शनिवार, 2 मार्च 2013

भीड़ ही क्यों....समर्थक क्यों नहीं...??

अन्ना के जनलोकपाल आन्दोलन का एक और चरण पूर्व निर्धारित कार्र्यक्रम नियमित योजना  और साइबर तैय्यारियों के साथ उनके प्रिय जंतर मंतर पर 25 जुलाई से आरम्भ हुआ ...मगर दूसरे दिन ही बदहवासी फैल गयी, कारण रहा कम भीड़ का...न्यूज़ चेनलों ने लगातार कवरेज किये...और अन्ना के अनशन के हर पहलू को लगातार दिखाया, टीम अन्ना भी कम भीड़ के कारण उपस्थित कम भीड़ से यही विनती करती नज़र आयी कि भीड़ और बढ़नी चाहिए...टीम अन्ना कम भीड़ से हमेशा ही आतंकित नज़र आयी है...MMRDA मैदान मुंबई में भी यही हुआ था...कम भीड़ से आतंकित होकर टीम अन्ना ने अपना अनशन तुरत फुरत समाप्त करने की घोषण कर डाली थी...कारण बताया गया था...अन्ना की खराब तबियत !

यहाँ प्रश्न यह उठता है कि किसी आन्दोलन को शक्ति देने के लिए क्या भीड़ की आवश्यकता होती है...या उस आन्दोलन के मुद्दों पर जुटे समर्थकों की...? साफ़ नज़र आ रहा है कि अन्ना आन्दोलन के समर्थक कम होते जा रहे हैं...फेसबुक पर IAC ग्रुप की यदि बात की जाए तो वहां चाहे लोखों लोग रोज़ समर्थन में नारे लगाते हों मगर..वास्तविक धरातल तो फेसबुक से बाहर है...इसके लिए घरों से निकल कर अपना समर्थन देना होता है ! कहते हैं भीड़ का कोई मस्तिष्क नहीं होता....परन्तु ऐसा लगता है....कि  भीड़ ही टीम अन्ना का मस्तिष्क है... भीड़ कम होते ही...टीम अन्ना की सोचने कि शक्ति ख़त्म सी नज़र आने लगती है...टीम अन्ना बार बार भीड़ के लिए विनती करती क्यों नज़र आ रही है ? मुंबई में भी एक बार कम भीड़ के कारण केजरीवाल ने लोगों ( भीड़ ) से सवाल किया था कि अब क्या किया जाए...?

इसमें टीम अन्ना की कहीं न कहीं गलती है...बार बार किश्तों में अनशन करने से लोगों का मोह भंग हुआ है...और दूसरी और अन्ना के अनशन को अब राजनैतिक भी कहा जाने लगा है...विशेष रूप से अरविन्द केजरीवाल के बडबोलेपन ने भी अन्ना के आन्दोलन को नुकसान ही पहुँचाया है...फायदा नहीं, कहीं न कहीं आधार कमज़ोर हुआ है...यही कारण है कि अन्ना आन्दोलन के समर्थक गायब होते जा रहे हैं.....और सिर्फ भीड़ रह गयी है...वो भी कम...! भीड़ का क्या है...कहीं भी इकठ्ठी हो जाती है...एक्सीडेंट हो तो, मदारी का तमाशा हो तो, कोई भाषण दे रहा हो तो, कोई पोस्टर पढने को , .कहने का तात्पर्य यह है कि भीड़ सिर्फ तमाशा देखने के लिए होती है....तमाशा देख कर घर जा कर भूल जाती है.....! यहाँ अन्ना आन्दोलन को ज़रुरत है...समर्थकों कि न कि भीड़ कि...और समर्थक कहाँ हैं...? टीम अन्ना जाने....तब तक भीड़ से काम चलाइये....शायद काम बन जाए....!!
(
Friday July 27, 2012)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें