बुधवार, 21 दिसंबर 2011

किसकी नज़र लगी है.....पिरामिडों के देश मिश्र को~~~~~??

पिरामिडों कि धरती मिश्र में  क्या कभी होस्नी मुबारक के शासन में ऐसा कृत्य हुआ था ?  इस महिला के साथ जो घिनौना  कृत्य मिश्र में हुआ उसको पूरी दुनिया ने टी.वी. समाचारों  में Live  देखा और समाचार पत्रों में पढ़ा, इस महिला कि घटनास्थल पर ही पुलिस पिटाई के दौरान ही मृत्यु हो गयी थी, साथ ही में इसके एक और साथी को भी पुलिस ने पीट पीट कर मार डाला था,   इस समय   मिस्र से जो संकेत मिल रहे हैं, वे बहुत अच्छे नहीं हैं। वहां की फौज के हाथों में इस वक्त सत्ता की बागडोर है और ऐसा महसूस हो रहा है कि एक स्वस्थ लोकतांत्रिक बदलाव को प्रोत्साहित करने के बजाय अमेरिका वहां ज्यादा से ज्यादा सैन्य शासन खींचना चाहता है, और सेना को भी  अपनी सत्ता बचाए रखने में कहीं अधिक दिलचस्पी है।

 अमेरिका मिस्र को सालाना 1.3 अरब डॉलर की सैन्य सहायता देता है, यानी कह सकते हैं कि अमेरिका के टुकड़ों पर ही मिश्री सेना पल रही है....ऐसे में ओबामा प्रशासन को अब यह फ़िक्र हो गयी है कि मुस्लिम ब्रदर हुड जैसे इजराइल और अमेरिका विरोधी संगठन यहाँ दोबारा से जनता के चहेते बन गए हैं, और चुनावों में इनका पलड़ा भी भारी है...अब यह साफ़ ज़ाहिर हो गया है कि लोकतांत्रिक आन्दोलन और बदलाव के नाम पर अरब देशों में हो चुके और हो रहे उपद्रवों के पीछे अमेरिका का निजी हित और गुप्त एजंडा काम कर रहा है...और इसका नतीजा सिर्फ और सिर्फ आम जनता को भुगतना पड़ रहा है, और अरब लीग नामक संस्था तो मानो अमेरिका के लिए एक चपरासी की हैसियत से काम कर रही है......तानाशाहों के खात्मे के नाम पर सत्ता पलट के खेल के महारथी अमेरिका से कौन कहे कि सब से बड़ा तानाशाह तो शान से सऊदी अरब में बैठा इन सब कार्वाहियों को और हवा दे रहा है.....!!

नामवर शायर और कवि अदम गोंडवी साहब के देहांत पर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि~~~~~~!!

जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये..
आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये,

जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़..
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये,

जल रहा है देश यह बहला रही है क़ौम को..
किस तरह अश्लील है कविता की भाषा देखिये..!!

(अदम गोंडवी)

यह रचना खुद-ब-खुद ही उनके विचार और तेवर बयान कर देती है...साहित्य जगत के यह बहुत बड़ी क्षति है...!

प्रगतिशील धारा के हिंदी के बहुचर्चित गज़लकार अदम गोंडवी यानी रामनाथ सिंह का आज सुबह 5.10 बजे निधन हो गया। उन्हें जिगर की बिमारी थी।
उनका जन्‍म 22 अक्‍टूबर 1947 को आटा ग्राम, परसपुर, गोंडा, उत्तर प्रदेश में हुआ। उन्‍होंने हिंदी गजल को अलग पहचान दी। मुशायरों में घुटनों तक मटमैली धोती, सिकुड़ा मटमैला कुरता और गले में सफ़ेद गमछा डाले जब वह गंवई अंदाज में पहुंचते थे तो लोग बहुत ध्‍यान नहीं देते थे, पर जब वह गजल-कविता सुनाता तो लोग हैरान रह जाते थे। ‘धरती की सहत पर’, ‘समय से मुठभेड़’ उनकी प्रमुख पुस्‍तकें हैं।
22 अक्तूबर 1947 को उत्तर प्रदेश के आटा परसपुर गांव में जन्में अदम गोंडवी के दो संग्रह धरती की सतह पर और समय से मुठभेड़ प्रकाशित हुये थे लेकिन उनकी जनवादी कवितायें पूरे हिंदी प्रदेश में लोकप्रिय रही हैं. “काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास में, राम राज उतरा विधायक निवास में” और “जो उलझ कर रह गई फाइलों के जाल में, गांव तक वो रोशनी आयेगी कितने साल में” जैसी कविताओं के लिये मशहूर अदम गोंडवी उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के अटा परसपुर गांव में रहते थे और वहीं खेती करते थे. अदम गोंडवी और उनकी कविताओं पर कई विद्यार्थियों ने पीएचडी की थी !


ऐसे नामवर और ज़मीन से जुड़े शायर को हम सभी की और से भावभीनी और अश्रुपूरित श्रद्धांजलि....!!

राष्ट्रीय खेल बड़ा या....क्रिकेट.....खेलों का भारत रत्न पर पहला अधिकार मेजर ध्यान चंद जी का है~~~~!!

आखिरकार सरकार ने देश के सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' खिलाड़ियों को देने का रास्ता साफ कर दिया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस सम्मान को पाने वाला पहला व्यक्ति कौन होना चाहिए ? पूरे विश्व में हाकी में भारत का झंडा बुलंद करने वाले  हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद या फिर 10 - 12 देशों के ही बीच खेले जाने वाले क्रिकेट के कारपोरेट खिलाडी  मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंडुलकर ?

हालांकि पिछले बरस की तरह मीडिया सचिन को 'भारत रत्न' दिए जाने का माहौल बनाने में जुट गया है, लेकिन इस माहौल में मेजर ध्यानचंद का नाम भी लिया जा रहा है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि क्रिकेट का खेल थोड़ी देर के लिए रोमांच पैदा करता और भारतीय खेल जगत के लिए यह 'धर्म' की शक्ल ले चुका है, लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि 'हॉकी' भारत का राष्ट्रीय खेल है। दो या तीन पीढ़ियों ने भले ही दद्‍दा ध्यानचंद को खेलते हुए नहीं देखा हो, लेकिन आज भी वे उनका नाम सम्मान से लेते हैं। ध्यानचंद के प्रति यह एक प्रकार की श्रद्धा और समर्पण भाव है।

जिस इनसान ने भारत को लगातार तीन ओलिम्पिक (एम्सटर्डम 1928, लॉस एंजिल्स 1932 और बर्लिन 1936) में गोल्ड मैडल दिलवाया हो (जो कि आज सपना बनकर रहा गया है) और जो आदमी करीब चार दशक तक अपनी स्टिक से विरोधियों को नचाता रहा हो, वह हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के अलावा और कोई दूसरा नहीं हो सकता। इतना ही नहीं खेल छोड़ने के बाद भी उन्होंने हॉकी की नई पौध तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। 15 अगस्त 1936 का वह दिन था, जब भारत ने बर्लिन की जमीन पर मेजबान जर्मनी को 8-1 से ( ध्यानचंद के 3 और उनके भाई रूप सिंह के 2 गोल) हॉकी का ओलिम्पिक स्वर्ण पदक जीता था और स्वर्ण जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के कप्तान ध्यानचंद ही थे। उस अहम मैच का गवाह था जर्मनी का शासक तानाशाह हिटलर। उस समय हिटलर ने भी दद्दा की तारीफ करने में कोताही नहीं बरती थी।

1928 के ओलिम्पिक फाइनल में भारत हॉलैंड को 3-0 से हराकर चैम्पियन बना, जिसमें 2 गोल ध्यानचंद ने दागे थे। 1932 के लॉस एजिल्स में भारत ने अमेरिका को 24-1 से रौंदा था। इस ओलिम्पिक में भारत के कुल 35 गोलों में से 19 गोलों पर ध्यानचंद का नाम अंकित था तो 1936 बर्लिन ओलिम्पिक में भारत के कुल 38 गोलों में से 11 गोल दादा ध्यानचंद ने दागे थे।

क्रिकेट के सर्वकालिक महान खिलाड़ी रहे डॉन ब्रेडमैन भी ध्यानचंद के खेल पर फिदा थे और उन्होंने उनसे कहा था कि जिस प्रकार हम बल्ले से गेंद पर प्रहार करके रन बनाते हैं, उससे कहीं अधिक कौशल के साथ आप गोल दागते हैं। क्या ब्रेडमैन के इस कॉम्पिलीमेंट को याद नहीं रखा जाना चाहिए?

 पद्श्री और पद्मभूषण से नवाजे गए सचिन के खाते में अब सिर्फ एक ही सम्मान की कमी है और वह सम्मान है 'भारत रत्न' का। यदि सही मायने में देश के सर्वोच्च सम्मान की शुरुआत खेलों की दुनिया में की जा रही हो तो सचिन से पहले यह इस सम्मान के असली हकदार मेजर ध्यानचंद ही होने चाहिए।

सचिन के दादा की उम्र के दद्‍दा ध्यानचंद को मरणोपरान्त यह सम्मान मिलता है, तो निसंदेह यह भारतीय खेल इतिहास, हॉकी इतिहास और राष्ट्रीय खेल का सम्मान होगा। सचिन तो अभी खेल रहे हैं और आने वाले कई वर्षों तक वे अपना जलवा दिखाते रहेंगे। सरकार के पास सचिन को सम्मानित करने के और भी अवसर रहेंगे, लेकिन भारतीय खेल इतिहास हमेशा अपने आप पर गौरव करता रहेगा कि खेलों में पहला 'भारत रत्न' हॉकी के उस महान खिलाड़ी को दिया गया, जिसने पूरी दुनिया में तिरंगे का मान बढ़ाया। इस पर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए, कोई विवाद नहीं होना चाहिए और किसी तरह की कोई दुर्भावना नहीं होनी चाहिए।

2008 में सरकार ने आखिरी बार 'भारत रत्न' से पंडित भीमसेन जोशी को नवाजा था, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। पिछले बरस भी सचिन को भारत रत्न से सम्मानित किए जाने का माहौल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने बनाया था, लेकिन सरकार मजबूर थी क्योंकि इस सम्मान की सूची में खेल शामिल नहीं था।

इस बार गृह मंत्रालय को पुरस्कार की चयन प्रक्रिया में बदलाव किया जा चुका है और खेल को भी इस सूची में शामिल कर लिया गया है। और अब  सरकार ने मन बना ही लिया है तो वह ध्यानचंद के साथ ही साथ सचिन को भी भारत रत्न से नवाज सकती है। अच्छा तो यह होना चाहिए कि खुद सचिन आगे बढ़कर यह कहें कि खेल में पहला 'भारत रत्न' ध्यानचंद को दिया जाए। ‍बेशक, इससे सचिन की महानता में और इजाफा होगा ।

हर एक आदमीं में बसते हैं कई आदमी~~~~~~!!

मशहूर शायर निदा फाजली साहब ने यह शेर कुछ देख सोच कर ही कहा होगा..

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी ...
जब भी किसी को देखना कई बार देखना..!!

और अब इस शेर कि सच्चाई पर साइंस ने भी मोहर लगा दी है...!! अमेरिका में एक बहुत बड़े मनोचिकित्सक हुए, डॉ. एरिक बर्न। उन्होंने सैकड़ों मरीजों का उपचार किया और उसके बाद वह इस नतीजे पर पहुंचे कि इंसान एक अखंड व्यक्तित्व नहीं है, उसके अंदर कई केंद्र होते हैं, जो तरह-तरह के व्यक्तित्व बनकर उभरते हैं। अपने अनुभवों की बुनियाद पर उसने एक किताब लिखी: ‘गेम्स पीपुल्स प्ले।’ हालांकि किताब के नाम से मैं सहमत है हूँ,  क्योंकि यह गेम आदमी नहीं खेलते, यह तो एक मनोवैज्ञानिक पहलू से सम्बंधित घटना होती है, इस पर आदमी का कोई बस नहीं होता...!
 बर्न एक वकील का इलाज कर रहे थे, जो उस समय का प्रसिद्ध और संपन्न वकील था। एक सम्मोहन सत्र के दौरान वह बोला, ‘मैं वकील नहीं हूं, मैं एक छोटा बच्चा हूं।’ फिर अगले सत्रों में कई बार वकील बर्न से पूछता, ‘आप वकील से बोल रहे हैं या बच्चे से ?’ यह देखकर बर्न का कौतूहल जगा। उन्होंने धीरे-धीरे अन्य मरीजों के विश्लेषण के दौरान भी पाया कि एक व्यक्ति में कम से कम तीन लोग बसते हैं, बच्चा, मां-बाप और वयस्क। और ये तीन लोग क्रमश: बदलते रहते हैं। कब बच्चा उभरता है और कब मां-बाप बोलने लगते हैं, कहा नहीं जा सकता। यह बदलाव सिर्फ शब्दों में प्रकट नहीं होता, बल्कि शब्दों से तो बहुत कम कहा जाता है, चेहरे के हाव-भाव, देह भाषा, शरीर के तापमान और अन्य कई शब्दातीत संकेतों से उस व्यक्ति की मंशा का पता चलता है। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जब कोई भी इंसान बोलता है, तो संप्रेषण केवल उसके शब्दों से ही नहीं होता, जिस तरह शब्द कहे जाते हैं, उससे होता है। चेहरे की भंगिमा द्वारा भी संप्रेषण होता है। जब हम बचपन में अपने से बड़ों के विचार, भाव और आचरण का अनुकरण कर रहे हों, तब पहला केंद्र सक्रिय होता है। भारतीय लोगों में यह केंद्र बहुत अधिक सक्रिय होता है, क्योंकि यहां बच्चों पर मां-बाप का गहरा असर होता है। आदमी वयस्क तब होता है, जब जीवन को सीधे संवेदित करता है। यह तब होता है, जब हम भूतकाल से प्रभावित नहीं होते या उसके प्रभाव को मिटा देते हैं।
अब यह बात साइंस ने भी मान ली है कि कोई भी व्यक्तित्व एकल नहीं होता, उस के अन्दर दो तीन व्यक्तित्व छुपे होते हैं, और जो समय समय पर अपना रूप प्रकट करते रहते हैं, तो रहिये तैयार अपने अन्दर के अन्य व्यक्तित्व के केन्द्रों को सहेजने के लिए....!!By : Syed Asif Ali Hashmi 

जूतेबाज़ी से आगे जहां और भी है~~~~~!!

इराकी पत्रकार मुन्तज़र अल जैदी के बुश पर फेंके गए जूते के बाद तो जैसे भारत में जूतेबाज़ी करने कि होड़ से लगी है, जो कि अब जूतेबाज़ी से आगे बढ़ कर थप्पड़बाज़ी तक आ पहुंची है, जबकि अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश पर ईराक की राजधानी बगदाद में एक संवाददाता मुंतजिर-अल-जैदी ने अपना जूता फेंका और उसे बुश की विदाई के चुम्बन का नाम दिया । दूसरा जूता उसने ईराक की विधवाओं और अनाथों की ओर से फेंका।उस समय और स्थान पर बुश जूते का शिकार हुए, उस पत्रकार द्वारा जूते मारने के बाद वो पत्रकार तो रातों-रात एक मशहूर हस्ती बन गया |  यह बात इसलिए भी सत्य है कि साउदी अरब के एक व्यापारी ने फेंके गए जूते ५० करोड़ रुपए में खरीदने की पेशकश की है। बहुत से लोगों का मत है कि जूतों की इस जोड़ी को किसी संग्रहालय में सजा दिया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें देख-देख कर प्रेरणा ग्रहण करती रहें।
बुश के बाद  चीन के प्रधान मंत्री विन जिआवो को ब्रिटेन में जूता फेंकने की घटना का सामना करना पड़ा था । सोवियत संघ के तत्कालीन प्रधान मंत्री निकेता ख्रुशचेव ने तो १९६० में अपना जूता संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल एसेम्बली में दिखाया था। बुश, वेन जियाबाओ अरुंधती रॉय, चिदंबरम, राजेश तलवार आदि के बाद इस बार प्रशांत भूषण। सारी घटनाओं को करीब से देख कर आसानी से समझ में आता है कि गुस्सा अपने चरम पर है।

गुस्सा उन सभी को आया था जो इस देश पर अंग्रेजों की गुलामी से आजिज़ आ चुके थे। आज़ादी मिली तब भी गुस्से का बने रहना जारी रहा। इमरजेंसी लागू हुई तो गुस्सा अंदर ही अंदर भरने लगा। सरकारें बदलती रही और जनता को अलग-अलग तरीकों से गाँधी टोपी पहनाती रही तो भी गुस्सा आया। बाबरी मस्जिद से लेकर गोधरा, इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की हत्या, पंजाब का आतंकवाद, नक्सलवाद, कभी न ख़त्म होता भ्रष्टाचार, सबकी खबर लेकर सबको खबर देने वाले का खुद पैड न्यूज़ में रंगे हाथों पकडा जाना भी गुस्से की वजह बना।मीडिया के लिए ऐसी खबरें रोमांच लेकर आती हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए तो खास तौर पर क्योंकि इसी बहाने उन्हें अपने चौबीस घंटे के चैनल की खुराक मिल जाती है, नियम को तोड़ने वाले को कई बात हीरो के रूप में पेश करते  है। दूसरे के मूल्य पर खुशी की दावत करने वाले मीडिया को यह जो स्वाद लगा है, वह बेशक खतरनाक है।
गुस्सा  किसी समस्या का निदान नहीं। गुस्सा किसी नतीजे पर भी नहीं ले जाता। पर गुस्सा यह ज़रूर दिखाता है कि कोई आक्रोश कही बहुत दिनों से पनप रहा है। यह संकेत इस बात का भी है कि व्यवस्था चरमरा रही है।पिछले एक अरसे से जनता टीवी के स्टूडियो में तो कभी अखबारों के पन्ने और ख़ास तौर से फसबूक और सोशल नेट्वोर्किंग साएट्स पर ही अपना गुबार निकाल रही है। उसे हुकमरानों से सीधे मिलने का मौका नहीं मिलता। वह इनके घर जाकर पूछ नहीं सकती कि वेह 32 रुपैये में कितने मिनट का गुज़ारा कर लेते हैं। जनता तो सिर्फ हुकम को सुन सकती है और पेट्रोल और डीज़ल की कीमत के बढ़ने का इंतज़ार कर सकती है।

मगर देखा जाए तो इस  क्रोध  और  प्रतिरोध के और भी तरीके हैं...जैसे स्व. निगमानंद  ने गंगा के अवैध खनन के लिए प्रतिरोध करते हुए अपने प्राण निछावर कर दिए ..व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध तो अन्ना हजारे भी कर रहे हैं..और इरोम शर्मीला भी कर रही है, मगर जूतेबाज़ी और  थप्पड़ बाज़ी से अधिक यह आन्दोलन सार्थक रूप से सफल होते हैं...जूतेबाज़ी को हम कह सकते हैं की प्रतिरोध और क्रोध का एक short cut उपाय है, और इसमें एक पंथ दो काज वाली बात भी शामिल होती नज़र आती है, जूतेबाज़ तुरंत ही एक राष्ट्रीय बहस और एक हीरो के रूप में नज़र आता है, और उतनी जल्दी ही धूमिल हो जाता है, IPS राठौड़, और राजेश तलवार  पर अदालत मैं हमला करने वाले उत्सव शर्मा  अब कहाँ हैं ?  हमले के तुरंत बाद फेसबुक पर उत्सव के समर्थन में  एक ग्रुप बन गया था, जो अब न जाने कहाँ है, ..यह जूतेबाज़ी और थप्पड़ बाज़ी का चलन अगर चल पड़ा तो हो सकता है किसी दिन कोई सिरफिरा अन्ना हजारे के थप्पड़ मार दे, या किरण बेदी पर जूता उछाल दे, या इरोम शर्मीला कि पिटाई कर दे.... कहने का अर्थ यही है कि क्रोध और प्रतिरोध का तरीका जितना सार्थक और सटीक होगा, उसका impact भी उतना ही गहरा और निर्णायक होगा...मीडिया को भी चाहिए कि ऐसी घटनाओं को बढ़ा चढ़ा कर नहीं पेश करे, क्योंकि इससे एक गलत परंपरा को बल मिलता है, और एक गलत  सन्देश लोगों को जाता है...!! 

जय हो टी.वी. बाले बाबाओं कि~~~~~!!

आज कल सुबह-सुबह आँख खोलो और अगर सोच लो की भगवान का दर्शन कर लें तो वो बड़ा मुश्किल है,  आजकल तो भगवान से ज्यादा ऊँचा दर्ज़ा आज कल के टीवी वाले बाबा लोगों को मिल गया है. आज कल चैनलों पर बाबा का प्रवचन एक फैशन सा हो गया है. अब तो अलग अलग धर्मों के लिए अलग-अलग बाबा हो गए हैं. कोई हिन्दू धर्मं का तो कोई सिख धर्मं की बातें करता है. धर्म का प्रसार और प्रचार करने वालों ने हमेशा भगवान को एक माना है, पर इन लोगों ने तो पूरी तरह से भगवान को जगह-जगह अलग-अलग समय में भी बाँट दिया है,  ये बाबा लोग खुद तो ईश्वर को एक ही बताते हैं पर ये खुद अलग-अलग हो गए हैं...!

