल किया था कि अब क्या किया जाए...?

इसमें टीम अन्ना की कहीं न कहीं गलती है...बार बार किश्तों में अनशन करने से लोगों का मोह भंग हुआ है...और दूसरी और अन्ना के अनशन को अब राजनैतिक भी कहा जाने लगा है...विशेष रूप से अरविन्द केजरीवाल के बडबोलेपन ने भी अन्ना के आन्दोलन को नुकसान ही पहुँचाया है...फायदा नहीं, कहीं न कहीं आधार कमज़ोर हुआ है...यही कारण है कि अन्ना आन्दोलन के समर्थक गायब होते जा रहे हैं.....और सिर्फ भीड़ रह गयी है...वो भी कम...! भीड़ का क्या है...कहीं भी इकठ्ठी हो जाती है...एक्सीडेंट हो तो, मदारी का तमाशा हो तो, कोई भाषण दे रहा हो तो, कोई पोस्टर पढने को , .कहने का तात्पर्य यह है कि भीड़ सिर्फ तमाशा देखने के लिए होती है....तमाशा देख कर घर जा कर भूल जाती है.....! यहाँ अन्ना आन्दोलन को ज़रुरत है...समर्थकों कि न कि भीड़ कि...और समर्थक कहाँ हैं...? टीम अन्ना जाने....तब तक भीड़ से काम चलाइये....शायद काम बन जाए....!!
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Friday July 27, 2012)

ईमानदारी मुस्कुराई और कहा " मैं जिंदा हूँ अभी " !!

यह एक सत्य घटना है जी खुद मेरे साथ हुई थी.....जून'2012 में पत्नी, बिटिया और चचेरे भाई के साथ...अपनी कार लेकर जयपुर, आगरा, मथुरा और अलीगढ़ के लिए निकले थे....कुछ काम भी था...और छुट्टियाँ भी .....घूमे फिरे....खूब फोटोग्राफी की  और वीडियो आदि भी बनाये....वापसी में जयपुर पहुँचते पहुँचते रात हो गयी थी...भाई ने कहा कि जयपुर से कुछ और खरीदारी कर लो..बिटिया के लिए !...long drive करने के बाद भी अनमने मन से कार को जयपुर के सांगानेरी गेट की पार्किंग में..लगा कर...पास के बाज़ारों में खरीदारी कर...एक घंटे में वापस लौट कर भाई के जयपुर वाले घर आ गए....फ्रेश हो कर...बिटिया ने कहा कि कैमरा निकाल कर फोटो देखते हैं....कैमरा ढूंडा मगर कहीं नहीं मिला...सारा सामान उलट पुलट कर दिया...कार की दो तीन बार तलाशी ली गयी....मगर कैमरा नहीं मिलना था...नहीं मिला....दस हज़ार का digital camera और साथ में...आते समय मैंने 4 GB का मेमोरी कार्ड डाला था...ताकि ज्यादा फ़ोटोज़ और वीडियोज आ जाएँ....और सब से बढ़कर...हमारे यादगार फ़ोटोज़ और वीडियोज...सब कुछ...गायब. हम सब के होश गुम हो गए...आखिरी समय में वो कैमरा बिटिया के हाथ में था...मगर उसको पता ही नहीं कि उसने कहाँ रखा...!

भाई से मैंने कहा कि पार्किंग वाले से जाकर पूछो...कार से उतरते चढ़ते...गिरा हो...तो शायद उसने उठा लिया हो.....भाई जल्दी से बाइक लेकर दौड़ा...वापसी भी मायूसी वाली हुई....आखरी बार उसने कहा कि एक बार में और कार में देखता हूँ....वो टार्च लेकर नीचे गया....और जब वापस आया तो उसके हाथ में कैमरा...देख कर सब हैरान रह गए.....हमारी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा....मैंने पूछा तो उसने कहा कि नीचे पड़ोस का एक छोटा बच्चा घर में घुसने की बार बार कोशिश कर रहा था..मैंने दो बार तो उसको भगा दिया...तीसरी बार जब वो आया तो भाई ने उससे पूछा कि क्या बात है...कहाँ जा रहे हो...तो उसने बताया कि...यह कैमरा मुझे आपकी कार के नीचे पड़ा मिला है....(शायद वो कैमरा कार से उतरते समय बिटिया की गोद में से नीचे गिर गया होगा जो कि हमको दिखाई नहीं दिया) वो लौटने आ रहा हूँ...आप मुझे बात सुने बिना भगा रहे हो...यह देख कर वो हैरान रह गया....!

भाई ने जब ऊपर आकर मुझे यह घटना सुनाई तो मैंने पूछा कि वो बच्चा कहा है...तो उसने कहा कि वो तो कैमरा दे कर चला गया...मैंने जल्दी जेब में हाथ डाला और जितने रूपये हाथ आये  भाई को दिए ....और बिटिया के लिए खरीदे इम्पोर्टेड चाकलेट में से दो चाकलेट देते हुए कहा कि यह उसको फ़ौरन जा कर देकर आओ...उस बच्चे ने ईमानदारी की एक मिसाल पेश की है....इतने छोटे बच्चे में यह जज्बा देख कर दिल खुश हुआ....ऐसी मिसालें देखने और सुनने को बहुत ही कम मिलती हैं..आज के दौर में....यह अचम्भा ही है...ऐसे में उसको और उसके जज्बे को प्रोत्साहित करना बहुत ज़रूरी है.... एक लम्हे के लिए बहुत से ख्याल मेरे सामने आये....काश ऐसी ईमानदारी हर कोई अपनाये...हर कोई उस बच्चे जैसा निर्मल और ईमानदार हो जाए...तो समाज और देश के हित में कितना अच्छा हो ....आज भी जब मैं अपना वो कैमरा हाथ में लेता हूँ....तो उस बच्चे की ज़रूर याद आती है.....मेरे लिए आज यह कैमरा....उस बच्चे की तरफ से दिया एक बेहतरीन तोहफा ही तो है.....उस दिन को मैं कभी नहीं भूल सकता.....उस दिन .....कैमरा हाथ में आने ....और पूरी घटना सुनने के बाद ऐसा लगा था...जैसे....ईमानदारी मुस्कुराई हो...और उसने हौले से कहा हो....." मैं जिंदा हूँ अभी "......!!

I P L बोले तो~~~~~~!!

पहले क्रिकेट को देश के गौरव, आत्म सम्मान और देश प्रेम से जोड़ा गया....फिर इस खेल को वन डे, T - 20 और I.P.L. के रूप में तोडा मरोड़ा गया...फिर इसमें ग्लेमर घुसेड़ा गया..फिर तो  यह एक नशा सा बन गया...भारत के पारंपरिक खेलों को कुचलता यह खेल ...देश के राष्ट्रिय खेल हाकी से भी बड़ा, सम्माननीय  और गौरव शाली का दर्जा पाता गया , तब जब यह क्रिकेटिया नशा भारतियों की नसों में ढंग से इंजेक्ट हो गया ..लोग इस नशे के आदि हो गए .. तो क्रिकेट खेलने की जगह एक प्रोडक्ट की तरह बेचने का दौर जो चला तो सब हदें पार हो गयीं....! देश में क्रिकेट को मल्टी नेशनल कंपनियों, स्पांसरों, और कारपोरेट घरानों ने एक PRODUCT के रूप में परिवर्तित कर दिया...और अब उसकी जमकर मार्केटिंग और मुनाफाखोरी हो रही है...!

मैदान में बीयर पान, घूम्रपान, कन्याओं (चीयर लीडर्स) का अर्ध नग्न नाच, फिक्सिंग, पार्टियाँ, मार पीट, छेड़ छड...काला धन....बिकते खिलाड़ी...बहकते खिलाड़ी...गलियाते टीम मालिक...गुर्राते BCCI अधिकारी.....लाचार खेल मंत्रालय....! खिलाड़ी...खुशहाल , टीम मालिक...मालामाल..., BCCI कहे  कि .सब की ठन ठन गोपाल , ...ठगा गया और घाटे में रहा तो आम क्रिकेट प्रेमी......!

जय हो तुम्हारी ललित मोदी...क्या चस्का लगाया है...अफीम की तरह क्रिकेट को पिला डाला....
IPL की ही बदौल अरबों रूपये डकार कर भी लन्दन में ऐश कर रहे हो......कानून की पकड़ से दूर !..क्रिकेट संघों में जब तक नेताओं, अभिनेताओं, और कारपोरेट घरानों का दखल रहेगा...यह ऐसे ही बिकता रहेगा...इसको रोकने के लिए...क्रिकेट संघों में ज्यादा से ज्यादा पूर्व खिलाड़ियों को शामिल करना होगा.....BCCI पर सरकारी नियंत्रण होना चाहिए...मगर ...यह सब बहुत मुश्किल लग रहा है...क्योंकि BCCI जैसे दैत्य अब बहुत ही विकराल हो चुके हैं.....देश के कानून की पहुँच से भी बाहर..RTI से भी बाहर  ! BCCI को फेमा तथा इनकम टेक्स के 19 के लगभग नोटिस दिए जा चुके हैं...जो कि शायद BCCI की किसी रद्दी की टोकरी की शोभा बढ़ा रहे होंगे, यह वही BCCI है जिसे सरकार की और से 10 सालों में 19 अरब रुपये की छूट  हासिल हो चुकी है...! आज मुझे न जाने क्यों.....यूगांडा के पूर्व सैनिक तानाशाह स्व. ईदी अमीन की अचानक याद हो आयी जिसने यूगांडा की राष्ट्रिय फुटबाल टीम को हार कर आने पर कोड़ों की सजा सुनाई थी...और एक माह खेतों में काम करने गाँव भेज दिया था.....यह बात याद तो आयी मगर...क्यों....क्या पता....??

एक आइकोनिक फोटो के पीछे की मार्मिक कहानी ~~~!!

सूडान में एक कुपोषित बच्ची के मरने के इंतज़ार में उसके पास बैठा एक गिद्ध.....!! इस फोटो को सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर न जाने कितनी बार लाखों ..करोड़ों लोगों द्वारा  शेयर किया गया है, करोड़ों लोगों ने इसको टेग किया है...मगर क्या इसके पीछे की मार्मिक कहानी किसी को पता है....? इस फोटो को खींचने वाले फोटोग्राफर ने तीन माह बाद पश्चाताप  में आत्म हत्या कर ली थी...!


यह फोटो मार्च 1993 में मशहूर फोटोग्राफर केविन कार्टर ने भुखमरी और कुपोषण से झूझते देश सूडान के एक गांव आयोद में खींचा था...यह एक सूडानी कुपोषित बच्ची का फोटो है...जो कि अपने माता पिता की झोंपड़ी की और रेंग कर जाने का प्रयत्न कर रही है....माता पिता..खाना ढूँढने जंगल गए हुए हैं....भूख ने उस बच्ची को बेदम कर रखा है...उसकी ताक में एक गिद्ध बैठा है...जो कि उसके मरने का इंतज़ार कर रहा है...केविन कार्टर ने इस दृश्य को देखा ...और अपने कैमरे में क़ैद कर लिया....और उस गिद्ध को वहां से उड़ा दिया ! वैसे इस फोटो के अलावा इथोपिया के इस संकट के उन्होंने और भी कई फोटो खींचे थे...मगर यह फोटो उनको विशेष लगा.....!

वापस आकर केविन कार्टर ने इस फोटो को New York Times को बेच दिया...यह फोटो पहली बार  March 26, 1993 को New York Times में प्रकाशित हुआ था....फोटो का केप्शन था..." metaphor for Africa’s despair "....केविन कार्टर को इस फोटो के लिए प्रतिष्टित पुलित्जर पुरस्कार मिला.... फोटो के प्रकाशित होते ही हज़ारों लाखों लोगों ने केविन कार्टर से इस अफ़्रीकी बच्ची के बारे में हज़ारों सवाल किये...कईयों ने उस पर यह आरोप भी लगाए कि उसने उस समय फोटो खींचना ज्यादा उचित समझा...बामुकाबले...उस हुए बच्चे बच्ची को बचाने के...., वह लोग यह नहीं जानते थे कि उस समय सूडान और इथोपिया में संक्रमित बीमारियाँ फैली थी...और पत्रकारों और फोटोग्राफरों को घायल और दम तोड़ते सूडानी और इथोपियाई लोगों से दूर रहने का आदेश U.N . द्वारा दिया गया था...यही कारण था कि केविन कार्टर उस बच्ची को उठा न पाए....!

केविन कार्टर उस प्रतिष्टित पुलित्जर पुरस्कार का आनंद बिलकुल नहीं ले पाए...उनको हमेशा उस अफ़्रीकी बच्ची की याद आती रही...लोगों के सवाल और उलाहने उनको परेशान करते रहे....उनको यह ग्लानी और अपराध बोध सताता रहा कि उन्होंने उस बच्ची को बचाने की पूरी कोशिश नहीं की....और न ही यह देख पाए कि वो ज़िंदा रही या मर गयी ..इसी अपराध बोध और ग्लानी में वो एकाकी हो गए....और इस फोटो के New York Times में प्रकाशित होने के तीन महीने बाद  उस महान फोटोग्राफर ने जवानी में ही आत्म हत्या कर अपना जीवन समाप्त कर लिया.....! आज भी जब यह फोटो कहीं मेरी नज़र से गुज़रता है...तो मुझे इस आइकोनिक फोटो के पीछे की मार्मिक कहानी...और उस  काबिल फोटोग्राफर के दुखद अंत  की याद हो आती है...!!

फेस्बुकिया फीचर्स और हमारी ज़िन्दगी~~!!

कभी कभी तो लगता है कि ज़िन्दगी और फेसबुक दोनों में कोई फर्क ही नहीं है....कई फेस्बुकिया फीचर्स  हमारे जीवन में भी नज़र आते हैं...अपनी ज़िन्दगी में जब कोई समस्या या दुःख का स्टेटस उपडेट हो जाता है...तो काफी मित्र...और सगे सम्बन्धी...या तो चुपचाप से सरसरी नज़र मारकर बच कर निकल जाते हैं...और दोबारा आपके दुखी प्रोफाइल पर विजिट ही नहीं करते.... कुछ दोस्त और सम्बन्धी होते हैं...जो आपकी स्थिति को  " Like " कर के निकल जाते हैं...कुछ मित्र और नजदीकी जो कि मुरव्वत वाले होते हैं.....वो कुछ देर रुक कर आपकी स्थिति पर दुःख जताते हुए  फार्मल कमेन्ट भी करते हैं...और फिर निकल लेते हैं...मगर ...उस दुःख या समस्या के निराकरण के लिए कोई समाधान बताने देर तक आपके प्रोफाइल पर नहीं रुकता.....कारण साफ़ है...आज के इस दौर में सब यही सोचते नज़र आते हैं कि यदि लोग इन हुए हैं....तो फिर दूसरे के प्रोफाइल में क्यों समय खराब करें.....लोग इन का भरपूर उपयोग अपनी ज़िन्दगी के  प्रोफाइल...और अपने (सामजिक स्तर) स्टेटस के लिए क्यों नहीं करें...? उन सबको अपने अपने प्रोफाइल की चिंता लगी रहती है....उनको अपने अपने स्टेटस अपडेट जो करना होते हैं...! यहाँ हम समयाभाव का कह सकते हैं...जो कि जायज़ भी है...ज़िन्दगी में भी...और फेसबुक पर भी...दोनों जगह...यही मुख्य समस्या नज़र आती है...कई मित्र दोनों ही जगह यही शिकायत करते मिल जाते हैं...!


और कुछ फेस्बुकिया फीचर्स हमारे दैनिक जीवन में दिखाई दे जाते हैं...."POKE" को हे ले लीजिये.....बाज़ार में माल में..गार्डन में...कहीं भी कई बार कोई लड़की किसी लड़के को....और कई लड़के किसी लड़की को
"POKE" करते हुए मिल जायेंगे....और तो और कभी हम भी बन ठन कर अच्छा सा स्टेटस अपडेट show कर देते हैं...तो आज भी हम को सुंदरियों के एक दो "POKE" तो मिल ही जाते हैं, ..इसके अलावा....हम दैनिक जीवन में कई अवांछित लोगों को "BLOCK" भी करते हैं....और जिस से खुन्नस है...उसको "UN FRIEND" भी कर डालते हैं...! और अंत में सबसे विचित्र  फेस्बुकिया फीचर जो कि हमारे जीवन में आदि काल से चला आ रहा है...वो है..."SUBSCRIBER" ...जी हाँ...यह वो लोग होते हैं...जो ना तो आपके सम्बन्धी होते हैं...और न ही आपकी मित्र मंडली में होते हैं...मगर यह आपकी हर गतिविधि को बड़ी चतुराई से देखते...पढ़ते हैं...और आप इन से बेखबर होते हैं...यह आपके हर अपडेट को पूरे मोहल्ले में शेयर भी कर डालते हैं...TAG कर डालते हैं... यह आपके ...हमारे मोहल्ले और  पड़ोस में रहने वाली चुगलखोर आंटी की तरह ही तो होते हैं...! देखिये...आगे और क्या क्या नए फेस्बुकिया फीचर्स आते हैं...जो कि हमारे दैनिक जीवन में...कहीं न कहीं...एक जैसे प्रभाव रखते हों...!!