सुबह-सुबह सोकर उठने के बाद बस अलग-अलग चैनल पर आपको अलग-अलग बाबा अपना प्रवचन सुनाते मिल जायेंगे. आज ये स्टेट्स सिम्बल भी हो गए हैं. अब तो हमारी मीडिया भी इन बाबा लोगों को प्रमोट करती नज़र आ रही है. न्यूज़ दिखाने वाले चैनलों ने भी इनको अपनी एक नयी तस्वीर पेश करने के लिए रख लिया है. आज बाबा लोग एक ऊँचे से मंच पर बैठ जायेंगे और खूब ढेर सारे लोगों की भीड़ उनके सामने बैठी होगी और पूरे मन से वो उसी प्रवचन में लीन रहती हैं. और बाबा लोगों से अगर फुर्सत मिले तो एक नए फैशन के तौर पर कुछ बाबा लोग अपने उत्पाद बेचते मिल जायेंगे. कहीं महालक्ष्मी श्री यन्त्र पूजा से सम्बन्धित, तो कहीं कोई औषधि का प्रचार....बहुत ज्यादा हुआ तो कुंडली का विश्लेषण करते अगले चैनल पर पंडित जी लोग मिल जायेंगे..! कोई वास्तु का ज्ञान बघार रहा है, तो कोई टेरो कार्ड से आपका जीवन सफल करने का दावा करता नज़र आ रहा है...!
आखिर ये सब क्या है ? पूरी तरह से दिशा भ्रमित करने का आसान तरीका ही तो है. आज यह चेनल्स और बाबा लोग आम जनता के संवेदनाओं की क़द्र न करते हुए ये लोग आराम से अपने कार्यक्रम को बढ़ावा देते हैं. आज भोली-भाली जनता इस तरह के बहकावे में आ जाती है और पूरी तरह से धोखा खाती है. ज़िन्दगी से दिशाभ्रमित हो जाने वाले लोग इस मकड़जाल में फंसते चले जा रहे हैं...!
आज के सूचना क्रान्ति के दौर में यदि पढ़े लिखे लोग भी ऐसे अंध विश्वासों और बाबाओं के प्रोग्राम देखते और फ़ोन करके समस्याओं के समाधान पूछते नज़र आये तो यह एक अचम्भे वाली बात ही होगी, मीडिया भी ऐसे Paid बाबाओं के प्रोग्राम का  खूब महिमामंडन करते हैं...क्या कभी इन चेनल वालों ने किसी वैज्ञानिक को नियमित समय पर किसी प्रोग्राम में बुलाकर सामजिक विकास और आम जन के विकास में योगदान देने वाली खोजों और अविष्कारों पर कोई कार्यक्रम रखा है  ?? नहीं क्योंकि कोई भी वैज्ञानिक या scientist ऐसे कार्यक्रमों के लिए इन चेनल वालों को पैसे क्यों देगा...जबकि बाबाओं के पास इंतना पैसा है कि यह जब चाहें जिस चेनल पर भी चाहें अपने लिए कोई भी Time Slot खरीद लेते है..! अभी भी समय है कि आप और हम सब मिल कर ऐसे ढोंग और अंधविश्वासों से पर्दा उठाने के लिए आगे आयें....!!

बार बार क्यों सुलग रहा है तहरीर चौक ~~~~~~~??

एक लोकतांत्रिक नागरिक सरकार के लिए मिश्र के लोग लगातार कोशिश कर रहे हैं, मगर मिश्र में इस समय जो फौजी नेतृत्व है, उस के शीर्ष कमांडर मोहम्मद तनतावी भी होस्नी मुबारक के चहेते रहे हैं,  कल से लेकर आज तक 36 लोग मारे जा चुके हैं और फिर एक बार  मिश्र में एक बार फिर तहरीर चौक जिंदा हो गया है, लोग सैनिक सरकार के खिलाफ और जल्द चुनाव की मांग को लेकर Million 's March निकालने जा रहा हैं, मिश्र के सामान ही तानाशाह से छुटकारा पाए  ट्यूनीशिया के चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो चुके हैं, l लेकिन मिस्र से जो संकेत मिल रहे हैं, वे बहुत अच्छे नहीं हैं। वहां की फौज के हाथों में इस वक्त सत्ता की बागडोर है और ऐसा महसूस हो रहा है कि एक स्वस्थ लोकतांत्रिक बदलाव को प्रोत्साहित करने के बजाय उसे अपनी सत्ता बचाए रखने में कहीं अधिक दिलचस्पी है। अमेरिका मिस्र को सालाना 1.3 अरब डॉलर की सैन्य सहायता देता है, ऐसे में ओबामा प्रशासन की उससे यह अपेक्षा जायज है कि मिस्र का फौजी नेतृत्व इजरायल के साथ 1979 के शांति समझौते का सम्मान बदस्तूर जारी रखे। लेकिन ओबामा प्रशासन को इन बातों के लिए भी मिस्र की सेना पर दबाव बनाना चाहिए कि वह मुल्क में निष्पक्ष चुनाव की गारंटी दे और सत्ता से हटने की तिथि की भी घोषणा करे। मिस्र में नई संसद के चुनाव के लिए 28 नवंबर को वोट पड़ने वाले हैं। लेकिन जो योजना फौजी जनरलों ने तैयार की है, वह चकरा देने वाली है।..
इसके मुताबिक पूरी चुनाव प्रक्रिया तीन महीने तक चलेगी। उसके बाद ही मिस्रवासी एक परिषद का चुनाव करेंगे, जिस पर नया संविधान तैयार करने की जिम्मेदारी होगी। उस संविधान पर परिषद जनमत-संग्रह कराएगी और उसके पश्चात नए राष्ट्रपति का चुनाव करेगी। इस तरह, फौज को एक और वर्ष या उससे अधिक वक्त तक सत्ता पर काबिज रहने का मौका मिल जाएगा। फौजी जनरलों के एजेंडे को लेकर संदेह उस वक्त और गहरा गया, जब उन्होंने अमेरिकी फौज द्वारा मिस्र के चुनावकर्मियों व तमाम राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने की कोशिश पर अपनी आपत्ति जताई। उन्होंने चुनावों में अंतरराष्ट्रीय ऑब्जर्वरों की तैनाती को भी बाधित करने की कोशिश की। दर असल इन सबके पीछे दो तीन मुख्य कारण विशेष हैं, पहला तो सब जानते हैं...इजराईल की चिंता, दूसरा मिश्र में Muslim Brotherhood नामक संगठन, जिस की गतिविधियाँ साफ़ तौर पर अमेरिका विरोधी रही हैं, इस बार सत्ता में चुनाव जीत कर सरकार बना सकता है, तीसरा कारण है सैन्य सरकार को किसी भी सूरत में कमज़ोर नहीं करना, क्योंकि अमेरिका मिश्री सेना को अरबों की मदद इसी लिए देता है कि वो मिश्र से ज्यादा अमेरिकी हितों का ध्यान रखे....ऐसे में लगता तो नहीं  है कि अंतरिम सरकार के इस्तीफे के बाद भी निष्पक्ष चुनाव और लोकतान्त्रिक सरकार का गठन मिश्र में हो पायेगा....जब तक अमेरिका कि हरी झंडी नहीं मिलती...तहरीर चौक बार बार सुलगता ही रहेगा.....!!

असली तानाशाह और हत्यारा कौन~~~~??

कर्नल मुअम्मर गद्दाफी की मौत के साथ लीबिया में एक नए दौर की शुरुआत होगी या नहीं  ? यह बात अलग है कि भावी युग कैसा होगा, इस बारे में अभी भरोसे के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता। कर्नल गद्दाफी ने लीबिया पर 42 साल तक शासन किया। इ दो महीने पहले राजधानी त्रिपोली से उन्हें खदेड़ने के बाद जिस राष्ट्रीय संक्रमणकालीन परिषद ने सत्ता संभाली, और जिसने फ्रांस, ब्रिटेन एवं अमेरिका के सहयोग से आखिरकार गद्दाफी के आखिरी गढ़ सर्त पर कब्जा करते हुए उन्हें मार डाला, वह कबीलाई वफादारी एवं गद्दाफी खेमे से पाला बदलने वाले सैनिक अधिकारियों को लेकर बनी है। इसलिए यह सवाल अपनी जगह कायम है कि अब लीबिया में किस प्रकार के और किस हद तक लोकतंत्र का प्रयोग होगा, जो पिछले दस महीनों से पश्चिम एशिया एवं उत्तर अफ्रीका के देशों में जारी अमेरिका और ब्रिटेन द्वारा sponsored  जन विद्रोह की मुख्य मांग है।
अमेरिका और ब्रिटेन द्वारा प्रायोजित और तेल के खेल के लिए, बदलाव के नाम पर यह लहर लीबिया से पहले ट्यूनिशिया और मिस्र के तानाशाहों को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक चुकी है और फिलहाल सीरिया, यमन और बहरीन में उसकी उथल-पुथल जारी है। और इसका सीधा लक्ष्य सीरिया और फिर मुख्य रूप से ईरान है, इस अमेरिकी और ब्रिटिश रण नीति के दो फायदे हैं, एक तो तेल के भंडारों पर क़ब्ज़ा जमाना, और दूसरा सीरिया और ईरान से इजराइल को सुरक्षित करना.
मगर पश्चिमी देशों का दोहरे मानदंडों पर आधारित दखल और उस क्षेत्र की तेल संपदा पर उनकी निगाह ने इस पूरी परिघटना को उलझा रखा है। तानाशाहों के पतन के बाद ईराक का बुरा हाल पूरी दुनिया देख रही है, और  मिस्र एवं ट्यूनिशिया के घटनाक्रम भी उम्मीद से ज्यादा आशंकाओं को जन्म देते रहे हैं। ऐसे में गद्दाफी का अंत नई संभावनाओं का आगाज भले हो, लेकिन उनका अंजाम क्या होगा- इसकी चिंता से दुनिया अभी मुक्त नहीं हो सकती।


मीडिया में गद्दाफी की मौत और उसके negative पहलू को लेकर काफी चर्चाएँ हो रही हैं, और यह सब यूरोपियन मीडिया का दिया और परोसा कूड़ा है, जो हू बा हू जनता को पेश किया जा रहा है..!
लेकिन अगर सच्चाई को सही मायने में देखा जाये तो गद्दाफी एक राष्ट्र भक्त था गद्दाफी के बारे में दुनिया वही  जानती है जो पश्चिम की मौका परस्त मिडिया ने दिखाया ...अपने देश के दुश्मनों को कौन नहीं कुचलता है गद्दाफी ने भी उन्ही को कुचला जो अमेरिका व नाटो का साथ दे रहे थे ... अमेरिका ने  केवल अपनी तेल की प्यास मिटने के लिए इराक व् उसके बाद लीबिया में यह  काण्ड किया,.. आज लीबिया में जो लोग जश्न मना रहे है वो भी एक दिन इराक की जनता की तरह मातम मनाएंगे ...!