लोकतंत्र को जनलोकपाल का स्टेरायड इंजेक्शन~~~!!

कहते हैं कि लोकतंत्र जितना पुराना होता है..उतना ही परिपक्व और मज़बूत होता जाता है.....हमारा लोकतंत्र भी परिपक्व  है...विश्व में जाना माना है....मज़बूत है.....परन्तु इस लोकतंत्र को राजनैतिक दलों ने ....नेताओं ने, दलालों ने, पूँजी पतियों ने, गद्दारों ने, पाखंडियों ने, मुनाफा खोरों ने  इन बीते वर्षों में कई व्याधियां दी हैं...वैसे तो समय समय पर लोकतंत्र की इन व्याधियों को हरने और कम करने के कई समाज सेवियों ने भरपूर प्रयास किये...कई आन्दोलन चले...मगर जैसा कि कहा जाता है कि आंदोलनों से और जन सहभागिता से लोकतंत्र का शुद्धिकरण होता है...इस बार अन्ना हजारे और उनकी टीम और बाबा रामदेव  ...मिश्र के तहरीर चौक को भारत में जिंदा करने की जिद के रूप में...अपने जनलोकपाल आन्दोलन रुपी स्टेरायड के इंजेक्शन और काले धन रुपी टानिक को लेकर मैदान में कूदे हैं...और दावा करते हैं कि उनके इस स्टेरायड इंजेक्शन की बदौलत लोकतंत्र फिर से तगड़ा और हष्ट पुष्ट हो जाएगा...मगर उनके इस इंजेक्शन के स्टेरायड के कंटेंट में कुछ ऐसे तत्व हैं...जिन पर लोकतंत्र के रखवालों को ऐतराज़ है...जैसे कि लोकपाल के दायरे में प्रधान मंत्री को लाना, सी.बी.आई.को स्वतंत्र एजेंसी बना देना....आदि आदि, अन्ना अपने इंजेक्शन के कंटेंट पर अड़े हैं...और राजनैतिक पार्टियां अपनी जिद पर...!

दूसरी बात अन्ना को यह कोई समझाने वाला नहीं है कि आप जो इंजेक्शन लगा रहे हो...वो कोई जादुई नहीं है...इससे लोकतंत्र की सारी व्याधियां दूर नहीं होने वाली...भ्रष्टाचार के अलावा भी देश में कई गंभीर मुद्दे हैं...गरीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी, कुपोषण से मरते नवजातों की बढती संख्या...निरक्षरता...नक्सल समस्या...आतंकवाद, साम्प्रदायिकता...आदि इत्यादि....आपके इस एक जादुई इंजेक्शन से यह दूर होने वाली नहीं है.....और दूसरी बात यह कि जहाँ दोनों बड़े राजनैतिक दल आपके जन लोकपाल बिल रुपी स्टेरायड इंजेक्शन के कन्टेन्ट को सिरे से खारिज कर चुके हैं...तो फिर आप का यह इंजेक्शन लोकतंत्र को लग ही नहीं सकता...तो फिर आप इस को बार बार क्यों निकाल कर जनता को भ्रमित कर रहे हो...वैसे भी  दूसरी और आपकी टीम आपसे ज्यादा जनता को भ्रमित कर चुकी है... मेरे विचार से तो आप इस इंजेक्शन के कुछ कन्टेन्ट आपसी सहमती से कम कर करा कर इस को इंजेक्ट कर दें तो ठीक है...अन्यथा इसको अपने गाँव में कोई Museum   हो तो वहां रख दीजिये ! क्योंकि जब देश के दोनों बड़े राजनैतिक दल आपके इस जनलोकपाली इंजेक्शन के कन्टेन्ट पर राज़ी नहीं है...तो फिर इसका औचित्य ही क्या रहा...??