१. अगर हमारे देश में कोई दूसरा  देश यंहा के
नागरिको को हथियार व पैसा देकर देश
विरोधी काम करवाए तो क्या हमें उन्हें
नहीं कुचलना चाहिए , गदाफी ने
भी वही  किया जो एक देश के शासक
को करना चाहिए , लेकिन भारत की तरह
उसने अपने यंहा कसाब व् अफजल की तरह
मेहमान बनाकर नहीं रखा..!!

२. गद्दाफी ही अरब में एक ऐसा राष्ट्र
वादी शासक था जिसने अमेरिका और ब्रिटेन के तलवे
चाटने से मना कर दिया उसी के कारण आज
उसको सजा ऐ मौत मिली यही सद्दाम के साथ हुआ था और आज ईराक
वालोँ को इसका एहसास हो गया है..!!

अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, और फ़्रांस ने लगातार अरब देशों में तानाशाहों को कुचलने के नाम पर या लोकतंत्र का टुकड़ा दिखा कर जो अफरा तफरी और हिंसा मचाई है, उससे तो साफ़ ज़ाहिर होता है की इस समय पूरे विश्व में केवल एक ही चौधरी और एक ही तानाशाह है...और वो है अमेरिका !!

महंगाई और भ्रष्टाचार पर चीख पुकार~~~क्या केवल वोट लेने के हथियार ??

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। यह भाजपा के सबसे बड़े जनाधार वाला प्रान्त माना जाता है। रथयात्रा के माध्यम से इन्होंने हर वर्ग को संदेश देने का प्रयास किया कि हमारी पार्टी पर धर्मान्धता की बात गलत है अर्थात हम धर्म सापेक्ष नहीं, धर्म निरपेक्ष हैं। वहीं लंबे समय बाद पार्टी में वापस आईं साध्वी उमाभारती, जिन्होंने उत्तर प्रदेश चुनाव की कमान भी संभाली है, वह राम का नारा रटते नजर आ रही हैं। पार्टी में इस तरह की राजनीति को क्या कहेंगे। कांग्रेस ने  राहुल गांधी के ज़रिये अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है,  समाजवादी पार्टी हो या बहुजन समाजपार्टी सभी का यही हाल है। महंगाई, भ्रष्टाचार की निंदा तो सभी कर रहे हैं, लेकिन इसके समाधान का रास्ता बताने में असमर्थ हैं। दक्षिण भारत के दल हों या उत्तर के, सभी का यही हाल है। कहने का तात्पर्य यह कि इन मुद्दों को लेकर बढ़ रही अनिश्चितता की स्थिति से जनता को कोई रास्ता सूझता नजर नहीं आ रहा है। महंगाई या भ्रष्टाचार का मुद्दा राजनीतिक दलों के लिए केवल वोट का मुद्दा बनकर रह गया है। आखिर इससे निजात कैसे मिले, यह एक अहम प्रश्न बना हुआ है। सवाल उनका है जो दो जून की रोटी के लिए मोहताज हैं। महंगाई के फंदे उनके सिर पर कसते जा रहे हैं। बेईमानो की पूंजी बढ़ रही है और ईमानदार का खून चूसा जा रहा है।

अब तक हुए आन्दोलन से यह स्पष्ट हो गया है कि किसी भी राजनीतिक दल ने इन दोनों "महारोग" (महंगाई और भ्रष्टाचार)  के अंत के लिए कोई महत्वपूर्ण कदम नहीं उठाए हैं। इसका कारण भी स्पष्ट है। यदि भ्रष्टाचार खत्म हुआ तो अधिकांश की राजनीति की दुकान भी बंद हो जाएगी। पोल खुलेगी और समाजसेवा के नाम पर राजनीति करने वाले लोगों के मुंह पर लगी कालिख उनका व उनके दल का पीछा नहीं छोड़ेगी। यह है महान भारत देश और यहां के राजनीतिक दलों की स्थिति। देश को चलाना है तो सभी राजनीतिक दलों को अपना स्वार्थ त्यागना होगा। यह भावना कैसे आएगी, यह भी इन राजनेताओं पर ही निर्भर करता है, आगे आगे देखिये होता है क्या ~~~~~!!

जय हो विजय माल्या की....!!

किसान खुदकुशी करते हैं तो करते रहें. गांव के लिए भेजा जाने वाला पैसा नेता और अफसर हड़पते हैं तो हड़पते रहें. देश में महंगाई की मार बढ़ रही है तो बढ़ती रहे. भ्रष्टाचार बेहिसाब बढ़ रहा है तो बढ़ता रहे. इन सब पर कुछ नहीं कर सकती केंद्र सरकार. लेकिन हां, अगर अकूत संपदा के मालिक विजय माल्या फार्मूला वन रेसिंग में करोड़ों रूपये उड़ा कर अपनी एयरलाइंस बचाने के लिए सरकार से पैकेज की मांग करते हैं तो सरकार के भीतर हलचल शुरू हो जाती है.यह मुद्दा यह बताने के लिए पर्याप्त है कि अपन के देश की सरकारें जन हित की नहीं बल्कि कारपोरेट्स के हित की संरक्षक हैं.

किंगफिशर एयरलाइन डूब रही है. उसके मालिक विजय माल्या सरकार से बेल आउट की मांग कर रहे हैं. सरकार भी बेल आउट देने के लिए बेचैन दिख रही है. इस बेल आउट के लिए तर्क यह दिया जाएगा कि  :--


१) हजारों लोगों की नौकरी दांव पर लगी है.


२) हवाई यात्रियों को बहुत परेशानी होगी.

३) इतनी बड़ी एयरलाइन को डूबने कैसे दिया जा सकता है.
४) इससे देश की छवि खराब होगी
५) निवेशकों खासकर विदेशी निवेशकों में गलत सन्देश जाएगा. ..और तय है कि सरकारी पैसे से बेल आउट पाकर माल्या मालामाल हो जाएंगे. कोई नहीं पूछेगा कि माल्या के मिस-मैनेजमेंट, फिजूलखर्ची और मनमानियों की कीमत आम आदमी की जेब से क्यों जाए? यही है मुनाफे का निजीकरण और घाटे का सरकारीकरण.


फार्मूला वन रेस में करोड़ों उड़ा कर, और रायल चेलेंज क्रिकेट टीम पर करोड़ों अरबों खर्च करने वाले और शाही सुख सुविधाओं में जीने के आदी और सुंदरियों आर लाखों रूपये उड़ाने वाले अय्याश विजय माल्या अपनी किंगफिशर एयरलाइंस को कर्ज संकट से उबारने के लिए सरकार से मदद मांग रहे हैं। किंग ऑफ गुड टाइम्स की कंपनी यूबी ग्रुप की शराब दुनिया के 52 देशों में बिकती है। देश के आधे शराब कारोबार पर उनका कब्जा है। 60% बीयर सिर्फ किंगफिशर की होती है। सवाल ये है कि उनको बेलआउट सरकार क्यों करे?  जनता को जरूरत भर के पेट्रोल पर चवन्नी भी सब्सिडी देने को तैयार नहीं है सरकार। जय हो विजय माल्या की...और उनके कारनामों की....!!

देश में फांसी की सजा और दया याचिका के बीच रोज़ मरते और जीते आरोपी ~~~!

देश में फांसी की सजा पाए लोगों की  दया याचिकाओं पर होने वाले राजनैतिक पैंतरेबाजी  के कई शो शुरू हो चुके हैं,  अफज़ल गुरु,  कसाब की , भुल्लर, और राजीव गाँधी के हत्यारों की भी याचिका सालों से धूल खा रही है,  ....मेरा मानना है की माननीय राष्ट्रपति जी को दया याचिका भेजने का अधिकारी केवल भारतीय नागरिक ही होना चाहिए, इसके अलावा विदेशी नागरिक (जैसे कसाब)  के केस में सर्वोच्च न्यायलय द्वारा दी गयी फांसी के मुलजिम को एक हफ्ते के अन्दर लटका दिया जाए, और दूसरी बात यह की दया याचिका के उत्तर की भी एक मियाद हो जैसे एक महीने की, इस दौरान यदि दया याचिका स्वीकार हो जाती है तो ठीक, अन्यथा...एक महिना गुजरने के पश्चात यह याचिका स्वत: ही रद्द मानी जाए, और 32 वें दिन उस मुलजिम को फांसी पर लटका दिया जाए,  देश के कानून विदों और मंत्रियों को इस दया याचिका के दायरे, और लागू करने की मियाद सहित सभी बातों को एक तार्किक नियम और कानून की सीमा में लाना चाहिए, और ऐसे देश विरोधी अपराधियों के लिए fast track अदालतें बनाई जाएँ, ताकि.. तुरत फुरत ऐसे अपराधियों को अंजाम तक पहुँचाया जाए ! आज के दौर में जहाँ ज़्यादातर देशों में फांसी की सजा तकरीबन ख़त्म की जा चुकी है, हमारे देश में यह लागू ही नहीं है, बल्कि एक गंभीर सजा को एक तमाशा भी बना कर रख दिया गया है, संविधान निर्मातों ने कभी नहीं सोचा होगा कि इस मानवीय पहलू वाली दया याचिका को एक समय में तमाशा बना कर रख दिया जाएगा...कैसी विडम्बना है कि कोई  फांसी कि सजा पाया अपराधी 11 सालों तक रोज़ अपनी मौत की आहट से कांपता हुआ सोता है, और सुबह डरता हुआ उठता है...फांसी जैसी सजा के तमाशा न बनाया जाए और सम्बंधित कानून का सही पालन हो ..ऐसे में  कानून की सख्ती और Implementation अपने देश में बहुत ज़रूरी हो गया है...!!

चौधरी (USA) जी के घर में भी एक तहरीर चौक जिंदा होने लगा है ~~~~~~~~~~!!

11 सितम्बर का हमला केवल Twin towers या Pentagon पर ही नहीं हुआ था, वो योजनाबद्ध हमला था, और उस हमले ने उस दिन से ही अमेरिका की अर्थ व्यवस्था की कमर तोड़ डाली थी, मगर अमेरिका ने अपनी  तबाह हुई अर्थ व्यवस्था को दुनिया से छुपा कर अपनी झूठी चौधराहट का डंका बजाना जारी रखा, और उस हमले के बाद वही किया जो कि अल कायदा चाहता था, हमले और हमले,  और सैन्य खर्च, कंगाली में चौधरी जी  का  जितना आटा गीला हो जाए उतना ही अच्छा, और अमेरिका ने किया भी वही, फ़ौरन ही अफगानिस्तान पर हमला, और फिर इराक पर हमला, अपनी चौपट अर्थ व्यवस्था को सँभालने के बजाय अमेरिका का पूरा ध्यान अब हमलों पर ज्यादा था, और फिर अपनी साख बनाये रखने के लिए क़र्ज़ पर क़र्ज़ लेकर उसने दुनिया को यह झूठा सन्देश दिया कि सब ठीक है, यानी उधार लेकर घी पीने वाली बात हो गयी, 20 मार्च 2011 को इराक पर अमेरिकी हमले के पांच साल पूरे हो चुके हैं, और इस अभियान में बकौल अमेरिकी अर्थशास्त्री और 2001 में अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता जोसेफ यूजीन स्टिगलिट्ज़ का आकलन है कि मोटे तौर पर इस युद्ध से अकेले अमेरिका पर तीन ट्रिलियन (3000 अरब) डॉलर का बोझ पड़ा है, उन्होंने कहा है कि इराक युद्ध से पड़े असर का सीधा रिश्ता अमेरिका के मौजूदा आर्थिक संकट से है। यही वह पेंच है जिसको समझने की ज़रूरत है।
जैसे, state children's health insurance program (SCHIP) के प्रस्तावित विस्तार की सालाना लागत 7 अरब डॉलर है, जबकि अमेरिका सरकार इतनी रकम इराक में दो हफ्ते में खर्च कर दे रही है। युद्ध में चार दिन के खर्च से अमेरिका में बच्चों की देखभाल के कार्यक्रम पर दो अरब डॉलर की सब्सिडी दी जा सकती है। इसलिए अमेरिकी अवाम अगर युद्ध का विरोध कर रहा है, तो यह पूरी तरह जायज है। इसके अलावा साथ में अमेरिका में केंद्रीय बैंक, शेयर और प्रॉपर्टी बाज़ार के दल्लों, नियामक संस्थाओं और इस हाउसिंग बुलबुले को पालने वाले और बेंकों को डुबो कर या दीवालिये घोषित करने वाले बेन्कर्स भी बराबर के दोषी हैं, जिन्होंने अमेरिका कि डूबती अर्थ व्यवस्था कि नाव में कई और छेद कर डाले !

अब कुल मिलकर बात यहाँ तक आ पहुंची है कि अरब देशों में, जैसे...मिश्र, लीबिया, यमन, सीरिया, ट्यूनिसिया, बहरीन, जैसे देशों में  प्रदर्शन, सत्ता परिवर्तन, वहां के देशों कि व्यवस्था परिवर्त और आक्रोशित जन जागरण को अपना खुला समर्थन देने वाला अमेरिका आज खुद ही उस आक्रोश कि आग में झुलसना शुरू हो गया है, अमेरिका ने कभी नहीं सोचा होगा कि ..अरब देशों में उसके द्वारा प्रायोजित सत्ता परिवर्तन या व्यवस्था परिवर्तन की लपटें खुद उस तक पहुँच जायेंगी...अमेरिका के न्यूयार्क शहर में " ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट प्रोटेस्ट " बैनर के तहत 20 हजार प्रदर्शनकारियों ने वॉल स्ट्रीट से कुछ दूर स्थित प्राइवेट पार्क जुकाती में अपना शिविर लगाया है,  अमेरिका में भी एक तहरीर चौक धीरे धीरे तैयार होने लगा है,  और हज़ारों लोग अपनी अपनी किताबें, लेपटोप, खाना, मोबाइल, और दवाइयां लेकर डट गए हैं,  और 4 /10 /2011 को  न्यू यॉर्क शहर में पुलिस ने 'ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट प्रोटेस्ट' के 700 से अधिक आंदोलनकारियों को ब्रुकलीन ब्रिज के पास गिरफ्तार किया है। इन लोगों ने social networking sites को ही अपना हथियार बनाया है, इनका आक्रोश इस आर्थिक दीवालिये पन की और जा रहे  देश की आर्थिक नीतियों और बेरोज़गारी और मूलभूत सुविधाओं की कमी के लिए है, अब देखना यह है कि अमेरिका खुद इस आर्थिक दीवालियेपन और साथ ही जानाक्रोश द्वारा तैयार किये गए " ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट प्रोटेस्ट " के रूप में पैदा हुए तहरीर चौक से कैसे निबटेगा.....??

क्या फेसुक यूज़र self glorification (आत्म प्रशंसक) होते हैं~~~~~~~??

एक सर्वे में कहा गया था कि फेसबुक यूज़र ज्यादातर खुद की तारीफ़ करने और कराने के शोकीन होते हैं,  self glorification की भावना से हर पोस्ट की जाती है,  देखा जाए तो हर यूज़र यही कोशिश करता नज़र आता है की उसकी पोस्ट की उसके लेख की उसके विडियो, या फोटो की तारीफ हो, और ज्यादा से ज्यादा कमेंट्स आयें,  और ज्यादातर यूज़र के प्रोफाइल भी इन बातों से अछूते नज़र नहीं आते,  हर प्रोफाइल में सुन्दर से सुन्दर प्रोफाइल फोटो लगे मिलेंगे, सुन्दर से सुन्दर उदगार और quotes मिलेंगे, हर वो चीज़ नज़र आएगी जो की तारीफ़ के काबिल हो !

status update के ज़्यादातर मामलों में भी यही बात देखी जा सकती है, लोगो शेक्सपीयर से कम तो किसी के quotation शेयर ही नहीं करना चाहते,  चाहे वो कही से भी कॉपी करके लायें पर होंगे ..तारीफ़ के काबिल, हर पोस्ट पर ज्यादा से ज्यादा  कमेंट्स के लिए भरसक कोशिशें होती नज़र आती हैं, एक पोस्ट पर अगर किसी जगह कमेंट्स नहीं आते तो उस को दस बारह जगह और पोस्ट किया जाता है, जब तक की मन माफिक कमेन्ट नहीं मिल जाते,  और यदि किसी ने भूल कर भी negative कमेन्ट कर दिया, या कोई कमी निकाल दी तो वो तो गया काम से, उसका एक ही इलाज होता है, कट्टी कर देना, या block कर देना.,  हर यूज़र अपनी पोस्ट पर होने वाले कमेंट्स के लिए हमेशा उतावला रहता है, बार बार notifications को चेक करता है ! लोग आउट होने के बाद भी अपनी पोस्ट पर आने वाले   कमेंट्स की चिंता रहती है, सर्वे में यह भी कहा गया है की ऐसे लोगों की  रियल लाइफ पर virtual life हावी होने लगती है, और असल ज़िन्दगी पर बुरा असर भी होना शुरू हो जाता है..!

कल की एक बात याद आ गयी, मेरा एक मित्र है, मोबाइल पर हमेशा अन्ना हजारे के समर्थन में मुझे महीनो से मेसेज भेजता है, एक दिन उसके शो रूम की तरफ जाने का मौक़ा मिला, वो बड़े ही आराम से कुर्सी बैठा था, सलाम नमस्ते के बाद मैंने कहा की भाई मैं भी अन्ना का समर्थन करता हूँ , और अन्ना के बारे में काफी कुछ फेसबुक पर लिखा भी है, क्या तुम्हारा फेसबुक पर अकाउंट है....उसने कहा नहीं ...मेरा कोई अकाउंट नहीं है, और अभी कोई ऐसा इरादा भी नहीं नहीं, और यह कह कर उसने  मोबाइल पर आये मेसेज को पढ़कर मुस्कुरा कर अपना मोबाइल एक तरफ रख दिया, और सुकून से टी.वी. देखने लगा, मुझे उस फेसबुक प्रोफाइल  विहीन   इस प्रसन्न और बेफिक्र मित्र से बड़ी ही जलन हुई, मैं ने सोचा की यह बिना फेसबुक प्रोफाइल के कितना सुखी, मस्त, और बेफिक्र है, मैं तैश में घर की और चल दिया..की आज फेसबुक का यह टेंशन वाला खेल ही ख़त्म कर देता हूँ,  मगर लोग ओन करते ही, मेरे सामने फिर वही virtual life सामने आ गयी, सब दोस्त, परिवार, notifications , poke , और like और कमेंट्स की भरमार....और सब कुछ भूल कर notifications और कमेंट्स के जवाब लिखने के लिए key board पर उंगलियाँ तेज़ी से चलने लगी..की देख तो लूं मेरी पोस्ट पर कितनों ने Like किया है और  कितने कमेंट्स आये हैं, ..!!

और आखिर में~~~~~दोस्तों कहीं आप यह मत समझ लेना की यह नोट भी मैंने ज्यादा से ज्यादा कमेंट्स पाने के लिए लिखा है......हा हा हा..... :))

जानिये कभी अमरीका के लिए सरदर्द बने संगठन Ku Klux klaan के बारे में !!

दोस्तों आपमें से कितनो ने यह नाम सुना है और कितनो ने नहीं....पता नहीं मगर किसी समय अमेरिका के लिए सर दर्द बने   इस संगठन के इतिहास और कार्य प्रणाली पर रौशनी डाली जाए  देखा जाए कि कैसे इससे मिलती जुलती विचारधारा कई देशों में फल फूल रही है, इन्टरनेट के माध्यम से अतिवादी विचार परोसना, अतिवादी लोगों का महिमा मंडन करना....व्यवस्था परिवर्तन की आड़ में दुष्प्रचार करना, लोगों की अभिव्यक्ति पर लठैती करना आदि इत्यादि !

अमेरिका में  24 दिसंबर 1865 को वजूद में आये इस  तीन K K K (कू क्लक्स कलान) संगठन ने भी किसी समय लोगों को ऐसे ही मोहित कर अपनी पैठ बनाई थी,  इस संगठन का लोगो था जलता हुआ क्रास और उसके सदस्य मुखौटे पहन कर कार्य करते, मीटिंग करते थे...और  सड़कों पर जुलूस आदी निकाला करते थे...और  पेश है इस संगठन के बारे में कुछ जानकारियाँ  :--

अमेरिका में  संधि सेना के पुलास्की, टेनेसी निवासी छः मध्य-वर्गीय पूर्व सैनिकों ने, अमरीकी गृह-युद्ध के तुरंत बाद, 24 दिसंबर 1865 को मूल कू क्लक्स क्लान की स्थापना की..इसमें.क्लान का मुखौटा हटाने पर अश्वेत-विरोधी निग़रानी समिति के सदस्यों के समूहों का एक झुण्ड, असंतुष्ट श्वेत किसान, युद्ध-काल के गुरिल्ला दल, विस्थापित डेमोक्रेटिक राजनेता, अवैध शराब आसवक, प्रतिरोधी नैतिक सुधारक, परपीड़क, बलात्कारी, अश्वेत प्रतिस्पर्द्धा से भयभीत श्वेत श्रमिक, श्रम अनुशासन के प्रवर्तन का प्रयास करने वाले नियोक्ता, सामान्य चोर, दशकों-पुरानी शत्रुता वाले पड़ोसी और यहां तक कि कुछ मुक्त-जन और श्वेत रिपब्लिकन उजागर हुए, जिन्होंने डेमोक्रेटिक श्वेतों के साथ सांठ-गांठ कर ली थी या जिनका स्वयं का कोई आपराधिक कार्यक्रम था.