दूसरी और बाबा रामदेव भी इस लोकतंत्र को काला धन रुपी टानिक पिलाने पर उतारू हैं...वो पूरे देश में घूम घूम कर इस टानिक का प्रचार कर रहे हैं...उनका कहना है कि इस टानिक पीकर लोकतंत्र का हिमोग्लोबिन काफी बढ़ जाएगा...वो कहते हैं कि मैं काला धन वापस लाऊंगा...हर भारतीय को करोडपति बनाऊंगा....अब क्या जनता इतनी मूर्ख है कि बाबा की बातों पर विश्वास कर लेगी...? या फिर काला धन वाले इतने मूर्ख हैं कि इतना हल्ला होने पर भी अपना काला धन...विदेशी बेंको में केवल इसलिए रख छोड़ेंगे कि कब बाबा जी आयें.....और इसको भारत ले जाएँ....काला धन का टानिक केवल जनता को भ्रमित करने वाला है...! आज Globalization के दौर में....Swiss Banks के अलावा भी कई देश गुप चुप यह कार्य कर रहे हैं...कई tax heaven पैदा हो गए हैं...जहाँ काला धन खपाया जा सकता है....! यदि कभी ..काला धन जो कि लाख करोड़ में हैं...वापस भी आया तो सिर्फ करोड़ों में ही आएगा...जो की कुल जमा का 0 .1 % भी नहीं होगा....!!

कभी तो लगता है...कि इस लोकपाल के  इंजेक्शन.....और यह काले धन का टानिक से लोकतंत्र को फायदा हो न हो.....देश में इन इंजेक्शन और टानिक वालों का डिज़ाईनर प्रचार प्रसार और मार्केटिंग जम कर हो रही  है...और शायद यह चाहते भी यही हैं, ऐसा लगने लगा है कि .इस प्रचार और मार्केटिंग से उपजे उबाल को मथ कर कही यह अपना राजनैतिक निवेश तो नहीं कर रहे.....? कहीं यह इंजेक्शन और टानिक किसी राजनैतिक कंपनी के तो नहीं हैं.....? खैर...हम तो यही चाहते हैं...कि हमारे लोकतंत्र को अन्ना का यह जनलोकपाली इंजेक्शन आपसी सहमति से जल्दी लगे और बाबा जी का काले धन का टानिक भी बाबा जल्दी पिला कर हमारे लोकतंत्र का कुछ तो भला करें.....!!

बाबाओं का भी प्लेसिबो ( Placebo ) इफेक्ट ~~~~!!


प्लेसिबो ( Placebo ) एक लेटिन  शब्द है...जिसका अर्थ होता है..."I will please"  इसका सबसे पहले औषधीय प्रयोग 18 वीं शताब्दी में हुआ था....आधुनिक चिकित्सा पद्धति मे इसे Faith Healing  अर्थात यकीन आधारित उपचार का एक अंग माना गया है। मानसिक रोगो के उपचार मे भी इसका काफी उपयोग होता है। इसकी विस्तृत साइंटिफिक  व्याख्या बहुत लम्बी है...इस प्लेसिबो ट्रीटमेंट (यानि दवा रहित गोलियो या इसी तरह का उपचार) का प्रयोग आधुनिक शोधो मे भी होता है। आधुनिक चिकित्सा पद्ध्तियो मे ऐसी गोलियाँ सफलतापूर्वक उपयोग की जा रही है। यह बहुत ही हैरत की बात है कि कैसे बिना दवा के रोगी ठीक हो जाता है या उसे लाभ पहुँचता है। इसका मतलब यह हुआ कि उसका अपना ‘विश्वास’ बहुत बडा काम करता है। एक रिपोर्ट के  अनुसार 60% लोगों को प्राइवेट प्रेक्टिशनरों ने Prescriptions ही गलत लिखे थे लेकिन मरीज़ फिर भी अच्छे हो गए .जब डॉ कहता है "चिंता न करो ,तीन चार दिन में बिलकुल ठीक हो जावोगे "तो यह आश्वस्ति ही प्लेसिबो बन जाती है ..आपने इसी ‘विश्वास’ के असर की झलक मुन्ना भाई एमबीबीएस मे भी देखी होगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि दवाओं का असर तब और ज्यादा होता है जब मरीज को उन दवाओं पर भरोसा हो।