उन्होंने अश्वेतों के शिक्षा, आर्थिक उन्नति, मतदान के अधिकार, और हथियारों को रखने व प्रयोग करने के अधिकार पर प्रतिबंध लगाने के लिये कार्य किया. क्लू क्लक्स क्लान जल्दी ही लगभग प्रत्येक दक्षिणी राज्य में फ़ैल गया और इसने अश्वेत और श्वेत दोनों ही तरह के रिपब्लिकन नेताओं के विरूद्ध एक "आतंक का अभियान" छेड़ दिया. इस अभियान के दौरान मारे गये राजनैतिक नेताओं में अर्कान्सास के कांग्रेस-सदस्य जेम्स एम. हिन्ड्स, दक्षिण कैरोलिना की विधायिका के तीन सदस्य, और ऐसे विभिन्न लोग शामिल थे, जिन्होंने संवैधानिक सम्मेलनों में अपनी सेवाएं दीं थीं !

KKK ब्यूरो के प्रतिनिधि अश्वेतों को धमकियां दिये जाने और उनकी हत्या कर दिये जाने की साप्ताहिक जानकारी दिया करते थे. "सशस्त्र गुरिल्ला युद्ध ने हज़ारों अश्वेतों को मार डाला; राजनैतिक दंगे आयोजित किये गये; उनके कारण व अवसर सदैव ही अज्ञात होते थे, उनके परिणाम सदैव ही निश्चित होते थे; श्वेतों की तुलना में दस से सौ गुना तक अधिक नीग्रो मारे गये." नक़ाबपोश लोग घरों पर गोलियां दाग़ते थे और कभी-कभी भीतर निवासियों के होते हुए भी उनमें आग लगा देते थे. उन्होंने सफल अश्वेत किसानों को उनकी भूमि से भगा दिया. सामान्यतः ऐसा कहा जा सकता है कि उत्तरी व दक्षिणी कैरोलिना में, जून 1867 में समाप्त हुए 18 महीनों में, हत्या की 197 और भड़काये गये हमलों की 548 घटनाएं हुईं..!

क्लान हिंसा ने अश्वेत मतदान को दबाने के लिये कार्य किया. जैसा कि निम्नलिखित उदाहरण सूचित करते हैं, नवंबर 1868 के राष्ट्रपति चुनावों के पूर्व कुछ सप्ताहों में ही लुईसियाना में 2,000 से ज़्यादा लोग मारे गये, घायल हुए या किसी अन्य प्रकार से ज़ख़्मी हुए. हालांकि सैंट लैंड्री पैरिश के पास 1071 औपचारिक रिपब्लिकन सदस्यों का बहुमत था, लेकिन हत्याओं के बाद, किसी भी रिपब्लिकन सदस्य ने वसंत के चुनावों में मतदान नहीं किया. ग्रैंट के विरोध के लिये श्वेत डेमोक्रेटिक सदस्यों ने पैरिश को पूरे वोट दिये.

KKK ने जंगलों में ढ़ूंढकर व पीछा करके 200 से अधिक अश्वेत रिपब्लिकन सदस्यों को मार डाला और घायल किया. तेरह बंधकों को जेल से ले जाकर गोली मार दी गई; 25 आधी-दफ़न लाशों का ढेर जंगल में पाया गया. KKK ने लोगों को डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में मतदान करने के लिये बाध्य किया और उन्हें इस तथ्य के प्रमाणपत्र भी दिये..!

एक ओर जहां क्लान ने गैर-राजनैतिक अपराधों के लिये मुखौटे का प्रयोग किया, वहीं दूसरी ओर राज्य या स्थानीय सरकारों ने शायद ही कभी उनके ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही की. अफ़्रीकी अमरीकियों को न्यायालयों से बाहर रखा गया. मार-पीट के मामलों में, सभी श्वेत न्यायाधीशों ने कू क्लक्स क्लान के सदस्यों पर लगभग कभी भी अभियोग नहीं चलाया. 

यदि कोई दुर्लभ अभियोग चलाया जाता था, तो न्यायाधीशों द्वारा सज़ा के लिये मतदान किया जाना असंभावित था. कुछ हद तक, ज्यूरी के सदस्यों को स्थानीय क्लान सदस्यों द्वारा बदला लिये जाने का भय था.कुछ अन्य लोग अश्वेतों पर अपना प्रभुत्व बनाए रखने के एक मार्ग के रूप में मार-पीट का समर्थन कर सकते थे. कई राज्यों में, अधिकारी क्लान के सदस्यों के ख़िलाफ़ अश्वेत नागरिक-सेना का प्रयोग करने में हिचकते थे क्योंकि उन्हें भय था कि इससे नस्लीय तनाव बढ़ जाएगा..!

इस अतिवादी संगठन का इतिहास और कारनामो की लिस्ट बड़ी लम्बी है...अमेरिका को इस संगठन को ख़त्म करने में बड़ी दिक्क़त पेश आयी थी....फिर भी अभी भी उस देश में इसके कई भूमिगत सदस्य है !

Ku Klux klaan हमेशा से ही अतिवादी लोगों, चरमपंथी संगठनो का आदर्श रहा है, कई देशों में कई संगठन आज भी इस संगठन की मूल विचारधारा का अनुसरण करते हैं !

डरना ज़रूरी है~~~डरिये ना ~~~ Please ~~~!!

जी हाँ दोस्तों, हमारे बुज़ुर्ग तो कहते थे कि जो डर गया समझो मर गया, मगर इस दौर में तो उल्टा ही हो रहा है, ऐसा लग रहा है कि जो न डरा समझो वो मर गया....इसकी कई मिसालें मैं आपको दे रहा हूँ.....पहली मिसाल अन्ना हजारे की ही ले लीजिये....उसने देश की जनता को भ्रष्टाचार ( Corruption ) से डराया तो कितना फायदा हुआ..लोग डर कर दौड़ कर  घरों से बहार निकल आये, और डर डर कर अन्ना की आवाज़ से आवाज़ मिलाने लगे, बात ही ऐसी डराने वाली थी, फिर ऐसा ही एक डर बाबा जी ने काले धन  के बारे में बता कर किया, लोगो ने खूब घबरा कर नारे लगाए ....और कहा की फ़ौरन ही काला धन वापस लाओ,   नेता लोग भी हमेशा डरा कर ही तो वोट लेते हैं...कोई कहता है की हमें वोट नहीं दोगे तो भूखे मर जाओगे, हमारी पार्टी तुम्हारे पेट भरने का वादा करती है, यानी यह डराने का धंधा खूब फल फूल रहा है, और सफल भी हो रहा है, चाहे राजनीति में हो, समाज में, या धर्म में...सब डरा डरा कर लोगों के होश उड़ा रहे हैं.....अल्प संख्यकों को डराया जा रहा है की हमें वोट दो नहीं तो तुम्हारा नामो निशाँ मिट जाएगा, बहु संख्यकों को ...यह कह कर डराया जा रहा है की....हमें वोट नहीं दिया तो यह लोग बहु संख्यक हो जायेंगे, कोई टोपी दे कर डरा रहा है, कोई टोपी नहीं ले कर डरा रहा है, कहीं मोदी से डराया जा रहा है, कहीं राहुल से डराया जा रहा है, कहीं विकिलीक्स डरा रहा है, कहीं तहलका डरा रहा है, ....फार्मूला खूब काम कर रहा है...धार्मिक ठेकेदार लोगों को " धर्म खतरे में है "...का नारा दे कर डराते रहे हैं....और लोग अब भी बहुत डरते हैं...विशेष रूप से हम हिन्दुस्तानी तो इस डर विशेष के आदि भी हो चुके हैं...क्या करें....यह डर हमारे मस्तिष्क में नसों में बार बार इंजेक्ट किया जाता रहा है...इसका anti dose आते ही ....फिर से इस डर को दोबारा इंजेक्ट कर दिया जाता है...!

समाज में और परिवारों तक मैं इस डर की फसल बोई और काटी जाती रही है.....सैंकड़ों मिसालें हैं...जिनको रोज़ हम ख़बरों में और आम ज़िन्दगी में होते देख रहे..बच्चों को डराया जा रहा है, कि अगर वो नहीं पढेंगे तो डाक्टर और इंजीनियर कैसे बनेंगे,  हैं....कहीं माँ बाप अपनी संपत्ति का डरावा देकर सेवा करवा रहे हैं,   बाज़ार भी इस डर को भला कैसे न भुनाए...कई कास्मेटिक कम्पनियां डरा रही हैं कि यदि यह क्रीम नहीं लगाईं तो लडकियाँ हर क्षेत्र में पीछे रह जायेंगी, और उनका करियर तक खराब हो जाएगा....दूसरी और होर्लिक्स दावा कर रही है कि यदि इसको बच्चों ने नहीं पिया तो उनका मानसिक विकास रुक जायेगे..उनका भविष्य खराब हो जाएगा..., मतलब यह कि डर कि फसल खूब बोई और काटी जा रही है, और इस डर को बहुत ही logically तरीके से और मार्केटिंग के साथ फैलाया जा रहा है, ....और इसके पीछे कही हमारी मनोवृत्ति और मनोविज्ञान से जी भर कर खिलवाड़ किया जा रहा है....  .इसलिए अब तो यही कह सकते हैं ...की इस दौर में डरना ज़रूरी सा हो गया है.लग रहा है कि " जो नहीं डरा समझो वो मरा " .......सो .. डरिये ना प्लीज़...!!

आप खाइए गुलाब जामुन~~~~~~हम नहीं रोक सकते~~~~~!!