यूरोप में  एक हज़ार लोगों पर प्रयोग किया गया  वो सर्दी-जुकाम से पीडित थे। उनमें से कुछ लोगों को कोई दवा नहीं दी गई और कुछ लोगों को यूं ही कुछ खाली केप्सूलों में ग्लूकोज़ दिया गया । शोधकर्ताओं ने पीडितों को बताया कि उन्हें सदी-जुकाम से निजात दिलाने के लिए नया एंटी बायोटिक्स  दिया जा रहा है। कुछ दिन बाद देखा गया कि जिन मरीजों को खाली केप्सूलों में ग्लूकोज़ दिया गया था वो जल्दी ठीक होने लगे...और जिनको कोई दवा नहीं दी गयी वो बीमार ही रहे !  बिना दवा खाए या कोई बेअसर दवा खाने से आराम पाने को मेडिकल की दुनिया में "प्लेसिबो इफेक्ट" कहा जाता है। इसमें बीमार ये सोचता है कि दवाएं खाने से वो ठीक हो रहा है लेकिन वास्तव में दूसरे कारणों से स्वास्थ्य में सुधार हो जाता है, जिसमें उसकी मानसिक संतुष्टि भी बहुत काम करती है...। बीमारियों के इलाज के लिए दवाओं पर भरोसा जरूरी है।

तब क्या आज कल के बाबाओं द्वारा लोगो को बताये जा रहे उलटे सीधे टोटकों का और  गंडे -तावीजों , आसन,  दवाइयां,  और  मौलाना साहिब के पढ़े हुए पानी आदि में भी प्लेसिबो असर होता है ...? जी..बिलकुल होता है...बल्कि यह लोग खा चाट ही इस प्लेसिबो इफेक्ट की बदौलत रहे हैं...आज निर्मल बाबा का नाम हर जगह छाया है....इनका प्लेसिबो इफेक्ट बहुत ही ज़बरदस्त है...देखा गया है कि कोई बाबा कहता है...की अपने पलंग के नीचे पीपल का पत्ता रख दो...रात को नींद अच्छी आएगी ..उस व्यक्ति को मानसिक तौर पर विश्वास हो जाएगा... ....तो यह निश्चित है. कि.. वो अपने आप ही समय पर सो जाएगा...जब कि उस पीपल के पत्ते का इसमें कोई रोल नहीं है...आज इसी प्लेसिबो इफेक्ट के दम पर बाबा लोग रोकड़ा बटोर रहे हैं......कोई ज्योतिषाचार्य टी.वी. पर अजब अजब उपाय बता कर तो कोई वास्तु बाबा घर के चीज़ों को इधर से उधर रखवा कर...  और बाबा ही नहीं कई मुन्ना भाई डाक्टर भी इस मनोवैज्ञानिक आश्वस्ति या फेथ हीलिंग के दम पर अपनी पौ बारह किये बैठे हैं...और यह भी सच है कि आप और हम इस प्लेसिबो इफेक्ट के कारण ही कई बाधाएं भी पार कर जाते हैं...और कई बीमारियों पर विजय भी पा जाते हैं...यह कहीं न कहीं दवाओं से ज्यादा हमारे आत्म विश्वास  और मानसिक दृढ़ता को भी प्रकट करता है, और तो और यह प्लेसिबो इफेक्ट कही��� न कही हमारे सामाजिक और पारिवारिक जीवन पर भी किसी न किसी रूप में असर अंदाज़ होता है...यहाँ इसका प्रभाव आपसी समझ और विशवास की भावना से पैदा होता है.!

सोचिये यदि यह प्लेसिबो इफेक्ट नहीं होता तो ना जाने क्या होता...??


शुक्रवार, 1 मार्च 2013

भाजपा के लिए हास्यास्पद सर दर्द ~~!!

बार बार मोदी का नाम 2014 के चुनावों हेतु प्रधानमंत्री के लिए  आगे कर जहाँ एक और भाजपा देश और NDA के राजनैतिक तापमान को माप रही है,  वहीँ दूसरी और अंदरूनी कलह से परेशान हुई बैठी भाजपा खुल कर मोदी को अगले प्रधान मंत्री के लिए प्रोजेक्ट भी नहीं कर रही है ..इनकी गाडी दो क़दम आगे जाती है, तो दूसरे ही दिन तीन क़दम पीछे भी हो जाती है, कभी ख़ुशी ...तो कभी ग़म ...वाली बात हो रही है, वैसे इनका संकट बहुत गहरा है !