ट्यूनीशिया में एक सब्जी का ठेला लगाने वाले ने अपनी जान की परवाह किये बगैर भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आंदोलन की चिंगारी भड़काई। उस सब्ज़ी वाले की शहादत से अब शायद ट्यूनीशिया का भी भला हो जाए। मिस्र में तहरीर चौक है,  वहां एक महिला असमा महफूज़ ने फेसबुक पर बस ये लिख दिया – " चलो तहरीर चौक "और धीरे धीरे  लाखों लोग मुबारक सरकार के खिलाफ नारे लगाते चौक पर उमड़ पड़े। मिश्र में लोग सेना की बंदूकों के सामने सीना तान कर खड़े हो जाते थे...की चलाओ गोली...और ऐसे कई विडियो हैं जिन में लोगों को सीने पर सेना की गोलियां खाते दिखाया गया है... ट्यूनीशिया और मिस्र के तहरीर चोक का तो कोई एक विशेष नेता या आन्दोलनकारी भी नहीं था.!
मगर हमारे देश में जहाँ हर महीने कोई नया  आन्दोलन कारी या देश के भले के लिए मसीहा उठ बैठ रहे हैं..कोई अनशन कर रहा है, कोई  सद्भावना उपवास कर रहा है,  कोई रथ यात्रा कर रहा है, कोई योग गुरु आन्दोलन छोड़  (भाग)  कर यात्रा कर करोड़ों लोगों को जगाने चल पड़े हैं..अपनी अपनी ढपली ..अपना अपना राग, ..क्यों नहीं बात आगे बढ़ पा रही है...इसके मूल में केवल एक ही कारण है...जन मानस का बँटा होना ...और इन आन्दोलन कारियों और मसीहाओं का व्यक्तिगत  स्वार्थ ..और जब तक यह सब मसीहा अपने अपने निजी स्वार्थ, कुर्सी की लालच, या एजेंडे छोड़ कर सच्चे मन से  देश के लिए नहीं सोचेंगे..इस देश में बदलाव की लहर नहीं आएगी...और गधे हमेशा ही गुलाब जामुन ही खाते रहेंगे...आखिर हम कैसे रोक सकते हैं..!!  अभी अभी मेरे एक मित्र ने सूचना दी है कि कई गधों को Diabetes (डायबिटीज़) कि बीमारी है ..उनके लिए sugar रहित गुलाब जामुन भी बनवा लिए गए हैं...ताकि उनकी सेहत पर बे तहाशा गुलाब जामुन खाने से कोई फर्क नहीं पड़े.

एक खुला पत्र फेसबुक के founder मार्क जुकरबर्ग के नाम~~~!! ============================ ( आज कुछ खट्टा~~~~और कुछ~~

काफी दिनों से इस विषय पर जुकरबर्ग को पत्र लिखने का सोच रहा था...और कई लोगों की भी शिकायतें और दुःख  देख कर रहा न गया...आज लिख ही डाला..उम्मीद है...जुकरबर्ग ज़रूर ध्यान देंगे...मेरे कुछ सुझाव और शिकायतें जुकरबर्ग को पेश है...जो की निम्न हैं....:--

1 .  सबसे पहला काम फेसबुक पुलिस बनाए जाए...और अचानक फेसबुक पर छापा मारा जाए, और संदिग्ध हालत में पाए गए profiles को कब्जे में लिया जाए..!
2 .  किसी भी comments पर केवल " like " कर भाग जाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाही की जाए...और ज्यादा से ज्यादा  एक दिन में  5 " like " की इजाज़त           हो,   इसके बाद comments करना आवश्यक हो..!
3 .  जो भी प्रोफाइल एक महीने से काम में नहीं लिया जाए, उसको तुरंत प्रभाव बंद कर दिया जाए...और सम्बंधित मित्रों को भी समय समय पर notifications दिए जाएँ की आपका फलां फलां मित्र  Inactive facebook user है, आप तुरंत ही उसको अपनी friends list से बाहर करिए...!
4 .   जिसकी भी लिस्ट में अधिक inactive user पाए जाएँ उसको हर हफ्ते एक चेतावनी फेसबुक पुलिस द्वारा  दी जाए...क्योंकि ऐसे लोग फेसबुक पर आबादी बढ़ा कर traffic में बाधा पैदा कर रहे हैं...!
5 .  महिला फेसबुक users की पोस्ट पर टिप्पणियों की संख्या नियंत्रित की जाए...खासकर पुरुषों की और से की जाने वाली ढेर टिप्पणियों पर....और 10 से अधिक टिपण्णी किसी भी सूरत में ब्लाक की जाए..!
6 .  महिलाओं की पोस्ट पर जितनी टिप्पणियाँ और like आते हैं...नियम बनाया जाए की उस से आधे वो महिलायें, पुरुषों की पोस्ट पर ज़रूर करें....और इनका हिसाब एक फेसबुक accountant बराबर रखे...!
7 .  किसी भी ग्रुप के बनने के बाद यदि उसमें एक हफ्ते तक कोई पोस्ट नहीं आती है, तो उसको कब्जे में लिया जाए, और उसके Admin .,को चेतावनी दी जाए....और यदि किसी ग्रुप में एक दिन में पांच से कम पोस्ट आये तो भी उसको कब्जे में लिया जाए....!
8 .  बच्चों को जिनके Parents के भी फेसबुक पर accounts हैं, उनपर फेसबुक पुलिस की निगरानी ज़रूरी है....इन बच्चों के लिए केवल  एक घंटे की मियाद  कर दी जाए...ताकि इनके माता पिता के time slot में कोई गड बड न हो....यदि एक घंटे में भी बच्चे नहीं माने तो एक automatic system के द्वारा इनको फेसबुक से अगले 24  घंटों के लिए  sign out कर दिया जाए...!
9 .  यदि कोई फेसबुक user चोरी छुपे  किसी भी मित्र के मित्र या किसी गैर मित्र के प्रोफाइल से  एल्बम या फोटो विशेष कर महिलाओं के देखने की ख़ुफ़िया कोशिश करे तो इसकी सूचना तुरंत ही उस व्यक्ति के नाम सहित सम्बंधित user की वाल पर फेसबुक पुलिस द्वारा छाप दी जाए...!
10 .  यदि कोई भी user , chat box में   दो के  साथ chatting  कर रहा हो तो वहां हरी बत्ती की जगह लाल बत्ती दिखाई जाए...महिला फेसबुक users के लिए यह नियम 5 मित्रों  के साथ chatting के बाद लागू किया जाए...!
11 . फेसबुक पुलिस रोज़ फेसबुक पर गश्त करे...खासकर रात 12 बजे के बाद यह गश्त तेज़ कर दी जाए...!
12 . टैग करने से पहला user से फेसबुक पुलिस द्वारा पूछा जाए की उसको टैग किया जाए या नहीं...बिना पूछे टैग करने वालों पर सख्त कार्रवाही कर टैग सुविधा से वंचित किया जाए..!
13 .  बिना पूछे हर किसी ग्रुप में शामिल करने वालों का चालान किया जाए...और punishment के तौर पर उनके प्रोफाइल को फेसबुक पुलिस द्वारा  सात दिन के लिए hang कर दिया जाए..!
14. जो महिलायें शादी शुदा होते हुए भी, कुंवारी  बताये, उस महिला user के पति का प्रोफाइल या ई  मेल ढून्ढ कर इस कारनामे  की सूचना दी जाय, और इसी क्रम में यदि पुरुष user की शिकायत उसकी पत्नी को भी तुरंत दी जाए...! और यदि दोनों ही ऐसा करते पाए जाएँ तो उनके बच्चों को इसकी सूचना दी जाए...!

15.यदि कोई पुरुष जानबूझ कर किसी महिला या युवती का प्रोफाइल बनता है, या कोई महिला user , पुरुष का प्रोफाइल बनाए पाए जाए...फेसबुक की मेडिकल टीम से उसका gender change कराने की सिफारिश की जाय...ताकि झंझट ही ख़त्म हो...!

16.जो लोग ढकनिया या  भट्टा पारसोल जैसे गाँव में रह कर अपने आपको दुबई, अमेरिका, लन्दन, या फ़्रांस का नागरिक बता कर मूर्ख बताते हैं...उनकी शिकायत "खाप पंचायत" में की जाए...!

17. जो महिलायें ज्यादा खूबसूरत हैं...उनसे निवेदन किया जाए की वो अपने कम सुन्दर फोटो लगाएं..ताकि फेसबुक पर अफरा तफरी न फैल पाए...और जो महिलाए सुन्दर नहीं है...उनको इसकी छूट दी जाए वो करीना या केटरीना के फोटो लगा कर काम चला सकें..!.

18. एक फेसबुक थाना बनाया जाए जहाँ..की Most Wanted की जगह....Most Blocked persons का बोर्ड लगा कर दोषी लोगों के फोटो लगाए जाएँ...!
 19 . फेसबुक पर एक complaint box ज़रूर लगाया जाए....और एक suggestion box भी ...जहाँ दुखियारे users अपने दुखों की सूचना फेसबुक पुलिस को दे सकें...!
उम्मीद है दोस्तों इन सुझावों और शिकायतों से हम सब को कहीं न कही राहत की रौशनी तो नज़र आएगी, हो सकता ही कुछ सुझाव रह गए हों..आप भी दे सकते हैं........सुनवाई ज़रूर होगी.....इसी उम्मीद के साथ आपका दोस्त...

चेतावनी :- POLITICAL CIRCUS - 2014.. चालू आहे ~~~~~~!!

करप्शन और महंगाई से पस्त और तमतमाई जनता जैसे ही  अन्ना की ललकार से होश में आयी, उसके तेवर, तैश और वैचारिक सैलाब को रोकना सरकार के लिए दूभर सा हो गया था...हर वर्ग और हर धर्म का, हर आयु , हर प्रांत का आदमी, बच्चे, औरतें, बूढ़े  करप्शन को ललकारने सड़कों पर निकल कर अन्ना की आवाज़ से आवाज़ मिलाने आ गए..!  इस ऐतिहासिक घटना से  और इतने जन सैलाब को सड़कों पर निकलते देख....मानो नेताओं, राजनैतिक पार्टियों, और संगठनो के मुहं में पानी आ गया ...यह सब अन्ना का ही जादू था..!

इस जन सैलाब के तैश और विचारों के तेवरों को फ़ौरन ही केश कराने के लिए सब मौक़ा परस्त अपने अपने हथकंडे ले कर POLITICAL CIRCUS करने निकल पड़े हैं,  जैसे सर्कस में हर आयु वर्ग के लिए अलग अलग करतब होते हैं...वैसे ही करतब यह मौक़ा परस्त अलग अलग करने निकल पड़े हैं, कोई नेता अपने उल जलूल बयानों से गालियाँ खाकर किसी की तालियाँ बटोर रहा है, ...कोई  काले धन का सर्कस दिखा कर तालियाँ और समर्थन ले कर खुश हो है, कोई रथ पर चढ़ कर घूम घूम कर सर्कस दिखाने को निकलने की घोषणा से तालियाँ और समर्थन के लिए तैयार है, कोई सद्भावना  उपवास कर कहीं निशाना लगा कर तालियाँ बजवा रहा है, कोई अपनी टोपी किसी को पहनाने की कोशिश से तालियाँ हासिल कर रहा है, कोई उस टोपी को न पहन कर तालियाँ बटोरने की कोशिश कर रहा है...!  इन सब करतबों का केंद्र...है दिल्ली की कुर्सी....या सत्ता सुन्दरी की ललक, मगर इन एक के बाद एक सर्कसों के शो से जनता भ्रमित हो कर एक करतब बाज़ से दूसरे करतब बाज़ तक दौड़ लगा रही है, हर करतब बाज़ अपने शो, करतब या प्रदर्शन के लिए अधिक से अधिक शो करना और अधिक से अधिक लोगों की भीड़ इकट्ठी करना  चाह रहा है...ताकि उनका लक्ष्य जल्दी से जल्दी पूरा हो जाए....... और इन सब करतबों में अन्ना का  भ्रष्टाचार  मुक्त भारत का सपना कही हाशिये पर जा पड़ा है...!