खुद मोदी ने अपने आपको पी आर एजेंसियों की मदद और मीडिया की मदद से अपनी ऊंचाई तो बढवा ली, तो दूसरी और भाजपा ने भी इस बढे हुए प्रायोजित क़द का गुणगान करना शुरू कर दिया, अब चाहे वो कुम्भ में साधू संतों से मोदी का समर्थन कराना हो या कालेजो में विकास के झुनझुने पर भाषण !

और नतीजा यह हुआ कि  इन्होने मोदी का क़द अपनी पार्टी से भी बड़ा करा करा कर ...खुद ही आफत मोल ले ली है, अब न भाजपा मोदी को निगल ही सकती है, और ना ही उगल सकती है, दूसरी और NDA के बड़े सहयोगी दलों ने भी इस " मोदी मोदी खेलने " के तमाशे पर आँखें तरेंरना शुरू कर दिया है, कभी नीतीश की घुड़की ...तो कभी मुलायम की गुगली तो कभी फर्जी एन्काउन्टर हो या दंगो के केस ...से हैरान भाजपा ...बेकफुट पर आ जाती है, अब ऐसे में यह लोग मोदी महोदय को कभी गुजरात तो कभी दिल्ली के चक्कर लगवा कर बहला रहे हैं, अब आगे आगे देखिये होता है क्या ? अभी अडवानी कथा भी तो बाक़ी है !!

हमारी अरज भी सुनो वित्त मंत्री जी ~~~!!


मध्यम वर्ग इस बजट से निराश ही नहीं बहुत आक्रोश में भी है, जहाँ नौकरी पेशा वर्ग को टेक्स स्लेब में कोई राहत नहीं दी गयी है, वहीँ दूसरी और digitization होने जा रहे देश में सेट टॉप बॉक्स को महंगा किया गया है, दूसरी और सूचना क्रांति के दौर में 2 हज़ार से ऊपर के मोबाइल भी महंगे किये गए है, गेस, पेट्रोल और डीज़ल के बढे दामो से त्रस्त सबसे ज्यादा यही माध्यम वर्ग ही है, यह वही मध्यम वर्ग है, जिसने कभी बढ़ी हुई प्याज की कीमतों से क्रुद्ध होकर सरकार बदल डाली थी, इस वर्ग को GDP के आंकड़ों के मायाजाल से कोई लेना देना नहीं, आपने महिलाओं को विदेश से एक लाख का सोना लाने के लिए ड्यूटी फ्री कर दिया है, कितनी महिलायें और कौनसी महिलायें इससे प्रसन्न होंगी, सब जानते हैं !
आपने एक करोड़ से ऊपर के आय वालों पर दस प्रतिशत का टेक्स लगाया है, ऐसे लोग देश में लगभग 42000 के लगभग ही है, इससे क्या साबित करना चाहते हैं, ? गरीबों को मानसिक संतुष्टि देना कि  देखो हमने अमीरों पर भी टेक्स लगाया है ! पर  आप भले ही देश की अर्थव्यवस्था को  होमोपेथी की पुडियाएं देने की कोशिश कर रहे हों, मगर इस समय त्रस्त जनता को कुछ instant relief चाहिए, पे-दर-पे एक के बाद एक आर्थिक बोझ से दबा कुचला यह वर्ग ....आपके तथा कथित आने वाले विकास के वादों पर अब नहीं बहलने वाला, इसके आक्रोश को समझिये, या फिर इसके आक्रोश की चिंगारियों को आने वाले समय में वोटिंग मशीनों से निकलता देखिये।
(अभी अभी ब्लॉग लिखते लिखते समाचार सुना कि बजट के फ़ौरन एक दिन यानी 1 मार्च '2013 की मध्य रात्रि से  पेट्रोल की कीमत 1रुपया 40 पैसे की वृद्धि कर दी गयी है ...कुचलिये और कुचलिये ..हमारे शहर के साहित्यकार श्री शरद तैलंग जी ने शायद ऐसी ही परस्थिति पर यह अशाअर लिखे थे :-

कभी जागीर बदलेगी, कभी सरकार बदलेगी,

मगर तक़दीर तो अपनी बता कब यार बदलेगी ?



अगर सागर की यूँ ही प्यास जो बढती गई दिन दिन,

तो इक दिन देखना नदिया भी अपनी धार बदलेगी...!!
(शरद तैलंग)