मतलब सब करतबबाज़  अपने अपने दर्शक और अपने अपने लक्ष्य टटोल रहे हैं...संभावनाएं कुरेदी जा रही हैं...और यह सब बड़ी जल्दी और योजनाबद्ध तरीके से हो रहा है...करतबों के लगातार एपिसोड लिख लिए गए हैं...और इस जल्दी का कारण यह है की...कही अन्ना द्वारा जगाया यह जन आक्रोश ठंडा न पड़ जाए...या फिर कही अन्ना इस जन सैलाब को आवाज़ न दे डाले...अगर ऐसा हुआ तो सारे आगामी एपिसोड मात्र एक झुनझुना बन कर रह जायेंगे.....जो की यह करतब बाज़  खुद अकेले में बैठ कर बजाया करेंगे....खैर.....फिर भी सावधान Political Circus पूरे ज़ोरों पर चार चार शो में चालू है.....!!
ज़रा सोचिये दोस्तों~~~~~~!!

बदनाम होंगे ~~~~~~~~तो क्या ~~~~~नाम न होगा~~~~~??

हमारे बुज़ुर्ग तो कहते थे की " बद अच्छा ...और बदनाम बुरा " ...मगर इस नए दौर में एक  अजीब ही उल्टा चलन चल निकला है....बदनाम हो जाओ, मशहूर हो जाओ, या यूं कह सकते हैं..."विवादों में रहो...ख़बरों में रहो ".....मीडिया आपके दरवाज़े बैठी रहेगी...! इस अजीब चलन के लिए हम अगर पीछे देखें तो सलमान रश्दी ने कुरान शरीफ के बारे में विवादित बयान दिया ...और मीडिया ने उसको रातों रात स्टार बना दिए, रश्दी की इसी  पालिसी को अपनाते हुए तसलीमा नसरीन ने भी कुछ विवादित बयान दिए और वो भी रातों रात International Level पर एक हस्ती बन गयीं, दोनों को विश्व के कई देशों ने अपनी नागरिकता देने की होड़ लग गयी..!

इसके बाद तो जैसे लोगों ने इसको एक मशहूर होने का नुस्खा ही बना लिए...अपने देश में ऐसे सैंकड़ों उदाहरण मिल जायेंगे....राखी सावंत, से लेकर बाबी डार्लिंग, और  कपडे उतारने पर तुली  पूनम पांडे तक., क्रिकेट में ललित मोदी, ..और राज ठाकरे से लेकर थरूर, दिग्विजय सिंह, सुबोध कान सहाय, लालू यादव, मायावती, बाबा रामदेव, नरेन्द्र मोदी, शाही इमाम, वरुण गाँधी, तक......राज ठाकरे अपनी भड़काऊ भाषण से विवादों में आकर आज राज कर रहे हैं, दिग्विजय से लेकर लालू, मायावती, तक काफी लम्बी लिस्ट है...रामदेव हमेशा सुर्खियाँ बटोरते हैं...मोदी भी विवादों में रहकर खुश होते हैं, और उसको केश करने का हुनर भी जानते हैं, ...दिग्विजय सिंह अपने उल जलूल बयानों से हमेशा अखबारों में और मीडिया में छाये रहते हैं...!
एक प्रोफेस्सर हुए थे  नाम था बटुक नाथ...जिन्होंने अपनी पत्नी के होते...अपनी Student से सम्बन्ध और बाद में शादी भी की...उन को भी बदनाम या विवादित हो कर ही प्रसिद्धि मिली थी, मीडिया ने उनको बड़ा ही मशहूर कर दिया था, हर चेनल पर  15 दिन तक उनके बारे में ही समाचार आते रहते थे ..! ऐसे हज़ारों उदाहरण अपने देश में मिल जायेंगे..की लोग विवादों में रहकर प्रसिद्धि का शोर्ट कट बना रहे हैं...और इसमें सब से बड़ा अहम् रोल अगर हम देखें तो इलेक्ट्रोनिक मीडिया का सब से ज्यादा है....जिसका की कोई मानक नहीं, कोई सीमा नहीं, कोई नियम कायदा नहीं...अगर मीडिया चाहे तो एक झुग्गी में रहने वाले फटे हाल आदमी को रातों रात स्टार बना डाले...काफी समय पहले प्रिंस नाम का एक बच्चा खुले हुए बोरिंग होल में गिर गया था....मीडिया ने उसको इतना कवरेज दिया था की लोगों ने पूरी रात जाग कर live दुआएं और प्रार्थनाएं की थी....इसी लिए हम यह भी कह सकते हैं की इस विवादित शोर्ट कट के लिए मीडिया बड़ा ही अहम् रोल अदा कर रहा है...जिस पर की अब थोड़ी सरकारी लगाम या नियमावली  ज़रूरी हो गयी है...!!
ज़रा सोचिये दोस्तों~~~~~!

क्या हम ज़ेहन से अपाहिज (मानसिक पंगु ) हो चुके हैं....?

साल 2011  को देश के इतिहास में याद किया जाएगा. वजह है करप्शन से परेशान और  सरेंडर किये हुए  मुल्क की सोयी जनता को एकदम से झकझोर कर जगा देना....इसमें अन्ना हज़ार का नाम सबसे पहले आता है...और देश के आंदोलनों के इतिहास में लिखा भी जाएगा,.. मगर एक सवाल परेशान कर रहा है...कि क्या मुल्क के लोग इतने सालों  अन्ना का इंतज़ार ही कर रहे थे कि अन्ना आयंगे और हमें जगायेंगे..?

शायद हम लोगों की सोच और मानसिकता पर जंग लग गया है, या फिर " सब चलता है " वाली आदत पड़ चुकी है...या हम   उन कीट पतंगों की तरह हो चुके हैं...जो एक ज़रा से रौशनी किरण यदि कोई दिखा देता है..तो फ़ौरन समूह बनाकर उधर ही लपक जाते हैं, चाहे वो रौशनी किसी गलत हाथों में ही क्यों न हो...! उदाहरण सब के सामने है...अन्ना हजारे का उदाहरण और बाबा रामदेव का उदाहरण सब के सामने है, और कई छोटे मोटे उदाहरण भी हैं...जैसे कोई दलितों को रौशनी की किरण दिखा कर अपनी और लपका लेता हा.....कोई अल्प संख्यकों को रौशनी की झलक दिखा कर दौड़ा लेते हैं.., क्या हमारी बौद्धिक क्षमता, सोच, और निर्णय को गिरवी रख आये हैं..जो हर किसी मसीहा बताने वाले की और अँधा धुंद दौड़ पड़ते हैं...यह तो एक मानसिक और बौद्धिक  गुलामी की तरह है...और यही वजह है की politicians और खुद को मसीहा कहलाने वाले लोग...हमें ठग कर अपना उल्लू सीधा कर के निकल लेते हैं...!

मुझे इस वक़्त रहत इन्दोरी साहब का एक शेर याद आ रहा है..

ये लोग पांव नहीं जेहन से अपाहिज हैं
उधर चलेंगे जिधर रहनुमा चलाता है..!!

जबकि हमको कहना यह चाहिए...

ये जा के मील के पत्थर पे कोई लिख आये
वो हम नहीं हैं, जिन्हें रास्ता चलाता है...!!

ज़रा सोचिये दोस्तों~~~~~~~!!
शुक्रिया...धन्यवाद.

RTI (सूचना का अधिकार) के कार्यकर्ताओं पर लटकती तलवारें~~~~~~!!

भोपाल में आरटीआई कार्यकर्ता शेहला मसूद की मौत से पूरे देश में सूचना का अधिकार आंदोलन स्तब्ध है। शेहला ने अनेक शीर्ष अफसरों के खिलाफ आरटीआई कानून के तहत जानकारी मांगी थी। इसीलिए उनकी मौत पर रहस्य का साया है।

पुलिस जांच से असंतुष्ट शेहला के परिवार ने सीबीआई जांच की मांग की है। गौरतलब है कि बीते महीनों में देश के विभिन्न हिस्सों में आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले और उन्हें धमकाने की घटनाएं बढ़ती गई हैं। पिछले डेढ़ साल में ऐसे नौ कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है।

आरटीआई कानून को लेकर बढ़ती जागरूकता बहुत से लोगों को सार्वजनिक महत्व की जानकारियां हासिल करने के लिए प्रेरित कर रही है, तो दूसरी तरफ उन सूचनाओं के सामने आने से जिनके भ्रष्ट कारनामे उजागर होते हैं, वे प्रतिशोध में ज्यादा आक्रामक होते जा रहे हैं।

अक्सर प्रशासन ऐसे मामलों में लापरवाह रहता है, जिससे पारदर्शिता के लिए संघर्षरत कार्यकर्ताओं के लिए जोखिम बढ़ता जा रहा है। लगता है कि अब तक गोपनीयता के आवरण में अवैध धंधे चलाने वाले लोग सूचना से समाज को जागरूक करने वाले कार्यकर्ताओं को आतंकित करने पर उतर आए हैं।

यह अंदाजा सहजता से लगाया जा सकता है कि आने वाले समय में ऐसी घटनाएं और बढ़ेंगी। नागरिक जब अपने अधिकारों का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करेंगे, तो उससे निहित स्वार्थी तत्वों की करतूत बेनकाब होगी। ऐसे तत्वों द्वारा आपराधिक प्रतिक्रिया करना अस्वाभाविक नहीं है।

इसलिए गड़बड़ियों को सामने लाने वाले प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की सुरक्षा अब बेहद जरूरी मसला बन गया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकारें इसके प्रति उदासीन हैं। व्हिसलब्लोअर कानून की चर्चा जरूर है, लेकिन कानून पर अमल की भी कारगर व्यवस्था होनी चाहिए। इस पूरे संदर्भ में शेहला मसूद का मामला एक टेस्ट केस है। इस प्रकरण की पूरी सच्चाई सामने आनी चाहिए !!